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    महान व्यक्तित्व, अलौकिक दर्पण

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    जब हम अपना मूल्यांकन करना चाहें तो इसका उचित मार्ग यह है कि आदर्श हस्तियों को कसौटी मानकर उनके आचरण पर अपने क्रियाकलापों को तौलें। पैग़म्बरे इस्लाम के पौत्र औरमानव समाज के लिए ईश्वरीय मार्गदर्शक हज़रत इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम का व्यक्ति भी एसी ही एक कसौटी है।

    इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम का जन्म वर्ष 212 हिजरी क़मरी के बारवहें महीने ज़िल्हिज्जा की 15 तारीख़ को भोर समय हुआ। उन्होंने मदीना नगर के निकट सरिया नाम गांव में आंख खोली और अपने आध्यात्मिक प्रकाश से अज्ञानता और नास्तिकता के अंधकार को दूर किया। कुछ ही समय बीता था कि इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम ने इस्लाम की पताका अपने हाथों में उठाई और उसे नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया।

    पिता इमाम मोहम्मद तक़ी अलैहिस्सलाम ने अपने इस नवजात शिशु का नाम अली रखा ताकि अपने महान पूर्वज हज़रत अलीअलैहिस्सलाम के नाम और उनकी याद को ज़िंदा रखें। नक़ी और हादी उनकी सबसे प्रसिद्ध उपाधियां हैं। इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम ने अपने पिता इमाम मोहम्मद तक़ी अलैहिस्सलाम की शहादत के पश्चात वर्ष 220 हिजरी क़मरी में इमाम अर्थात ईश्वरीय मार्गदर्शक का दायित्व संभाला। यदि हम इमामों के जीवन का जायज़ा लें तो हमें उनमें कुछ अंतर दिखाई देगा जिसका संबंध उनके अपने अपने काल की विशेष परिस्थितियों से है। हज़रत अली, हज़रत इमाम हसन और हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने इस्लाम धर्म को प्रचारित और स्थापित करने तथा उसमें नई आत्मा डालने के खुलकर राजनैतिक और कुछ अवसरों पर सशस्त्र संघर्षकिया। इमाम ज़ैनुल आबेदीन, इमाम मोहम्मद बाक़िर और इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम के काल की परिस्थितियां कुछ एसी बनीं कि इन्होंने शिक्षा दीक्षा के माध्यम से इस्लामी नियमों और सिद्धांतों का प्रचार किया। इसके बाद इमाम काज़िम, इमाम अली रज़ा और इमाम मोहम्मद तक़ी अलैहिस्सलाम के कालखंड इस प्रकार के रहे कि उनसे पहले के तीन इमामों के काल की तुलना में राजनैतिक संघर्ष अधिक प्रभावी रूप में किया गया। इमाम काज़िम अलैहिस्सलाम को तत्कालीन अब्बासी शासक हारूनुर्रशीद ने जेल में डाल दिया,उनके पुत्र और आठवें इमाम हज़रत अली रज़ा अलैहिस्सलाम को हारून रशीद के बेटे मामून का उत्तराधिकारी बनने पर विवश किया गया जो ख़लीफ़ा की एक सोची समझी चाल थी। इमाम मोहम्मद तक़ी अलैहिस्सलाम को युवावस्था में ही शहीद कर दिया गया अतःइमाम अली नक़ी अलैहिस्सलामका जीवन अत्याचारी और क्रूर शासकों के काल में गुज़रा। इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम इस्लामी शिक्षाओं को बयान करने के लिए वाद प्रतिवाद की सभाओं, पत्राचार और लोगों के प्रश्नों के उत्तर देने जैसे माध्यमों का प्रयोग किया और जनजागरण के अभियान को आगे बढ़ाया। उन्होंने इस्लाम ज्ञान और नियमों के बड़े ज्ञानियों और विद्वानों का प्रशिक्षण किया।

    इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम ने समन्यव और प्रबंधन के कौशल का प्रयोग करते हुए इस्लामी जगत के अनेक नगरों में बसेपैग़म्बरे इस्लाम और उनके परिजनों के श्रद्धालुओं के मध्य संपर्क के लिए बड़ा प्रभावी तंत्र बना लिया जिसके अंतर्गत उनके दूत इस्लामी जगत के विभिन्न भागों में जाते और श्रद्धालुओं से नियमित संपर्क रखते थे। इस प्रकार इमाम का हर संदेश बढ़े विश्वसनीय माध्यम से बहुत कम समय में नियमित रूप से श्रद्धालुओं तक पहुंच जाया करता था। इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम इस प्रकार अपने श्रद्धालुओं के प्रश्नों के उत्तर और उनकी शंकाओं को दूर किया करते थे। वे अपने दूतों के माध्यम से लोगों में चेतना की लहर पैदा करते थे। इस तंत्र से इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम के आंदोलन को बड़ी सहायता मिली।

    इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम के काल में विभिन्न मतों और संस्कृतियों के टकराव के कारण आस्था एवं ज्ञान संबंधी बहसों का वातावरण था। उस काल में अनगिनत मत समाज में फैल गए थे और आस्था संबंधी तथा धार्मिक मामलों में अस्त व्यस्तता की स्थिति उत्पन्न हो गई थी जिसके चलते समाज का वातावरण बड़े बिखराव का शिकार दिखाई पड़ने लगा था। शासक ने इस स्थिति का लाभ उठाकर अपने राजनैतिक स्वार्थ पूरे करना आरंभ कर दिय। इन परिस्थितियों में इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम षडयंत्रों की सही पहिचान करके और परिस्थितियों में मूल बदलाव लाकर शत्रुओं के षडयंत्रों को निष्फल बना दिया। इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम का काल इस्लामी जगत के लिए ज्ञान की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण था। इसी काल में इमाम ने वास्तविक इस्लामी मत के आधारों को मज़बूती दी तथा इस्लामी समाज और पैग़म्बरे इस्लाम के परिजनों के श्रद्धालुओं का बड़े प्रभावी रूप में मार्गदर्शन किया।

    इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम की शिक्षाओं में जो चीज़ें अब तक सुरक्षित हैं उनमें एक ज़ियारते जामेआ कबीरा है। पैग़म्बरे इस्लाम के परिजनों के मज़ार पर पढ़ी जाने वाली यह जियारत वास्तव में संपूर्ण मनुष्य तथा परिपूर्णतः की चोटी पर पहुंच जाने वाली मानवता का सही परिचय कराती है। इस ज़ियारत में परिपूर्ण मनुष्य की गुणों के परिप्रेक्ष्य में एकेश्वरवाद तथा पैग़म्बरे इस्लाम के प्रति श्रद्धा के आयामों को बयान किया है। एक श्रद्धालु के अनुरोध में इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम द्वारा बयान की जाने वाली यह ज़ियारत वाकपटुता का अनमोल नमूना है किंतु साथ ही इसमें इस्लाम धर्म के भीतर इमाम के स्थान और उपयोगिता को प्रदर्शित किया गया है।

    इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम ने इस ज़ियारत में विभिन्न प्रकाशमान आयामों से इमामों को पहचनवाया है ताकि श्रद्धालु इमाम की जीवन शैली के विभिन्न आयामों को देखे और उन्हें अपने जीवन में उतारने का प्रयास करे। इस ज़ियारत में यह भी बताया गया है कि ईश्वरीय मार्गदर्शकों से किस प्रकार बात करनी चाहिए। ज़ियारत का आरंभ श्रद्धालु अपने इमाम पर सलाम के साथ करता है फिर इमाम के कुछ गुणों और विशेषताओं को बयान करता है। ज़ियारत में ईश्वर से इमामों के संपर्क तथा इस्लाम धर्म के नियमों को क्रियान्वित करने हेतु अपनाई गई कार्यशैली के बारे में बताया गया है। इसमें यह तथ्य भी मुख्य रूप से पेश किया गया है कि सत्य सदैव इमामों के साथ और इमाम सदैव सत्य के साथ रहते हैं दोनों कभी भी एक दूसरे से अलग नहीं हो सकते। इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम ने बताया है कि इस्लाम धर्म में इमाम की भूमिका सत्य के मार्ग और धर्म के साक्ष्य की होती है।

    इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम ने इस ज़ियारत में इमामों को पथ प्रदर्शक, अंधकार में दीपक, विवेक के प्रतीक, आम इंसानों की शरण तथा धरती वासियों पर ईश्वर के ठोस तर्क की संज्ञा दी है। उन्हें इसी प्रकार ईश्वर के अस्तित्व का मार्ग दिखाने वाले चिन्हों, तत्वज्ञान के स्रोतों, ईश्वरीय ग्रंथ के स्वामियों, तथा ईश्वरीय दूतों के उत्तराधिकारियों के रूप में पहचनवाया गया है। ज़ियारत में इमामों को सत्यकी ओर ले जाने वाला, ईश्वर की प्रसन्नता का मार्ग दिखाने वाला, निष्ठापूर्ण एकेश्वरवाद का प्रतीक कहा गया है।

    इस ज़ियारत में कहा गया है कि ईश्वर ने इमामों को ज्योति एवं प्रकाश के रूप में पैदा किया तथा उन्हें धरती पर लाकर मानवजाति पर उपकार किया। उन्हें एसे घरों में भेजा जहां ईश्वर का नाम और उसका स्मरण अमर हो जाए। यह वह महान हस्तियां हैं कि जिनका अनुसरण वास्तव में ईश्वर का अनुसरण होता है। सज्जन व्यक्ति इमामों के समक्ष आदर भाव से शीश नवाते हैं तथा उनके प्रकाश से धरती उज्जवलित है। ईश्वर इमामों के माध्यम से लोगों को नरक और विनाश से मुक्ति देता है तथा इन्हीं के माध्यम और उन्हीं के अनुसरण से कल्याण एवं मोक्ष का मार्ग दिखाता है।