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    माँ बाप की क़ज़ा नमाज़ें

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    सवाल 536:  मेरे वालिद बीमार हुए और उसके बाद दो साल तक मरीज़ रहे, इस मर्ज़ की बिना पर अच्छे बुरे में तमीज़ नहीं कर पाते थे यानि उन से सोचने समझने की कु़व्वत ही ख़त्म हो गई थी, चुनांचे दो बर्सो के दौरान उन्होंने न रोज़ा रखा और न ही नमाज़ अदा की, मैं उनका बड़ा बेटा हूं लिहाज़ा क्या मुझ पर उनके रोज़े और नमाज़ों की क़ज़ा वाजिब है जबकि मैं जानता हूँ कि अगर वो ज़िक्र किये गऐ मर्ज़ में मुब्तेला न होते तो उनकी क़ज़ा मुझपर वाजिब थी, इस मसअले में आप मेरी रहनुमाई फ़रमायें।

    जवाब:  अगर उनकी सोचने और समझने की ताक़त इतनी ज़्यादा कमज़ोर नहीं हुई थी के जिसपर जुनून (पागल पन) का उन्वान सादिक़ आ सके और नमाज़ के पूरे औक़ात में भी वो बेहोश नहीं रहते थे तो उनकी छूट जाने वाली नमाज़ों और रोज़ों की क़ज़ा वाजिब है।

    सवाल 537:  अगर एक शख़्स मर जाये तो उसके रोज़े का कफ़्फ़ारा देना किस पर वाजिब है? क्या उसके बेटों और बेटियों पर ये कफ़्फ़ारा देना वाजिब है? या कोई और शख़्स भी दे सकता है?

     

    जवाब:  जो कफ़्फ़ारा बाप पर वाजिब था अगर वो कफ़्फ़ारा इख़्तियारी था यानि वो रोज़ा रखने और खाना खिलाने में इख़्तियार रखता था तो अगर उसके छोड़े हुऐ माल में से कफ़्फ़ारे का देना मुमकिन हो तो उस में से निकाला जाये वरना वाजिब ये है के बड़ा बेटा रोज़े रखे।

     

    सवाल 538:  एक सिन रसीदा (बूढ़ा) आदमी कुछ किसी वजह से अपने घर वालों से अलग हो जाता है और उनसे राब्ता रखने से माज़ूर हो जाता है और यही अपने बाप का सबसे बड़ा बेटा भी है, इसी ज़माने में इसके वालिद का इन्तेक़ाल हो जाता है और वो बाप की क़ज़ा नमाज़ वग़ैरह की तादाद नहीं जानता है और उसके पास इतना माल भी नहीं है कि वो बाप की नमाज़ किसी से पैसे दे कर पढ़वाये, और बुढ़ापे की वजह से ख़ुद भी बाप की क़ज़ा नमाज़ें नहीं पढ़ सकता आख़िर वो क्या करे?

     

    जवाब:  बाप की सिर्फ़ उन्हीं नमाज़ों की क़ज़ा वाजिब है जिनके छूट जाने का बड़े बेटे को इल्म हो और जिस तरीक़े से भी मुमकिन हो बड़े बेटे पर बाप की नमाज़ों की क़ज़ा वाजिब है हां अगर वो इसे अदा न कर सकता हो यहाँ तक कि किसी को अजीर बनाकर (पैसा दे कर) भी तो वो मजबूर है।

     

    सवाल 539:  अगर किसी शख़्स की बड़ी औलाद बेटी हो और दूसरी औलाद बेटा हो तो क्या माँ बाप की क़ज़ा नमाजें और रोज़े उस बेटे पर वाजिब हैं?

     

    जवाब:  मेयार ये है कि बेटों में सबसे बड़ा बेटा हो, अगर उसके वालिद के और बेटे भी हों, लिहाज़ा ज़िक्र किये गये सवाल में माँ और बाप के रोज़े और नमाज़ की क़ज़ा उस बेटे पर वाजिब हैं जो बाप की दूसरी औलाद है और माँ की छूटी हुई नमाज़ों और रोज़ों की क़ज़ा भी वाजिब है।

     

    सवाल 540:  अगर बड़े बेटे का बाप से पहले इन्तेक़ाल हो जाये (चाहे वो बालिग़ हो या नाबालिग़) तो क्या बाक़ी औलाद से बाप की क़ज़ा ख़त्म हो जायेगी?

     

    जवाब:  बाप के रोज़े और नमाज़ की क़ज़ा उस बड़े बेटे पर वाजिब है जो बाप की वफ़ात के वक़्त ज़िन्दा हो चाहे वो बाप की पहली औलाद हो या पहला बेटा न भी हो।

     

    सवाल 541:  मैं अपने बाप की औलाद में बड़ा बेटा हूं, क्या मुझ पर वाजिब है के बाप की क़ज़ा नमाज़ों की अदायगी की ग़र्ज़ से उनकी ज़िन्दगी में इनसे मालूम करूं या उनपर वाजिब है कि वो मुझे उनकी तादाद से बाख़बर करें,पस अगर वो बाख़बर न करें तो मेरा क्या फ़रीज़ा है?

     

    जवाब:  आप पर मालूम करना और सवाल करना वाजिब नहीं है लेकिन इस लिससिले में बाप पर वाजिब है कि जब तक उसके पास फ़ुर्सत है ख़ुद पढ़े और न पढ़ सके तो वसीयत करे, बहरहाल बड़े बेटे की ज़िम्मेदारी है कि वो अपने आप के इन्तेक़ाल के बाद इससे यक़ीनी तौर पर छूट जाने वाले रोज़ों और नमाज़ों की क़ज़ा करे।

     

    सवाल 542:  एक शख़्स का इन्तेक़ाल हुआ और उसका सारा सरमाया वो घर है जिसमें उसकी औलाद रहती है और उसके ज़िम्मे रोज़े और नमाज़ें बाक़ी रह गई हैं और बड़ा बेटा अपनी रोज़ मर्राह मसरूफि़यात की बिना पर उन्हें अदा नहीं कर सकता पस क्या उन पर वाजिब है कि वो इस घर को फरोख़्त करके बाप के रोज़े और नमाज़ें अदा करवायें?

     

    जवाब:  मज़कूरा फ़र्ज़ में घर बेचना वाजिब नहीं है लेकिन बाप की नमाज़ों और रोज़ों की क़ज़ा हर सूरत में उसके बड़े बेटे पर है लेकिन अगर मरने वाला ये वसीयत कर जाये कि उसके माल के एक तिहाई हिस्से से उजरत पर नमाज़ और रोज़े की क़ज़ा कराए और एक तिहाई माल भी उसकी तमाम नमाज़ों और रोज़ों की क़ज़ा के लिये काफ़ी हो तो माल में से एक तिहाई माल इस काम में ख़र्च करना वाजिब है।

     

    सवाल 543:  अगर बड़ा बेटा मर जाये जिस पर बाप की क़ज़ा नमाज़ वाजिब थी तो क्या उन क़ज़ा नमाज़ों को बड़े बेटे के वारिस अदा करेंगे या ये क़ज़ा नमाज़ें उसके दूसरे बड़े बेटे पर वाजिब होंगी?

     

    जवाब:  बाप की जो क़ज़ा नमाज़ें और रोज़े बड़े बेटे पर वाजिब थीं बाप के मर जाने के बाद उस बड़े बेटे के मर जाने की सूरत में उसके बेटे या भाई पर वाजिब नहीं है।

     

    सवाल 544:  अगर बाप ने कोई नमाज़ न पढ़ी हो तो क्या उसकी सारी नमाज़ें क़ज़ा हैं? और बड़े बेटे पर उनका बजा लाना वाजिब है?

     

    जवाब:  ऐहतियाते वाजिब ये है के इस सूरत में भी उसकी नमाज़ों की क़ज़ा वाजिब है।

     

    सवाल 545:  जिस बाप ने जानबूझ कर अपने तमाम इबादी आमाल को छोड़ दिया हो तो क्या बड़े बेटे पर उसकी तमाम नमाज़ों और रोज़ों का अदा करना वाजिब है कि जिनकी मिक़दार 50 साल तक पहुंचती है?

     

    जवाब:  अगर नमाज़ व रोज़े का तर्क बग़ावत की सूरत में हो तो उसकी क़ज़ा बड़े बेटे पर वाजिब नहीं है लेकिन इस सूरत में भी उसकी क़ज़ा बजा लाने की ऐहतियात को छोड़ना नहीं चाहिये।

     

    सवाल 546:  जब बड़े बेटे पर ख़ुद उसकी नमाज़ और रोज़े की भी क़ज़ा हो और बाप के रोज़े और नमाज़ों की क़ज़ा भी हो तो उस वक़्त दोनों में से किसको मुक़द्दम करेगा?

     

    जवाब:  इस सूरत में उसे इख़्तियार है के जिसको भी पहले शुरू करे सही है।

     

    सवाल 547:  मेरे वालिद के ज़िम्मे कुछ कज़ा नमाज़ें हैं लेकिन उन्हें अदा करने की उन में हिम्मत नहीं है और मैं उन का बड़ा बेटा हूं, क्या ये जाएज़ है कि मैं उन की छूट जाने वाली नमाज़ें बजा लाऊं या किसी शख़्स को इस काम के लिये अजीर करूं जबकि वो अभी ज़िन्दा है?

     

    जवाब: ज़िन्दा शख़्स की कज़ा नमाज़ों और रोजों की नियाबत सही नहीं है।