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    बुढ़िया और व्यापारी

    बुढ़िया और व्यापारी
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    बहुत पहले की बात है कि एक बुढ़िया के यहां एक व्यापारी आया और रात के समय उसके घर का द्वार खटखटा कर कहने लगा कि मुझे अपने घर में एक रात ठहरने की अनुमति दे दो उसके बदले में जो भी होगा मैं दे दूंगा। बुढ़िया ने व्यापारी की बात स्वीकार की और उसे अपने घर में ठहरा लिया। व्यापारी ने पूछा खाने के लिए कुछ मिलेगा। बुढ़िया ने कहा कि मेरे पास दस अंडे हैं। व्यापारी ने कहा कि अगर हो सके तो यही अंडे मेरे पका दो। बुढ़िया ने दसों अंडे पका कर व्यापारी के सामने रख दिये और उसने खा लिया।

    व्यापारी ने पूछा कि इस खाने का कितना होगा? तो बुढ़िया ने कहा कि दस अंडे एक रियाल के और एक रोटी आधी रियाल की कुल मिलाकर डेढ़ रियाल हुए। व्यापारी ने कहा अच्छी बात है जाते समय तुम्हारे पैसे दे दूंगा। सुबह हुई तो बुढ़िया उठ कर अपने काम से जंगल में चली गयी। व्यापारी जब जागा तो उसने देखा कि घर में बुढ़िया नहीं है उसने कुछ देर प्रतीक्षा करने के बाद सोचा कि चलो अगले वर्ष जब इस नगर से गुज़रुंगा तो बुढ़िया का पैसा उसे दे दूंगा। अगले वर्ष वह जब नगर पहुंचा तो सीधे बुढ़िया के पास गया और कहा कि पिछले वर्ष मैं खाने का पैसा तुम्हें नहीं दे पाया था। तुमने डेढ़ रियाल कहा था यह लो दस रियाल। बुढ़िया दस रियाल लेकर खुश हो गयी और उसने जाकर अपनी पड़ोसन से पूरी बात बतायी।

    पड़ोसन ने उससे कहा कि तुम्हें मूर्ख बनाया गया जरा सोचो अगर तुम दस अंडों पर मुर्गी बिठा देती तो उससे कितने चूज़े निकलते और वह सब मुर्गे और मुर्गियों में बदल जाते तो उन सब से तुम को कितना लाभ होता। यह दस रियाल देकर उसने तुम्हें मूर्ख बनाया। बुढ़िया उसकी बातों में आ गयी और उसने जाकर शासक से शिकायत कर दी। शासक ने व्यापारी की गिरफ्तारी का आदेश दिया और सिपाहियों ने व्यापारी को पकड़ लिया। सिपाही जब उसे पकड़ कर ले जा रहे थे तो उसी समय बुहलोल नामक एक बुद्धिमान व्यक्ति से उसकी भेंट हुई तो उसने गुहार लगायी कि मुझे बचा लिया जाए। बुहलोल ने उस से पूछाः तुम्हारा अपराध क्या है? व्यापारी ने पूरी बात उन्हें बतायी। तो बुहलोल ने कहा संतुष्ट रहो मैं तुम्हें छुड़ा लूंगा। उसके बाद बुहलोल शासक के पास गये और उससे कहा कि मुझे दो बोरी गेहूं दे दो क्योंकि मैं उसे बो कर खेती करना चाहता हूं।

    शासक ने कहा कि दो के बजाए मैं चार बोरी दूंगा जाओ खेती करो। बुहलोग गेहूं की बोरी लेकर उस बुढ़िया के घर गये और उससे कहा कि एक बड़ा बर्तन लाओ मुझे यह गेहूं उबालना है, बुढ़िया ने कहा कि तुम तो इन्हें बोना चाहते थे? बुहलोल ने कहा कि हां उबालना के बाद खेती अच्छी होगी। बुढ़िया शासक के पास गयी और उससे कहा कि बुहलोल पागल हो गये हैं आप ने जो गेहूं बोने को दिया था उसे उबाल रहे हैं और कह रहे हैं कि इस से फसल अच्छी होगी। शासक ने बुहलोल को बुलवाया और पूछा, यह तुम क्या कर रहे थे? बुहलोल ने कहा मैं गेंहू उबाल रहा हूं ताकि उसे बो सकूं। शासक ने कहा कहीं उबला हुआ गेहूं भी उगता है? बुहलोल ने कहा कि जब दस उबले हुए अंडों से चूज़े निकल सकते हैं तो फिर गेहूं भी उग सकता है। शासक का मुंह खुला रह गया और उसे अपनी गलती का आभास हो गया उसने व्यापारी को तत्काल स्वतंत्र करने का आदेश दिया। बुहलोल ने वह दस रियाल भी बुढ़िया से लिये और व्यापारी को लौटाते हुए कहाः यह बिना अपराध के बंदी बनाए जाने का हर्जाना है। व्यापारी बुहलोल के लिए दुआएं करता हुआ चला गया।