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    मस्जिद के अहकाम

    मस्जिद के अहकाम
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    सवाल 386:  इस बात को नज़र में रखते हुए कि अपने मोहल्ले की मस्जिद में नमाज़ पढ़ना मुस्तहब है क्या अपने मोहल्ले की मस्जिद छोड़ कर जमाअत की नमाज़ पढ़ने के लिये शहर की जामा मस्जिद जाने में कोई हर्ज है?
    जवाब: अगर अपने मोहल्ले की मस्जिद छोड़ना दूसरी मस्जिद में नमाज़े जमाअत में शिर्कत के लिये हो खुसूसन शहर की जामा मस्जिद में तो इस में कोई हर्ज नहीं है।
    सवाल 387:  उस मस्जिद में नमाज़ पढ़ने का क्या हुक्म है जिसके बानी ये कहते हैं कि ये मस्जिद हमने अपने लिये और अपने क़बीले वालों के लिये बनाई है?
    जवाब:  मस्जिद जब मस्जिद के नाम से तामीर की जाये तो क़ौम क़बीला और लोगों से मख़सूस नहीं रहती बल्कि इससे तमाम मुसलमान फ़ायदा उठा सकते हैं।
    सवाल 388: औरतों के लिये मस्जिद में नमाज़ पढ़ना अफ़ज़ल है या घर में?
    जवाब: मस्जिद में नमाज़ पढ़ने की फ़ज़ीलत सिर्फ़ मर्दों के लिये मख़सूस नहीं है।
    सवाल 389: दौरे हाज़िर में मस्जिदुलहराम और सफ़ा व मरवाह के मक़ामे सई के दर्मियान तक़रीबन आधा मीटर ऊंची और एक मीटर चैड़ी दीवार है, ये मस्जिद और सई की जगह के दर्मियान मुशतरक दीवार है क्या वे औरतें इस दीवार पर बैठ सकती हैं जिनके लिये अय्यामे नजासत के दौरान मस्जिदुलहराम में दाख़िल होना जाएज़ नहीं है?
    जवाब: इस में काई हर्ज नहीं मगर जब यक़ीन हो जाये कि वो मस्जिद से मुलहक़ है तो जाएज़ नहीं।
    सवाल 390:  क्या मोहल्ले की मस्जिद में वरजि़श करना और सोना जाएज़ है और इस सिलसिले में दूसरी मसाजिद का क्या हुक्म है?
    जवाब: मस्जिद वरजि़शगाह नहीं है और जो काम मस्जिद के शायाने शान नहीं हैं उन्हें मस्जिद में अंजाम देना जाएज़ नहीं है और मस्जिद में सोना मकरूह है।
    सवाल 391:  क्या मस्जिद के हाल में जवानों की फ़ितरी सक़ाफ़ती और फ़ौजी (फ़ौजी तालीम के ज़रिये) और तरक़्क़ी के लिये फ़ायदा उठाया जा सकता है? और इस चीज़ को मद्देनज़र रखते हुए कि इन कामों के मरकज़ कम हैं, इन्हें मस्जिद में अंजाम देने का शरई हुक्म क्या है?
    जवाब:  ये चीज़ें मस्जिद के सहन व दालान के वक़्फ़ की कैफ़ियत से जुड़ी हैं और इस सिलसिले में मस्जिद के इमामे जमाअत और इंतज़ामिया की राय हासिल करना वाजिब है लेकिन इमामे जमाअत और इंतेज़ामिया की नज़र में जवानों को मस्जिद में जमा करना और दीनी क्लासें लगाना अच्छा काम है।
    सवाल 392: कुछ इलाक़े ख़ास तौर पर देहातों में लोग मस्जिदों में शादी का जश्न मनाते हैं यानी वो नाच और गाना तो घरों में करते हैं लेकिन सुबह या शाम का खाना मस्जिद में खिलाते हैं, शरीअत के लिहाज़ से ये जाएज़ है या नहीं?
    जवाब:  मेहमानों को मस्जिद में खाना खिलाने में कोई ऐतराज़ नहीं है।
    सवाल 393: क़ौमी कोआप्रेटिव कंपनियां रहने के लिये फ़्लैट और कॉलोनियां बनाती हैं, शुरू में इस बात पर इत्तिफ़ाक़ होता है कि इन फ़्लैटों में उमूमी मक़ामात जैसे मस्जिदें वग़ैरह होंगी लेकिन अब जब कि घर हिस्से वालों को दे दिये गये हैं क्या इनमें से कुछ के लिये जाएज़ है कि वो क़रारदाद (ऐगरीमेन्ड) को तोड़ दें और ये कह दें कि हम मस्जिद की तामीर के लिये राज़ी नहीं हैं?
    जवाब: अगर कंपनी अपने तमाम मिम्बरान की मरज़ी से मस्जिद की तामीर का अक़दाम करे और मस्जिद तैयार होने के बाद वक़्फ़ हो जाये तो अपनी पहली राय से कुछ मिम्बरान के फिर जाने से इस पर कोई असर नहीं पड़ेगा लेकिन अगर मस्जिद के शरई तौर पर वक़्फ़ होने से पहले कुछ मिम्बरान अपनी साबेक़ा मुवाफे़क़त से फिरे तो सभी अराकीन की रज़ामंदी के बग़ैर मस्जिद तामीर करना जाएज़ नहीं है मगर ये कि कंम्पनी के तमाम मिम्बरान से ज़रूरी मुआहेदे के ज़िम्न में ये शर्त कर ली गई हो कि ज़मीन का एक हिस्सा मस्जिद की तामीर के लिये मख़सूस किया जायेगा और तमाम मिम्बरान ने इस शर्त को क़ुबूल किया हो तो इस सूरत में उन्हें अपनी राय से फि़रने का कोई हक़ नहीं है और न ही इनके फिरने से कोई असर पड़ सकता है।
    सवाल 394: ग़ैर इस्लामी तहज़ीबी और सयासी जंग का मुक़ाबला करने के लिये हम ने मस्जिद में इब्तिदाई और मिडिल क्लासों के तीस लड़कों को गिरोहे फि़क्री की शक्ल में जमा किया है इस गिरोह के लोगों को उम्री व फि़क्री इरतेदाद (इस्लाम से फिरना) के मुताबिक़ कु़रआने करीम, अहकाम और इस्लामी अख़लाक़ का दर्स दिया जाता है, इस काम का क्या हुक्म है? और अगर ये लोग मुसीक़ी इस्तेमाल करें तो इसका क्या हुक्म है? और शरई क़नून की रिआयत करते हुए मस्जिद में इस की मश्क़ (तमरीन, प्रेकटिस) करने का क्या हुक्म है?
    जवाब: मस्जिद में क़ुरआँने करीम, अहकाम और इस्लामी अख़लाक़ की तालीम देने और मज़हबी व इंके़लाबी तरानों की तमरीन करने में कोई हर्ज नहीं है लेकिन बहरहाल मस्जिद के शान व मक़ाम और तक़द्दुस का ख़याल करना वाजिब है और नमाजि़यों के लिये रुकावट पैदा करना जाएज़ नहीं है। तहज़ीबी और सक़ाफ़ती चढाई का मुक़ाबला और अम्र बिल मारूफ़ व नहीं अनिल मुनकर का फ़रीज़ा अंजाम देने में मुसीक़ी के औज़ार का इस्तेमाल जाएज़ नहीं है, ख़ास तौर पर मस्जिद में।
    सवाल 395:  क्या मस्जिद में उन लोगों को जो क़ुरआँन की तालीम के लिये शिरकत करते हैं ऐसी फि़ल्में दिखाने में कोई हर्ज है जिन को ईरान की वेज़ारते सक़ाफ़त ने जारी किया हो?
    जवाब: मस्जिद को फ़िल्म दिखाने की जगह में तब्दील करना जाएज़ नहीं है लेकिन ज़रूरत के वक़्त और मस्जिद के पेश नमाज़ की नेगरानी में मुफ़ीद मफ़हूम वाली मज़हबी और इंक़ेलाबी फि़ल्में दिखाने में कोई हर्ज नहीं है।
    सवाल: क्या आइम्म-ए-मासूमीन (अ0) की विलादत के मौक़े पर मस्जिद में मज़हबी मुसीक़ी के नश्र करने में कोई शरई ऐतराज़ है?
    जवाब: वाज़ेह रहे कि मस्जिद का एक ख़ास शरई मक़ाम व मर्तबा है इस में मयुज़िक़ चलाना अगर इसकी अज़मत के ख़िलाफ़ हो तो हराम है, अगर्चे मयुज़िक सुसूर भी न लाने वाली हो।
    सवाल 397: मसाजिद के लाउडस्पीकर, जिस की आवाज़ मस्जिद के बाहर सुनी जाती है, इस्तेमाल कब जाएज़ है? और अज़ान से पहले उस पर तिलावत और इन्क़ेलाबी तराने लगाने का क्या हुक्म है?
    जवाब: जिन औक़ात में महल्ले वालों और पड़ौसियों के लिये तकलीफ़ का सबब न हो उस में अज़ान से पहले कुछ मिनट तिलावते कु़रआँन लगाने में हर्ज नहीं है।
    सवाल 398:  जामा मस्जिद की तारीफ़ क्या है?
    जवाब: वोह मस्जिद जो शहर में तमाम शहर वालों के इख़ट्टा होने के लिये बनाई जाती है और किसी ख़ास गिरोह से मख़सूस नहीं होती है।
    सवाल: तीन साल से एक मस्जिद की छत वाला हिस्सा वीरान पड़ा था उस में नमाज़ नहीं होती थी और वोह खंडर बन चुका था, उसका एक हिस्सा स्टोर के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है, ख़िदमतगारों ने जो तक़रीबन पन्द्रह साल से इस छत वाले हिस्से में रहते हैं इस में कुछ तामीराती काम किया है क्योंकि इसकी हालत बहुत ही ग़ैर मुनासिब थी और उसकी छत गिरने के क़रीब थी और चूँकि ये लोग मस्जिद के शरई अहकाम को नहीं जानते थे और जो लोग जानते थे उन्होंने भी इन को नहीं बताया, लेहाज़ा उन्होंने छत वाले हिस्से में कुछ कमरे बनवाये जिन पर काफ़ी रक़्म ख़र्च हुई अब तामीर का काम ख़त्म होने वाला है बराये मेहरबानी नीचे दिये गये हुक्मे शरई से मुत्तला फ़रमायें:
    1-  फ़र्ज़ कीजिये इस काम के करने वाले और इस की देख भाल करने वाली कमेटी के मिंबरान मसअला नहीं जानते थे तो क्या वो लोग बैतुल माल से ख़र्च की जाने वाली रक़्म के ज़ामिन हैं और वो गुनाहगार हैं या नहीं?
    2- इस बात को ध्यान में रखते हुए कि रक़्म बैतुल माल से ख़र्च हुई है क्या आप इजाज़त देते हैं कि जब तक मस्जिद को इस हिस्से की ज़रूरत नहीं है और इस में नमाज़ क़ायम नहीं होती, इन कमरों से मस्जिद के शरई अहकाम व हुदूद की रेआयत करते हुए कुरआँन व अहकामे शरीअत की तालीम और मस्जिद के दूसरे कामों के लिये फ़ाएदा उठाया जाये या इन कमरों को फौरन गिरा देना वाजिब है?
    जवाब: मस्जिद के छत वाले हिस्से में बने हुए कमरों को गिरा के उस को पहले वाली हालत पर लौटाना वाजिब है और ख़र्च शुदा रक़्म के बारे में अगर ज़्यादती न हुई हो या जान बूझ कर ऐसा न किया गया हो और मालूम नहीं हो कि इसका कोई ज़ामिन है और मस्जिद के छत वाले हिस्से में तिलावते कु़रआन, अहकामे शरई, इस्लामी और मआरूफ़ की तालीम और दूसरे दीनी व मज़हबी पोग्राम मुनअकि़द करने में अगर नमाज़ गुज़ारों के लिये ज़हमत न हो और इमामे जमाअत की निगरानी में हों तो कोई हर्ज नहीं है और इमामे जमाअत, वहां के ख़ादिमों और मस्जिद के दूसरे ज़िम्मेदार हज़रात पर एक दूसरे के साथ तआवुन करना वाजिब है ताकि मस्जिद में ख़िदमत गुज़ीरों का वजूद भी जारी रहे और मस्जिद के इबादती फ़राइज़ जैसे नमाज़ वग़ैरह में भी कोई रुकावट न हो।
    सवाल 400: एक सड़क को बड़ा करने के प्रोगिराम में कई मस्जिदें आती हैं। प्रोगिराम के ऐतबार से कुछ मस्जिदें पूरी गिरी होती हैं और कुछ का कुछ हिस्सा गिराया जायेगा ताकि ट्रेफ़िक में आसानी हो बराए मेहरबानी इस सिलसिले में अपनी राय बयान फ़रमायें?
    जवाब: मस्जिद या उसके किसी हिस्से को मिसमार करना जाएज़ नहीं है मगर ऐसी मसलेहत की बिना पर कि जिस को नज़र अंदाज़ न किया जा सकता हो।
    सवाल 401: क्या मस्जिद के वुज़ू के लिये मख़सूस पानी को कम मेक़दार में अपने ज़ाती इस्तेमाल में लाना जाएज़ है मसलन दुकानदार पीने, चाय बनाने या मोटर गाड़ी में डालने में इस्तेमाल करें, वाज़ेह रहे कि इस मस्जिद का वक़्फ़ करने वाला कोई एक शख़्स नहीं है जो इससे मना करे?
    जवाब: अगर मालूम न हो कि ये पानी सिर्फ़ नमाज़ गुज़ारों के लिये वक़्फ़ है और इस मोहल्ले में ये राइज हो कि इसके पड़ौसी और रास्ता चलने वाले उसके पानी से फ़ाएदा उठाते हैं तो इस में कोई हर्ज नहीं है अगर्चे इस सिलसिले में ऐहतियात बेहतर है।
    सवाल: 402 क़ब्रिस्तान के पास मस्जिद है जब कुछ मोमिन कुबूर की ज़ियारत के लिये आते हैं तो अपने किसी अज़ीज़ की क़ब्र पर पानी छिड़कने के लिये इस मस्जिद से पानी लेते हैं और हम ये नहीं जानते कि ये पानी मस्जिद के लिये वक़्फ़ है या लोगों के फ़ायदे के लिये है और बिलफ़र्ज़ अगर ये मस्जिद के लिये वक़्फ़ न हो तो मालूम नहीं कि ये वुज़ू और तहारत के साथ मख़सूस है या नहीं तो क्या इसे क़ब्र पर छिड़कना जाएज़ है?
    जवाब: इन क़बरों पर पानी छिड़कने के लिये मस्जिद से फ़ाएदा उठाना जो इससे बाहर हैं अगर लोगों में राइज हो और इस पर एतेराज़ न करें और इस बात पर कोई दलील न हो कि पानी सिर्फ़ वुज़ू और तहारत के लिये वक़्फ़ है तो इसके इस्तेमाल में कोई हर्ज नहीं है।
    सवाल 403: अगर मस्जिद में तामीराती काम की ज़रूरत हो तो क्या हाकिमे शरा या उसके वकील की इजाज़त ज़रूरी है?
    जवाब: अगर मस्जिद की तामीर नेक लोग के माल से करना हो तो इस में हाकिमे शरा की इजाज़त ज़रूरी नहीं है।
    सवाल 404: क्या मैं ये वसीयत कर सकता हूँ कि मरने के बाद मुझे मोहल्ले की उस मस्जिद में दफ़्न किया जाये जिसके लिये मैंने बहुत कोशिशें की थीं क्योंकि में चाहता हूं मुझे उस मस्जिद के अन्दर या उसके सहन में दफ़्न किया जाये?
    जवाब: अगर वक़्फ़ करते वक़्त मस्जिद में मय्यत को दफ़्न करने को मुसतसना (अलग) न किया गया हो तो इस में दफ़्न करना जाएज़ नहीं है और इस सिलसिले में आप की वसीयत की कोइ हैसियत नहीं है।
    सवाल 405: एक मस्जिद तक़रीबन बीस साल पहले बनाई गई है और इसे इमामे ज़माना के नामे मुबारक से मन्सूब किया गया है और ये मालूम नहीं है कि मस्जिद का नाम वक़्फ़ करते वक़्त ज़िक्र किया गया है या नहीं तो मस्जिद का नाम साहेबे ज़माना के नामे मुबारक से मन्सूब के बजाये जामा मस्जिद रखने का क्या हुक्म है?
    जवाब: सिर्फ़ मस्जिद का नाम बदलने में कोई हर्ज नहीं है।
    सवाल 406: जिन मस्जिदों में मोमेनीन के अतयों (दी गईं चीज़ों) और मस्जिदें की ख़ास नुज़ूर से बिजली और एयरकन्डीशनल के सिस्टम का इंतेज़ाम किया जाता है जब महल्ले वालों में से कोई मर जाता है तो उसकी फ़ातेहा की मजलिस का ऐहतमाम किया जाता है और मजलिस में मस्जिद की बिजली और एयरकन्डीशन वग़ैरह को इस्तेमाल किया जाता है लेकिन मजलिस करने वाले इसका पैसा अदा नहीं करते शरई नुक़तए नज़र से ये जाएज़ है या नहीं?
    जवाब: मस्जिद की चीज़ों से फ़ातेहा की मजलिस वग़ैरह में इस्तफ़ादा करना वक़्फ़ और नज़र की कैफ़ियत पर मौक़ूफ़ है।
    सवाल 407:  गांव में एक नई मस्जिद है जो पुरानी मस्जिद की जगह बनाई गई है मौजूदा मस्जिद के एक किनारे के जिस की ज़मीन पुरानी मस्जिद का जुज़ है मसअला न जानने की बिना पर चाय वग़ैरह बनाने के लिये एक कमरा तामीर किया गया है और इसी तरह मस्जिद की आधी छत जोकि मस्जिद के हाल के अन्दर है इस पर एक लायब्रेरी बनाई गई है, बराए मेहरबानी इस सिलसिले में अपनी राय बयान फ़रमायें?
    जवाब: पहले वाली मस्जिद की जगह चाय खाना बनाना सही नहीं है और इस जगह को दोबारा मस्जिद की हालत में बदलना वाजिब है मस्जिद के हाल के अन्दर की आधी छत भी मस्जिद के हुक्म में है और इस पर मस्जिद के तमाम शरई अहकाम व क़ानून लागू होंगे लेकिन इस में किताबों की अलमारियां रखने और मोतालेय (पढ़ने) के लिये वहां जमा होने में अगर नमाज़ गुज़ारों के लिये रुकावट या तकलीफ़ न हो तो कोई हर्ज नहीं है।
    सवाल: 408 इस मसअले में आपकी क्या राय है कि एक गांव में एक मस्जिद गिरने वाली है लेकिन फ़िलहाल इसे गिराने की कोई वजह नहीं है क्योंकि वो रास्ते में रूकावट नहीं है क्या पूरी तरह से इस मस्जिद को गिराना जाएज़ है? इस मस्जिद का कुछ सामान और पैसा भी है, ये चीज़ें किस को दी जायें?
    जवाब: मस्जिद को गिराना जाएज़ नहीं है और पूरी तरह से मस्जिद का खण्डर भी मस्जिद के हुक्म में ही होता है और मस्जिद के सामान व माल को अगर इसकी ख़ुद इस मस्जिद को ज़रूरत नहीं है तो फ़ाएदे के लिये दूसरी मस्जिदों में भेजा जा सकता है।
    सवाल 409: क्या मस्जिद के सहन के एक कोने में मस्जिद की इमारत में किसी तसर्रुफ़ (इस्तेमाल) के बग़ैर म्यूजि़यम बनाने में कोई शरई हर्ज है जैसा कि आज कल मस्जिद के अन्दर लायब्रेरी बना दी जाती है?
    जवाब: अगर सहने मस्जिद के कोने में लायब्रेरी या म्यूजि़यम बनाना मस्जिद के हाल और सहन के वक़्फ़ की कैफ़ियत के ख़िलाफ़ या मस्जिद की इमारत में तब्दीली की वजह हो तो जाएज़ नहीं है तो ज़िक्र किये गऐ मक़सद के लिये बेहतर है कि मस्जिद से मुत्तसिल (मिली हुई) किसी जगह का इंतेज़ाम किया जाये।
    सवाल: 410 एक मौक़ूफ़ जगह (एक वक़्फ़ की गई जगह) में मस्जिद दीनी मदरसा और लोगों के लिये लायब्रेरी बनाई गई है और सब काम कर रहे हैं लेकिन इस वक़्त ये सब बलदिया (नगर पालिका) के तौसी वाले नक़्शे में आ रहे हैं (यानी डिबलपमेन्ट वाले नक़शे में आ रहे हैं) जिनका ख़त्म होना बलदिया (नगर पालिका) के लिये ज़रूरी है इनके ख़त्म होने के लिये बलदिया (नगर पालिका) से केसे मदद ली जाये और कैसे इनकी उजरत (क़ीमत) ली जाये ताकि इसके बदले नई और अच्छी इमारत बनाई जाये?
    जवाब: अगर बलदिया (नगर पालिका) इसको मुन्हदिम (ख़त्म) करने और उसकी क़ीमत देने के लिये क़दम उठाये और मुआवेज़ा (क़ीमत) दे तो इस में कोई हर्ज नहीं है लेकिन किसी अहम मसलेहत के बग़ैर कि जिस को नज़र अन्दाज़ करना मुमकिन नहीं है वक़्फ़ की गई मस्जिद व मदरसे को मुन्हदिम करना जाएज़ नहीं है।
    सवाल: 411 मस्जिद की तौसी (डिबलपमेन्ट) के लिये इसके सहन से कुछ दरख़्तों को उखाड़ना ज़रूरी है क्या इनको उखाड़ना जाएज़ है? जबकि मस्जिद का सहन काफ़ी बड़ा है और इस में और भी बहुत से पेड़ हैं।
    जवाब: अगर पेड़ काटने और वक़्फ़ में तब्दीली शुमार न किया जाता है तो इस में कोई हर्ज नहीं है।
    सवाल 412: उस ज़मीन का क्या हुक्म है जो मस्जिद के छत वाले हिस्से का जुज़ थी बाद में बलदिया (नगर पालिका) के तौसी में आने की वजह से मस्जिद के इस हिस्से को मुन्हदिम (गिरा) करके सड़क में तब्दील कर दिया गया?
    जवाब: अगर उसकी पहली हालत की तरफ़ पलटने का यक़ीन न हो तो मामूल नहीं है उस पर मस्जिद के निशान पाये जायें।
    सवाल: 413 एक मस्जिद मुन्हदिम हो (गिर) चुकी है और इसके मस्जिद वाले निशान मिट चुके हैं या उसकी जगह कोई और इमारत बना दी गई है और उसकी नई तामीर की कोई उम्मीद नहीं है मसलन वहां की आबादी वीरान हो गई है और उसने वहां से जगह बदल ली है, क्या उस मस्जिद वाली जगह को नजिस करना हराम है? और उसे पाक करना वाजिब है?
    जवाब: बयान की गई सूरत में मालूम नहीं है कि इसका नजिस करना हराम है अगर्चे ऐहतियात ये है कि इसे नजिस न किया जाये।
    सवाल 414:  मैं एक अर्से से एक मस्जिद में नमाज़े जमाअत पढ़ता हूं और मस्जिद के ख़र्च के सिलसिले में भी मुश्किलात दरपेश हैं क्या मस्जिद के तहख़ाने को मस्जिद के शायाने शान किसी काम के लिये किराय पर दिया जा सकता है?
    जवाब: अगर तहख़ाने पर मस्जिद का उन्वान सादिक़ नहीं आता है (अगर मस्जिद का नाम नहीं आता) और वो इसका ऐसा जुज़ (हिस्सा) भी नहीं है जिसकी मस्जिद को ज़रूरत हो और वोह वक़्फ़ की हालत में भी न हो तो कोई हर्ज नहीं है
    सवाल: 415 मस्जिद के पास कोई जाएदाद नहीं हैं जिससे उसके ख़र्चे पूरे किये जा सकें और मस्जिद के ट्रस्ट ने इसके छत वाले हिस्से के नीचे मस्जिद के ख़र्च पूरा करने के लिये एक तहख़ाना खोदकर उसमें वर्कशाप या दूसरे उमूमी मरकज़ बनाने का फ़ैसला किया है, क्या ये अमल जाएज़ है या नहीं?
    जवाब:  वर्कशॉप वग़ैरह की तामीर के लिये मस्जिद की ज़मीन को खोदना जाएज़ नहीं है।
    सवाल: 416 क्या मुसलमानों की मस्जिद में काफ़िरों का दाख़िल होना जाएज़ है चाहे वह तारीख़ी आसार को देखने के लिये ही हो?
    जवाब: मस्जिदे हराम में दाख़िल होना शरअन मना है और दूसरी मस्जिदों में दाख़िल होना अगर मस्जिद की बेहुरमती शुमार की जाये तो जाएज़ नहीं है बल्कि दूसरी मस्जिदों में भी वह किसी सूरत में दाख़िल न हों।
    सवाल 417: क्या उस मस्जिद में नमाज़ पढ़ना जाएज़ है जो काफि़रों के ज़रिये बनाई गई हो?
    जवाब: कोई हर्ज नहीं है।
    सवाल 418: अगर एक काफ़िर अपनी ख़ुशी से मस्जिद की तामीर के लिये पैसा दे या किसी और तरीक़े से मदद करे तो क्या इसे क़ुबूल करना जाएज़ है?
    जवाब: इस में कोई हर्ज नहीं है।
    सवाल 419: अगर एक शख़्स रात में मस्जिद में आकर सो जाये और उसे एहतेलाम हो जाये (सोते हुऐ मनी निकल जाये) लेकिन जब जागे तो मस्जिद से निकलने पर सलाहियत रखता हो तो उसकी क्या ज़िम्मेदारी है।
    जवाब:  अगर वोह मस्जिद से निकलने और दूसरी जगह जाने की सलाहिय न रखता हो तो उस पर वाजिब है कि फ़ौरन तयम्मुम करे ताकि उसके लिये मस्जिद में बाक़ी रहने जाएज़ हो जाये।