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    भोजन करने के शिष्टाचार

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    ज़मीन पर दस्तरख़ान बिछाकर खाना पैग़म्बरे इस्लाम सल्लललाहो अलैहे व आलेही व सल्लम और उनके परिजनों के शिष्टाचार में था। पैग़म्बरे इस्लाम के परिजनों का मानना है कि ऐसा करने से व्यक्ति में विनम्रता आती है और इसमें नैतिक बिन्दु निहित हैं। दस्तरख़ान से खाद्य पदार्थ उठाना इस बिन्दु की ओर संकेत है कि मनुष्य को परलोक की यात्रा के लिए भी रसद की आवश्यकता है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम परलोक की रसद के बारे में कहते हैः अपनी रसद को बढ़ाओ और परलोक के लिए ईश्वर से भय सर्वश्रेष्ट रसद है। पैग़म्बरे इस्लाम सदैव ज़मीन पर दस्तरख़ान बिछाकर बहुत ही नम्रता से भोजन करते थे। इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम पैग़म्बरे इस्लाम के बारे में फ़रमाते हैं कि पैग़म्बर ने ईश्वरीय दूत के रूप में नियुक्ति के समय से इस संसार से जाते समय तक दासों की भांति भोजन करते रहे। जब इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम ने यह पूछा गया कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ऐसा क्यों करते थे तो इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम ने फ़रमायाः ईश्वर के सामने नम्रता दर्शाने के लिए। दस्तरख़ान के शिष्टाचारों में यह भी है कि उस पर शराब सहित वर्जित खाद्य पदार्थ न हों। दूसरी ओर दस्तरख़ान पर रोटी होने से आजीविका और विभूति बढ़ती है। इस्लाम में रोटी का आदर करने पर बल दिया गया है। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लललाहो अलैहे व आलेही व सल्लम फ़रमाते हैः रोटी को महान समझो और उसका आदर करो क्योंकि ईश्वर ने रोटी को दृष्टिगत रखते हुए आकाश से विभूतियां उतारी और धरती की विभूतियां प्रकट कीं। रोटी के आदर में यह भी है कि वह पैर के नीचे न पड़े। इसी प्रकार रोटी से हाथ न पोछना और उसे खाने के बर्तन के नीचे न रखना यह भी रोटी के सम्मान में शामिल है। इस संबंध में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लललाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के हवाले से एक घटना का उल्लेख मिलता है। वह कुछ इस प्रकार है कि विगत में दानियाल नामक एक ईश्वरीय दूत थे। एक दिन दानियाल पैग़म्बर ने एक नौका के मालिक को एक रोटी दी और इसके बदले में नाव पर सवार होने का अनुरोध किया। नौका के मालिक ने रोटी फेंकते हुए कहाः रोटी की क्या उपयोगिता है? रोटी इतनी अधिक मात्रा में मौजूद है कि पैर के नीचे रौंदी जाती है। जब हज़रत दानियाल पैग़म्बर ने यह स्थिति देखी तो आकाश की ओर हाथ उठाते हुए कहाः हे प्रभु! रोटी को सम्मान दे! तू देख रहा है कि इन दासों ने रोटी के साथ क्या किया। ईश्वर ने इस प्रार्थना को स्वीकार करते हुए आकाश को वर्षा न करने और धरती को सूखी मिट्टी की भांति सूखने का आदेश दिया। इसके परिणाम में ऐसा भीषण सूखा पड़ा कि लोग एक दूसरे के शत्रु हो गए और इस स्थिति से मुक्ति पाने के लिए हज़रत दानियाल पैग़म्बर के पास पहुंचे। जब दानियाल पैग़म्बर ने लोगों की समस्याओं व पीणाओं को देखा तो आकाश की ओर हाथ उठाते हुए कहाः भे प्रभु! अपनी अनुकंपाएं हम पर फिर से भेज दे और निर्दोष लोगों व बच्चों पर नौका के मालिक के पाप के कारण प्रकोप न भेज जिसने तेरी अनुकंपा का अनादर किया। इस्लाम ने सामूहिक रूप से खाना खाने पर बल दिया है। इसी श्रेणी में परिवार के सदस्यों या नौकरों के साथ बैठ कर खाना खाना शामिल है। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लललाहो अलैहे व आलेही व सल्लम फ़रमाते हैः एक साथ बैठकर खाना खाओ इसमें तुम्हारे लिए विभूतियां हैं। यह कहा जा सकता है कि इस क्रिया की विभूतियों में परिवार के सदस्यों के बीच प्रेम व स्नेह में वृद्धि शामिल है। आज मनोवैज्ञानिक भी सामूहिक रूप से भोजन को प्रशिक्षण के महत्वपूर्ण तत्वों में मानते हैं। वे परिवार के सदस्यों का आह्वान करते हैं कि एक साथ भोजन को प्रशिक्षण का गंभीर विषय समझें और इसके लिए उचित समय विशेष करें। शोध दर्शाते हैं जो बच्चे अपने परिवार के सदस्यों के साथ भोजन करते हैं वह उन बच्चों की तुलना में अधिक स्वस्थ जीवन बिताते हैं जो अकेले खाना खाते हैं। यह बच्चे स्कूल में अधिक सफल होते हैं और धुम्रपान व मादक पदार्थों की ओर कम उन्मुख होते हैं। यह बच्चे अन्य बच्चों की तुलना में अधिक शांत स्वभाव के होते हैं और कम शरारती व झगड़ालु होते हैं। हारवर्ड विश्वविद्यालय में बच्चों से संबंधित संकाय के प्रोफ़ेसर डेविड लोडविग माता पिता से अनुशंसा करते हैं कि यदि खाने के समय वे परिवार के साथ नहीं हो पाते तो सप्ताह में एक दिन ऐसा अवश्य करें कि परिवार के साथ भोजन करें और किसी भी स्थिति में कोई दूसरा कार्यक्रम न बनाएं। डाक्टर लोडविग कहते हैः बच्चों के साथ भोजन करने से आप उनकी समस्याओं में भागीदार बनते हैं। डाक्टर लोडविग माता पिता से अनुशंसा करते हैं कि खाने के बीच में या खाने के पश्चात बच्चों से उनकी दिनचर्या के बारे में बातचीत करें। खाने पर ध्यान के कारण बच्चे अधिक शांति का आभास करेंगे और बिना किसी हिचकिचाहट के अपने मामलों के बारे में आपसे बात करेंगे। इस्लाम में सामूहिक रूप से भोजन करने के कुछ विशेष शिष्टाचार हैं। ईश्वर सूरए अहज़ाब की आयत क्रमांक 53 में किसी के यहां खाने पर जाने और खाना खाने के एक महत्वपूर्ण शिष्टाचार का उल्लेख इन शब्दों में करता हैः जो लोग ईमान लाए हैं, पैग़म्बर के घर में प्रविष्ट न हों मगर यह कि खाने का निमंत्रण दिया गया हो।जब तुम्हें बुलाया जाए तब प्रविष्ट हो, भोजन की प्रतीक्षा में न बैठो।क़ुरआन की इस अनुशंसा में बहुत ही महत्वपूर्ण बिन्दु निहित हैं क्योंकि यदि कोई व्यक्ति बिना निमंत्रण के किसी के घर में प्रविष्ट हो जाए और घर के स्वामी के पास उसके स्वागत के लिए भोजन न हो तो घर का स्वामी लज्जा का आभास करेगा। इसी प्रकार जिस घर से खाने का निमंत्रण दिया गया है वहां निर्धारत समय पूर्व नहीं पहुंचना चाहिए कि घर का स्वामी असुविधा का आभास करे। इमाम जाफ़रे सादिक़ अलैहिस्सलाम फ़रमाते हैः यदि किसी के यहां भोजन के लिए समय से पूर्व पहुंच रहे हो तो जाने से पूर्व कुछ खाकर जाओ ताकि खाने के समय अधिक न खाओ और अपनी गरिमा को सुरक्षित रख सको।मुसलमान बुद्धिजीवी मोहम्मद ग़ज़ाली अपनी किताब अहयाए उलूमिद्दीन में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के आचरण का उल्लेख किया है। वह इस किताब में लोगों के बीच खाना खाने के शिष्टाचार के बारे में कुछ बिन्दुओं का इस प्रकार उल्लेख करते हैः व्यक्ति को अपने सामने रखी हुए भोजन से खाना चाहिए और दस्तरख़ान पर आवश्यकता से अधिक अपना हाथ इधर उधर न बढ़ाए। इसी प्रकार खाते समय दूसरों के खाने और उनके खाने की शैली पर ध्यान नहीं देना चाहिए क्योंकि इससे वे असुविधा का आभास करेंगे। सही शैली यह है कि व्यक्ति खाने के समय केवल अपने काम से काम रखे। इस्लामी संस्कार यह है कि मेज़बान अतिथि से खाना खाना आरंभ करने के लिए कहे जिससे अतिथि सुविधा का आभास करे। इसी प्रकार मेज़बान, मेहमान से पहले खाने से हाथ न रोके। मोहम्मद ग़ज़ाली भोजन आरंभ करने के संबंध में कहते हैः यदि लोगों के बीच प्रतिष्ठित व अधिक आयु के लोग हों तो उनका सम्मान करना चाहिए औज्ञ इतनी प्रतीक्षा करनी चाहिए ताकि वे खाना आरंभ कर दें। मोहम्मद ग़ज़ाली कहते हैः दस्तरख़ान पर मौजूद लोग ऐसे किसी व्यवहार से बचें जो दूसरों की घृणा का कारण बनें। उदाहरण स्वरूप जब मुंह में खाना हो तो बात करने से बचें या ऐसे विषय पर चर्चा से बचें जो घृणा का कारण बनता है। अंत में इस बिन्दु का उल्लेख करते चलें कि इस्लाम में ऐसे वातावरण में खाना खाने से मना किया गया है जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो। इसी प्रकार घमंडी लोगों की भांति या आम शैली से हटकर खाना खाने की निंदा की गई है।

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