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    मदीना की एक मनोहर सुबह

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    पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के ग्यारहवें उत्तराधिकारी हज़रत इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम का शुभ जन्म दिवस है। सन 232 हिजरी क़मरी में आठ रबीउस्सानी की मनोहर सुबह को मदीना नगर में एक महान बच्चे के जन्म का समाचार फैल गया। जी हां इस दिन इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम के सुपुत्र इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम ने इस संसार में आंख खोली। श्रोताओ इस पावन अवसर पर पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पवित्र परिजनों पर सलाम भेजते हैं और उनकी सेवा में श्रृद्धा व्यक्त करने के साथ इस महान हस्ती के उपलब्धी भरे जीवन पर प्रकाश डालेंगे।

    पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों में से हर एक का जन्म दिवस एक ओर आत्मिक ख़ुशी और दूसरी ओर इन महापुरुषों के जीवन के मूल्यवान संदेश लिए होता है क्योंकि पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजन अपने मूल्यवान जीवन भर मानवीय मूल्यों व नैतिक अच्छाइयों के प्रचारक तथा सत्य व न्याय के रक्षक रहे हैं। उन्होंने अपने पूरे जीवन में समझदारी व होशियारी से इस्लाम को बचाने के लिए प्रयास किया और इस्लाम के उद्देश्य की रक्षा की। इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम ने 22 वर्ष की आयु में जनता के मार्गदर्शन का ईश्वरीय दायित्व संभाला ताकि ईश्वर के आदेश से मनुष्य का सत्य व न्याय की ओर मार्गदर्शन करें। यह काल छह वर्षों का था। इस दौरान इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम के सामने बहुत सी रुकावटें व समस्याएं थीं क्योंकि अब्बासी शासकों ने उन पर बहुत सी पाबंदियां लगा रखी थीं।

    इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम अपने पिता इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम के साथ बचपन से बग़दाद के उत्तर में 110 किलोमीटर पर स्थित सामर्रा नगर के एक सैन्य क्षेत्र में देशनिकाला का जीवन बिताना पड़ा। उस समय सामर्रा अब्बासी शासन की राजधानी था और इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम अब्बासी शासन के तत्वों के निरीक्षण में सदैव रहते। इस्लामी इतिहास में मिलता है कि इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम के साथी उनसे बड़ी कठिनाइयों से मिल पाते था। यही कारण है कि इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम अपने कुछ निकटवर्ती साथियों के माध्यम से जनता तक संदेश पहुंचाते थे। उन्होंने अत्याचारियों से संघर्ष में एक क्षण भी संकोच से काम न लिया और रुकावटों व पाबंदियों के बावजूद शुद्ध इस्लामी विचारों का मूल्यवान ख़ज़ाना, मुसलमानों के लिए यादगार के तौर पर छोड़ गए। इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम की ओर से भ्रांतियों के तर्कपूर्ण उत्तर, वैज्ञानिक शास्त्रार्थों में भाग लेकर सत्य का स्पष्ट किया जाना और महान शिष्यों का प्रशिक्षण यह दर्शाता है कि उन्होंने कई प्रकार की योजनाओं द्वारा इस्लामी शिक्षाओं का प्रसार किया है। जैसा कि पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों की अमर शिक्षा फैलती जा रही है इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम के शुभ जन्म की वर्षगांठ पर उनके मूल्यवान कथन का टुकड़ा आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं।

    इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम कहते हैः दो सद्गुण ऐसे हैं जिनसे श्रेष्ठ कोई हालत नहीं है। एक ईश्वर पर आस्था व विश्वास और दूसरे जनसेवा।

    जनसेवा का महत्व इतना अधिक है कि इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम उसका उल्लेख ईश्वर की पर आस्था के बाद किया है। जैसा कि आप जानते हैं कि ईश्वर ने पवित्र क़ुरआन की अनेक आयतों में ईमान के बाद सदकर्म का उल्लेख किया है। इसलिए इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम ने इस स्वर्ण कथन में जनसेवा को सदकर्म के मूल्यवान उदाहरण में गिनवाया है।

    ईश्वर पर आस्था और आम लोगों को लाभ पहुंचाना, एक स्वस्थ सामाज के दो सार्थक सिद्धांत हैं। लोगों को अनेक प्रकार से लाभ पहुंचाया जा सकता है। जैसा कि प्रसिद्ध साहित्यकार राग़िब इस्फ़हानी ने अपनी किताब मुफ़रेदातुल अलफ़ाज़िल क़ुरटन में लिखा हैः लाभ वह चीज़ है जिससे सदकर्म में सहायता मिले इसलिए हर वह काम जो लोगों की सद्कर्म करने में सहायता करे वह मानवता को लाभ पहुंचाने की श्रेणी में आता है। जो लोग ईश्वर पर आस्था के साथ साथ लोगों की सहायता करतें हैं, वह बहुत ऊंचे स्थान पर पहुंचते हैं।

    इस्लामी सदाचार की विशेषता यह है कि इसमें लोगों की समस्याओं का निदान करने, परस्पर सहयोग, सदकर्म तथा जनसेवा विशेष रूप से ईश्वर पर आस्था रखने वालों व सदाचारियों की सेवा पर बहुत ध्यान दिया गया है।

    पवित्र क़ुरआन की आयतों, पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पवित्र परिजनों के कथनों व आचरण पर दृष्टि से यह बात सिद्ध होती है कि अनिवार्य काम के पश्चात मनुष्य को ईश्वर का सामिप्य दिलाने में जनसेवा से बेहतर कोई और चीज़ नहीं है। यही कारण था कि ईश्वरीय दूत व महापुरुष सदैव जनसेवा करते रहे हैं।

    इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम की दृष्टि में ईश्वर पर आस्था रखने वाले मोमिन व्यक्ति के सद्कर्मों के क्रमबद्ध में जनसेवा को सबसे ऊंचा स्थान प्राप्त है। ईमान वाले जनसेवा जैसी विशेषता से अपने व्यक्तित्व को सुशोभित करलें तो हर मोमिन एक दूसरे से सहानुभूति रखेगा, एक दूसरे की सहायता करेगा और एक दूसरे के प्रति दयालु रहेगा।

    इमाम हसन अस्करी अलैहिस सलाम की दृष्टि में पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों के अनुयाई वे लोग हैं जो अपने धार्मिक नेताओं के समान जनसेवा और अपने धर्म बन्धुओं की सेवा के लिए प्रयासरत रहें और ईश्वरीय आदेशों के प्रति कटिबद्ध रहें चाहे वे भलाई करने और बुराई से दूर रहने के आदेश हों। जैसा कि इमाम हसन अस्करी अलैहिस सलाम अपने सुंदर कथन में शीया की परिभाषा इस प्रकार करते हैः अली के अनुयाई वे लोग हैं जो अपने धर्म-बन्धुओं को स्वंय पर प्राथमिकता देते हैं चाहे उन्हें स्वंय आवश्यकता हो। इमाम हसन अस्करी अलैहिस सलाम की दृष्टि में जनसेवा का इतना महत्व है कि वे इस महाकर्म का धर्मगुरुओं व बुद्धिजीवियों के लिए भी उल्लेख करते हैं और जनता के हमदर्द धर्मगुरुओं की प्रशंसा में कहते हैः धर्मगुरुओं व बुद्धिजीवियों का यह समूह जो हमारे श्रद्धालुओं व मित्रों की समस्याओं के निदान तथा उनके मार्गदर्शन के लिए प्रयास करते हैं वे प्रलय के दिन इस प्रकार हश्र के मैदान में प्रविष्ट होंगे कि उनके सिर पर महानता का मुकुट होगा जिससे निकलने वाले प्रकाश से सारी जगह प्रकाशमय हो जाएगी और हश्र के मैदान में उपस्थित सभी लोग उस प्रकाश से लाभान्वित होंगे। हश्र का अर्थ है प्रलय के दिन सभी लोगों को ईश्वर पुनः जीवित कर उनसे इस संसार के कर्मों का हिसाब किताब लेगा। जो अच्छे होंगे उन्हें स्वर्ग भेजेगा और जो बुरे होंगे उन्हें नरक भेज देगा।

    अबु हाशिम नाम का एक व्यक्ति कहता है कि मैं एक दिन इमाम हसन अस्करी अलैहिस सलाम की सेवा में उपस्थित था कि उन्होंने कहाः स्वर्ग के एक द्वार का नाम बाबुल मारूफ़ है। उस द्वार से केवल वे लोग प्रविष्ट होंगे जिन्होंने दुनिया में भले कर्म किए होंगे और जनसेवा की होगी।

    अबु हाशिम कहता है जब मैंने इमाम हसन अस्करी अलैहिस सलाम से यह वाक्य सुने तो ईश्वर का आभार प्रकट किया और बहुत प्रसन्न हुआ क्योंकि मेरे जीवन का एक कार्यक्रम जनसेवा और वंचितों की समस्याओं का निदान करना था। यह बात जैसे ही मेरे मन में आयी इमाम ने मुझे देखा और कहाः हां जो लोग इस दुनिया में लोगों की सहायता करते हैं परलोक में भी उनका सिर ऊंचा रहेगा और उनका स्थान ऊंचा होगा। हे अबु हाशिम ईश्वर तुम्हें इस समूह का भाग क़रार दे और तुम पर अपनी कृपा करे।

    चूंकि पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजन उच्च मानवीय विशेषताओं का संपूर्ण व श्रेष्ठ नमूना हैं उनका व्यवहार सभी आयामों से उनके कथनों की पुष्टि करता है। आम लोगों की समस्याओं का निदान करने की दृष्टि से भी इमाम हसन अस्करी सबसे आगे थे।

    इस्लामी इतिहास में मोहम्मद बिन अली नामक व्यक्ति के जीवन की एक घटना का उल्लेख मिलता है वह कहता हैः निर्धनता के कारण हमारे परिवार के लिए जीवन यापन कठिन हो गया। मैं और मेरे पिता जिससे भी सहायता मांगते थे कोई ध्यान नहीं देता था। मेरे पिता ने मुझसे कहाः चलो! इमाम हसन अस्करी की सेवा में चलते हैं। कहते हैं कि वह दानी व्यक्ति हैं और दान-दक्षिणा में प्रसिद्ध हैं। दोनों साथ चल पड़े। मार्ग में मेरे पिता ने कहा कितना अच्छा होगा अगर वह महापुरुष मुझे 500 दिरहम देने का आदेश दे ताकि उससे हम अपनी ज़रुरतों को पूरी कर सकें। 200 दिरहम कपड़े के लिए 200 दिरहम क़र्ज़ चुकाने के लिए और 100 दिरहम दूसरे ख़र्चों के लिए। मैंने अपने मन में सोचा कि काश वह मेरे लिए भी 300 दिरहम का आदेश दे दें कि 100 दिरहम से अच्छी सवारी ख़रीद लूं, 100 दिरहम ख़र्च के लिए और 100 दिरहम कपड़ों के लिए हो जाए। जब हम इमाम हसन अस्करी अलैहिस सलाम के घर के निकट पहुंचे तो उनका नौकर बाहर आया और उसने कहाः अली इब्ने इब्राहीम और उनके बेटे मोहम्मद दाख़िल हों। जब घर में प्रविष्ट हुए और इमाम हसन अस्करी अलैहिस सलाम को सलाम किया तो उन्होंने कहाः हे अली अब तक हमारे पास क्यों नहीं आए? मेरे पिता ने कहाः हे मेरे मालिक इस हालत में आपके पास आते हुए शर्म आती थी। जब हम इमाम हसन अस्करी अलैहिस सलाम से विदा होकर बाहर आए तो एक नौकर आया और उसने पैसों की एक थैली मेरे पिता को दी और कहा कि इसमें 500 दिरहम हैं। 200 दिरहम कपड़ों के लिए, 200 दिरहम क़र्ज़ चुकाने के लिए और 100 दिरहम दूसरे ख़र्चों के लिए। उसके बाद उसने दूसरी थैली निकाली और मुझे देते हुए कहाः यह 300 दिरहम हैं। 100 दिरहम सवारी ख़रीदने के लिए, 100 दिरहम कपड़ों के लिए और 100 दिरहम बाक़ी ख़र्चों के लिए।