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    बैतुल खला के अहकाम

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    *(म.न.57) इंसान पर वाजिब है कि पेशाब व पख़ाना करते वक़्त और दूसरे मौक़ों पर अपनी शर्म गाहों को बालिग़ अफ़राद से छुपा कर रख़े। चाहे वह बालिग़ अफ़राद माँ, बहन की तरह उसके महरम ही क्योँ न हों, इसी तरह अपनी शर्म गाहों को दिवानों और अच्छे बुरे की तमीज़ रखने वाले बच्चों से भी छुपाये। लेकिन शौहर और बीवी के लिए अपनी शर्म गाहों एक दूसरे से छुपाना लाज़िम नही है।

    (म.न.58) लाज़िम नही है कि अपनी शर्म गाह को किसी मख़सूस चीज़ से छुपाया जाये अगर हाथ से भी छुपाले तो काफ़ी है।

    *(म.न.59) पेशाब या पख़ाना करते वक़्त एहतियाते लाज़िम की बिना पर न बदन का अगला हिस्सा (यानी पेट और सीना ) क़िब्ले की तरफ़ हो और न ही पुश्त।

    *(म.न. 60)अगर पेशाब या पख़ाना करते वक़्त किसी शख़्स के बदन का अगला हिस्सा या पुश्त क़िब्ले की तरफ़ हो और वह अपनी शर्म गाह को क़िब्ले की तरफ़ से मोड़ ले तो यह काफ़ी नही है। अगर उसके बदन का अगला हिस्सा या पुश्त क़िबले की तरफ़ नही है तो एहतियाते लाज़िम की बिना पर वह अपनी शर्म गाह को रू बा क़िबला या पुश्त बा क़िब्ला न मोड़े।

    (म.न. 61) एहतियाते मुसतहब यह है कि इस्तबरा करते वक़्त और पेशाब व पख़ाने के मक़ाम को धोते वक़्त भी बदन का अगला हिस्सा और पुश्त क़िबले की तरफ़ न हो।

    *(म.न. 62) अगर कोई शख़्स इस लिए कि नामहरम उसे न देखें रु बा क़िबला या पुश्त बा क़िबला बैठने पर मजबूर हो तो एहतियाते लाज़िम की बिना पर उसे पुश्त बा क़िबला बैठना चाहिए और अगर पुश्त बा क़िबला बैठना मुमकिन न हो तो रू बा क़िबला बैठ जाये। अगर किसी दूसरी मजबूरी की बिना पर भी रू बा क़िबला या पुश्त बा क़िबला बैठने पर मजबूर हो तो तब भी यही हुक्म है।

    (म.न. 63) एहतियाते मुसतहब यह है कि बच्चे को पेशाब या पख़ाना कराने के लिए रू बा क़िबला या पुश्त बा क़िबला न बैठाये, लेकिन अगर बच्चा ख़ुद से बैठ जाये तो रोकना वाजिब नही है।

    (म.न. 64) चार जगहों पर पेशाब पख़ाना करना हराम है।

    1. बंद गलियों मे जबकि वहाँ के रहने वाले इसकी इजाज़त न हें।

    उस ज़मीन पर जो किसी की मिलकियत हो और उसका मालिक वहाँ पर पेशाब पख़ाना करने की इजाज़त न दे।

    1. उन जगहों पर जो किसी ख़ास गिरोह के लिए वक़्फ़ हो जैसे मदरसे।
    2. मोमेनीन की क़बरों के पास जबकि इस से उनकी बेहुरमती होती हो। और यही हुक्म हर उस जगह बारे में है जहाँ पर पेशाब या पख़ाना करने से दीन या मज़हब के मुक़द्देसात की तौहीन होती हो।

    (म.न. 65) तीन हालतें ऐसी हैं जिनमें मक़अद ( वह सुराख़ जिससे पख़ाना निकलता है) फ़क़त पानी से पाक होती है।

    1. अगर पाख़ाने के साथ कोई दूसरी निजासत (मिस्ले ख़ून) बाहर आये।
    2. बाहर से कोई दूसरी निजासत मिक़अद पर लग जाये।
    3. मिक़अद को चारों तरफ़ का हिस्सा मामूल से ज़्यादा सन जाये।

    इन तीन सूरतों के अलावा मक़अद को या तो पानी से धोया जा सकता है या उस तरीक़े के मुताबिक़ जो बाद में बयान किया जायेगा कपड़े या पत्थर से भी पाक किया जा सकता है अगरचे पानी से धोना ही बेहतर है।

    *(म.न. 66) पेशाब का मख़रज (पेशाब के निकलने का सुराख़) पानी के अलावा किसी दूसरी चीज़ से पाक नही होता। अगर पानी कुर के बराबर हो या जारी हो तो पेशाब करने के बाद एक बार एक बार धोना काफ़ी है। लेकिन अगर पानी क़लील हो तो एहतियाते मुसतहब की बिना पर दो बार धोना चाहिए और बेहतर यह है कि तीन बार धोयें।

    (म.न. 67) अगर मक़अद को पानी से धोया जाये तो ज़रूरी है कि पख़ाने का कोई ज़र्रा बाक़ी न रहे अलबत्ता अगर रंग या बू बाक़ी रह जाये तो कोई हरज नही है और अगर एक बार में वह जगह इस तरह धुल जाये कि पख़ाना का कोई ज़र्रा बाक़ी न रहे तो दुबारा धोना लाज़िम नही है।

    (म.न. 68) पत्थर, ढेला, कपड़ या इन्हीं जैसी दूसरी चीज़े अगर पाक और ख़ुश्क हों तो उनसे मक़अद को पाक किया जा सकता है और अगर इनमे मामूली सी नमी भी हो तो जो मक़अद तक न पहुँचे तो कोई हरज नही है।

    *(म.न. 69) अगर मक़अद को पत्थर, ढेले या कपड़े से एक बार बिल्कुल साफ़ कर दिया जाये तो काफ़ी है।लेकिन बेहतर यह है कि तीन बार साफ़ किया जाये और जिस चीज़ से साफ़ कर रहे हैं उसके तीन टुकड़े होने चाहिए और अगर तीन टुकड़ों से भी साफ़ न हो तो इतने टुकड़ों को इस्तेमाल करना चाहिए कि मक़अद साफ़ हो जाये। अलबत्ता अगर इतने छोटे टुकड़े बाक़ी रह जायें जो नज़र न आयें तो कोई हरज नही है।

    (म.न.70) जिन चीज़ों का एहतराम वाजिब है उन से मक़अद को पाक करना हराम है।(मसलन कापी या किताब का ऐसा काग़ज़ जिस पर अल्लाह या किसी पैग़म्बर का नाम लिखा हो) और मकअद के हड्डी या गोबर से पाक होने में इश्काल है।

    (म.न.71) अगर एक शख़्स को शक हो कि उसने मक़अद को पाक किया है या नही तो उस पर लाज़िम है कि उसे पाक करे अगरचे पेशाब, पख़ाना करने के बाद वह उस मक़ाम को हमेशा फ़ौरन पाक करता हो।

    *(म.न.72) अगर किसी शख़्स को नमाज़ के बाद शक हो कि नमाज़ से पहले पेशाब या पख़ाने के मक़ाम को पाक किया था या नही तो जो नमाज़ वह पढ़ चुका है सही है लेकिन दूसरी नमाज़ पढ़ने से पहले उस के लिए ज़रूरी है कि उस मक़ाम को पाक करे।

    इस्तबरा के अहकाम

    *(म.न.73) इस्तबरा एक मुस्तहब अमल है जिसको मर्द पेशाब करने के बाद इस ग़रज़ से अंजाम देते है ताकि इतमीनान हो जाये कि अब पेशाब की नली में पेशाब बाक़ी नही रहा। इस्तबरा के कई तरीक़े हैं जिनमें से बेहतर यह है कि पेशाब करने के बाद बायें हाथ की बीच की उँगली से पख़ाने के सुराख से पेशाब की नली की जड़ तक तीन बार दबाये इसके बाद अँगूठे को पेशाब नली के उपर वाले हिस्से पर और अँगूठे का पास वाली उंगली को पेशाब नली के नाचे रख कर तीन बार सुपारी तक सूँते फिर बाद में तीन बार सुपारी को दबाये। (अगर पख़ाने का मक़ाम नजिस है तो पहले उसे पाक कर लेना चाहिए)

    (म.न.74) वह तरी जो कभी कभी औरत को चूमने चाटने या हसीँ मज़ाक़ करने की वजह से मर्द के आलाए तनासुल (लिँग) से निकलती है उसे मज़ी कहते है और वह पाक है। इसके अलावा वह तरी जो कभी कभी मनी (वीर्य) के बाद निकलती है उसे वज़ी कहते है। या वह तरी जो कभी कभी पेशाब के बाद निकलती है जिसे वदी कहा जाता है वह भी पाक है इस शर्त के साथ कि उसमें पेशाब न मिला हो। अगर किसी शख़्स ने पेशाब करने के बाद इस्तबरा किया हो और उसके बाद उस से कोई तरी निकले जिसके बारे में न जानता हो कि यह पेशाब है या उपर बयान की गई तीनों चीज़ों में से कोई एक तो वह भी पाक है।

    (म.न.75) अगर किसी शख़्स को शक हो कि उसने इस्तबरा किया है या नही और उसके पेशाब के मक़ाम से कोई तरी निकले जिसके बारे में वह यह न जानता हो कि यह पाक है या नजिस तो वह नजिस है। और अगर वह वज़ू कर चुका है तो (इस तरी के निकलने से) उसका वज़ू भी बातिल हो जायगा।लेकिन अगर उसको इस बारे में शक हो कि जो इस्तबरा उसने किया था वह सही ता या नही तो और इस हालत में उसके पेशाब के रास्ते से एक तरी निकले जिसके बारे में यह न जानता हो कि यह पाक है या नजिस तो वह तरी पाक है और अगर वह वज़ू से है तो उसका वज़ू भी बातिल नही होगा।

    *(म.न.76) अगर किसी शख़्स ने इस्तबरा न किया हो और पेशाब करने के बाद काफ़ी देर गुज़र जाने की वजह से उसे इतमिनान हो गया हो कि पेशाब नली में बाक़ी नही रहा था और उसके बाद उसके पेशाब के रास्ते से कोई तरी निकले जिसके बारे में उसे यह पता न हो कि यह तरी नजिस है या पाक तो वह तरी पाक है और उससे वज़ू भी बातिल नही होगा।

    (म.न.77) अगर कोई शख़्स पेशाब करने के बाद इस्तबरा करके वज़ू करले और उसके बाद कोई ऐसी तरी निकले जिसके बारे में उसका ख़याल यह हो कि यह पेशाब या मनी है तो उस पर वाजिब है कि एहतियातन ग़ुस्ल करे और वज़ू भी करे। अलबत्ता अगर उसने पहले वज़ू कर लिया हो तो वज़ू कर लेना काफ़ी है।

    (म.न.78) औरत के लिए पेशाब के बाद इस्तबरा नही है । अगर पेशाब के बाद औरत से कोई तरी निकले और शक हो कि यह पेशाब है या और कोई चीज़ तो वह तरी पाक है। और उससे वज़ू व ग़ुस्ल भी बातिल नही होगा।

    पेशाब पख़ाना करने के मुसतहब्बात व मकरूहात

    (म.न.79) हर शख़्स के लिए मुस्तहब है कि जब भी पेशाब पख़ाना करने के लिए जाये तो ऐसी जगह पर बैठे जहाँ उसे कोई देख न सके। और पख़ाने मे दाख़िल होते वक़्त पहले अपना बायाँ पैर अन्दर रखे और वहाँ से निकलते वक़्त पहले दाहिना पैर बाहर रखे और यह भी मुस्तहब है पेशाब पख़ाना करते वक़्त अपने सर को (टोपी , दुपट्टे वग़ैरह) से ढक कर रखे और बदन का बोझ अपने बायेँ पैर पर रखे।

    (म.न.80) सूरज चाँद की तरफ़ चेहरा कर के पेशाब पख़ाना करना मकरूह है। लेकिन अगर अपनी शर्म गाह को किसी चीज़ के ज़रिये ढक ले तो फिर मकरूह नही है। इसके अलावा हवा के रुख़ के मुक़ाबिल, गली कूचों में, घरों के दरवाज़ों के सामने और फलदार दरख़्तों के नीचे पेशाब पख़ाना करना मकरूह है। इसी तरह पेशाब पख़ाना करते वक़्त कोई चीज़ खाना, ज़्यादा देर तक बैठे रहना, दाहिने हाथ से पेशाब पख़ाने के मक़ाम को धोना और इस हालत में बाते करना भी मकरूह है लेकिन अगर कोई मजबूरी हो या ज़िक्रे ख़ुदा किया जाये तो कोई हरज नही है।

    (म.न.81) खड़े हो कर पेशाब करना मकरूह है। और इसी तरह सख़्त ज़मीन पर,जानवरों के सुराख़ों पर और पानी में ख़ास तौर पर रुके हुए पानी में पेशाब करना भी मकरूह है।

    (म.न.82) पेशाब और पख़ाने को रोकना मकरूह है और अगर बदन के लिए मुकम्मल तौर पर नुक़सान देह हो तो हराम है।

    (म.न.83) नमाज़ से पहले , सोने से पहले, जिमाअ(संभोग) से पहले और मनी(वीर्य) के निकल जाने के बाद पेशाब करना मुस्तहब है।