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    मस्जिद के अहकाम – 1

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    सवाल 386:  इस बात को नज़र में रखते हुए कि अपने मोहल्ले की मस्जिद में नमाज़ पढ़ना मुस्तहब है क्या अपने मोहल्ले की मस्जिद छोड़ कर जमाअत की नमाज़ पढ़ने के लिये शहर की जामा मस्जिद जाने में कोई हर्ज है?

    जवाब: अगर अपने मोहल्ले की मस्जिद छोड़ना दूसरी मस्जिद में नमाज़े जमाअत में शिर्कत के लिये हो खुसूसन शहर की जामा मस्जिद में तो इस में कोई हर्ज नहीं है।
    सवाल 387:  उस मस्जिद में नमाज़ पढ़ने का क्या हुक्म है जिसके बानी ये कहते हैं कि ये मस्जिद हमने अपने लिये और अपने क़बीले वालों के लिये बनाई है?
    जवाब:  मस्जिद जब मस्जिद के नाम से तामीर की जाये तो क़ौम क़बीला और लोगों से मख़सूस नहीं रहती बल्कि इससे तमाम मुसलमान फ़ायदा उठा सकते हैं।
    सवाल 388: औरतों के लिये मस्जिद में नमाज़ पढ़ना अफ़ज़ल है या घर में?
    जवाब: मस्जिद में नमाज़ पढ़ने की फ़ज़ीलत सिर्फ़ मर्दों के लिये मख़सूस नहीं है।
    सवाल 389: दौरे हाज़िर में मस्जिदुलहराम और सफ़ा व मरवाह के मक़ामे सई के दर्मियान तक़रीबन आधा मीटर ऊंची और एक मीटर चैड़ी दीवार है, ये मस्जिद और सई की जगह के दर्मियान मुशतरक दीवार है क्या वे औरतें इस दीवार पर बैठ सकती हैं जिनके लिये अय्यामे नजासत के दौरान मस्जिदुलहराम में दाख़िल होना जाएज़ नहीं है?
    जवाब: इस में काई हर्ज नहीं मगर जब यक़ीन हो जाये कि वो मस्जिद से मुलहक़ है तो जाएज़ नहीं।
    सवाल 390:  क्या मोहल्ले की मस्जिद में वरजि़श करना और सोना जाएज़ है और इस सिलसिले में दूसरी मसाजिद का क्या हुक्म है?
    जवाब: मस्जिद वरजि़शगाह नहीं है और जो काम मस्जिद के शायाने शान नहीं हैं उन्हें मस्जिद में अंजाम देना जाएज़ नहीं है और मस्जिद में सोना मकरूह है।
    सवाल 391:  क्या मस्जिद के हाल में जवानों की फ़ितरी सक़ाफ़ती और फ़ौजी (फ़ौजी तालीम के ज़रिये) और तरक़्क़ी के लिये फ़ायदा उठाया जा सकता है? और इस चीज़ को मद्देनज़र रखते हुए कि इन कामों के मरकज़ कम हैं, इन्हें मस्जिद में अंजाम देने का शरई हुक्म क्या है?
    जवाब:  ये चीज़ें मस्जिद के सहन व दालान के वक़्फ़ की कैफ़ियत से जुड़ी हैं और इस सिलसिले में मस्जिद के इमामे जमाअत और इंतज़ामिया की राय हासिल करना वाजिब है लेकिन इमामे जमाअत और इंतेज़ामिया की नज़र में जवानों को मस्जिद में जमा करना और दीनी क्लासें लगाना अच्छा काम है।
    सवाल 392: कुछ इलाक़े ख़ास तौर पर देहातों में लोग मस्जिदों में शादी का जश्न मनाते हैं यानी वो नाच और गाना तो घरों में करते हैं लेकिन सुबह या शाम का खाना मस्जिद में खिलाते हैं, शरीअत के लिहाज़ से ये जाएज़ है या नहीं?
    जवाब:  मेहमानों को मस्जिद में खाना खिलाने में कोई ऐतराज़ नहीं है।
    सवाल 393: क़ौमी कोआप्रेटिव कंपनियां रहने के लिये फ़्लैट और कॉलोनियां बनाती हैं, शुरू में इस बात पर इत्तिफ़ाक़ होता है कि इन फ़्लैटों में उमूमी मक़ामात जैसे मस्जिदें वग़ैरह होंगी लेकिन अब जब कि घर हिस्से वालों को दे दिये गये हैं क्या इनमें से कुछ के लिये जाएज़ है कि वो क़रारदाद (ऐगरीमेन्ड) को तोड़ दें और ये कह दें कि हम मस्जिद की तामीर के लिये राज़ी नहीं हैं?
    जवाब: अगर कंपनी अपने तमाम मिम्बरान की मरज़ी से मस्जिद की तामीर का अक़दाम करे और मस्जिद तैयार होने के बाद वक़्फ़ हो जाये तो अपनी पहली राय से कुछ मिम्बरान के फिर जाने से इस पर कोई असर नहीं पड़ेगा लेकिन अगर मस्जिद के शरई तौर पर वक़्फ़ होने से पहले कुछ मिम्बरान अपनी साबेक़ा मुवाफे़क़त से फिरे तो सभी अराकीन की रज़ामंदी के बग़ैर मस्जिद तामीर करना जाएज़ नहीं है मगर ये कि कंम्पनी के तमाम मिम्बरान से ज़रूरी मुआहेदे के ज़िम्न में ये शर्त कर ली गई हो कि ज़मीन का एक हिस्सा मस्जिद की तामीर के लिये मख़सूस किया जायेगा और तमाम मिम्बरान ने इस शर्त को क़ुबूल किया हो तो इस सूरत में उन्हें अपनी राय से फि़रने का कोई हक़ नहीं है और न ही इनके फिरने से कोई असर पड़ सकता है।
    सवाल 394: ग़ैर इस्लामी तहज़ीबी और सयासी जंग का मुक़ाबला करने के लिये हम ने मस्जिद में इब्तिदाई और मिडिल क्लासों के तीस लड़कों को गिरोहे फि़क्री की शक्ल में जमा किया है इस गिरोह के लोगों को उम्री व फि़क्री इरतेदाद (इस्लाम से फिरना) के मुताबिक़ कु़रआने करीम, अहकाम और इस्लामी अख़लाक़ का दर्स दिया जाता है, इस काम का क्या हुक्म है? और अगर ये लोग मुसीक़ी इस्तेमाल करें तो इसका क्या हुक्म है? और शरई क़नून की रिआयत करते हुए मस्जिद में इस की मश्क़ (तमरीन, प्रेकटिस) करने का क्या हुक्म है?
    जवाब: मस्जिद में क़ुरआँने करीम, अहकाम और इस्लामी अख़लाक़ की तालीम देने और मज़हबी व इंके़लाबी तरानों की तमरीन करने में कोई हर्ज नहीं है लेकिन बहरहाल मस्जिद के शान व मक़ाम और तक़द्दुस का ख़याल करना वाजिब है और नमाजि़यों के लिये रुकावट पैदा करना जाएज़ नहीं है। तहज़ीबी और सक़ाफ़ती चढाई का मुक़ाबला और अम्र बिल मारूफ़ व नहीं अनिल मुनकर का फ़रीज़ा अंजाम देने में मुसीक़ी के औज़ार का इस्तेमाल जाएज़ नहीं है, ख़ास तौर पर मस्जिद में।