islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. मसलों में टकराव

    मसलों में टकराव

    Rate this post

    सवालः अगर समाजी, सियासी और कल्चरल मसलों में वली-ए-अम्रे मुस्लेमीन और दूसरे मरजए तक़लीद (जिसकी तक़लीद की जाये) के फ़त्वों में टकराव व इख़्तिलाफ़ हो तो ऐसे में मुसलमानों पर दीनी ज़िम्मेदारी क्या है? क्या कोई ऐसा पैमाना है जो वली-अम्रे मुस्लेमीन और मरजा के बयान किये हुए अह़काम में फ़र्क़ पैदा कर सके, मिसाल के तौर पर अगर म्युज़िक के बारे में मरजये तक़लीद और वली-ए-अम्रे मुसलेमीन का नज़रिया अलग अलग हो तो किस की पैरवी वाजिब व काफ़ी है, और आम तौर पर वह कौन से सरकारी अहकाम हैं जिनमें मरजए तक़लीद के फ़त्वे को छोड़ कर वली-ए-अम्रे मुस्लेमीन का हुक्म मानना ज़रूरी है?

    जवाबः इस्लामी मुल्क के सिस्टम और मुसलमानों के आम मसाएल में वली-ए-अम्रे मुस्लेमीन का ह़ुक्म माना जायेगा और निजी मसलों में मुकल्लफ़ अपने मरजए तक़लीद का हुक्म मानेगा।