islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. माँ बाप के अधिकार – 2

    माँ बाप के अधिकार – 2

    Rate this post

    2.  अनैतिकता व चिड़चिड़ेपन से परहेज़।
    किसी बात से नाराजगी पर इंसान की सबसे मामूली प्रतिक्रिया यह होती है कि उसकी ज़बान से उफ़्फ़ निकल जाता है और उफ़्फ़ वह आवाज़ है जो किसी मामूली अफ़सोस के क्षणों में इंसान की ज़बान पर आ जाती है, अल्लाह तआला को इतना मामूली शिकवा भी माँ बाप के बारे में बर्दाश्त नहीं है इसी लिए उसने मोमेनीन को उफ़्फ़ तक करने से मना किया है, जैसा कि अल्लाह ताला का इरशादे हैः
    ख़बरदार उनसे (माँ बाप से) उफ़्फ़ तक ना कहना और उन्हें झिड़कना भी नहीं।    (सूरए इसरा/23)
    हज़रत इमाम-ए-जाफ़रे सादिक़ अलैहिस्सलाम का इरशाद हैः
    आक़ होने के लिए सबसे मामूली चीज़ उफ़्फ़ कहना है और अगर अल्लाह तआला की निगाह में कोई और चीज़ उससे तुच्छ और मामूली होती तो वह उससे भी मना कर देता। (बेहारुल अनवार जि 74, पे 6)
    इसलिये जब पहले स्टेज में उफ़्फ़ तक करने से मना कर दिया गया है तो अगर कोई उन्हें बुरा कहे या बुलंद आवाज़ से उनसे बात करे या उन्हें झिड़क दे तो उसका किया हाल होगा ?क्योंकि यह एक बड़ा गुनाह अर्थात गुनाहे कबीरा है।
    इसलिए इस बड़े गुनाह अर्थात गुनाहे कबीरा के बाद जो लोग आक़ हो जाते हैं अगर अल्लाह तआला दूसरे बड़े गुनाहों के अज़ाब की तरह उनका भी सख़्त हिसाब ले और उन्हें दर्दनाक अज़ाब में ग्रस्त कर दे तो इस में कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
    हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम फ़रमाते हैं
    अल्लाह के नज़दीक क़यामत के दिन सबसे बड़े गुनाह यह हैं:
    शिर्क बिल्लाह (अनेकेश्वरवाद), ना हक़ किसी मोमिन को क़त्ल करना, मैदाने जेहाद से फ़रार करना, और माँ बाप का आक़ होना।
    दूसरी हदीस में हैः
    माँ बाप के आक़ हुये से कहा जाएगा कि जो तेरा दिल चाहे अंजाम दे निश्चित रूप से मैं तुझे माफ़ नहीं कर सकता।
    संक्षिप्त रूप से यह कि आक़ होने का नतीजा क़यामत के दिन अल्लाह की माफ़ी और जन्नत से महरूमी है हालांकि यह स्पष्ट रहे कि आक़ होना भी दूसरे गुनाहों की तरह एक गुनाह है और अल्लाह तआला ने अपने बंदो के लिए गुनाहों से तौबा के दरवाज़े खोल रखे हैं इसलिये इंसान अपने माँ बाप को ख़ुश करके आसानी के साथ अपने माज़ी की भरपाई कर सकता है।
    इस स्थान पर दो प्वाइंट की तरफ़ और इशारा ज़रूरी हैः
    1.  कुछ  रिवायतों में माँ बाप से अनैतिकता और उनके द्वारा आक़ होने के नमूने बयान किये गये हैं जैसा कि हज़रत मुहम्मद मुसतफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम का इरशाद हैः
    जिसने अपने माँ बाप को दुखी किया वह आक़ हो गया। (कनजुल उम्माल हदीस 45537)
    हज़रत इमाम-ए-जाफ़रे सादिक़ अलैहिस्सलाम का इरशाद हैः
    माँ बाप की तरफ़ घूर कर देखने से भी इंसान आक़ हो जाता है।
    2.  आक़ होने का मसअला उस समय और संवेदनशील स्टेज में पहुँच जाता है कि जब माँ बाप ने अपनी संतान के ऊपर ज़ुल्म किया हो और उसके बावजूद भी शरियत का मांग यही है कि अपने माँ बाप की तरफ़ गुस्से भरी नज़रें ना उठाए वरना वह भी आक़ होने वालों में गिना जाएगा।
    हज़रत इमाम-ए-जाफ़रे सादिक़ अलैहिस्सलाम का इरशादे गेरामी हैः
    जो शख्स अपने माँ बाप को ग़ुस्से भरी निगाह से देखेगा तो चाहे उन्होंने उस पर ज़ुल्म ही क्यों ना किया हो तब भी अल्लाह तआला उसकी नमाज़ क़बूल नहीं करेगा।
    3.  आक़ होने के लिए यह ज़रूरी नहीं है कि माँ बाप मुस्लमान ही हो बल्कि इस हुक्म के अंदर ग़ैरे मुस्लिम भी शामिल हैं क्योंकि इस्लाम में माँ बाप के अधिकार, आक़ होने की मनाही और वह वाजेबात जिन की अदाएगी के लिए माँ बाप के साथ अच्छा व्यवहार करने को अमली शक्ल मिलती है यह सब अहकाम अब भी उसी शक्ति और मज़बूती के साथ बाक़ी हैं और एक मुसलमान बेटे के लिए शिर्क के अतिरिक्त हर चीज़ में अपने माँ बाप के आज्ञापालन का हुक्म अब भी मौजूद है।
    अल्लाह का इरशाद हैः
    और हम ने इंसान को माँ बाप के बारे में नसीहत की है कि उसकी माँ ने दुख पर दुख सह कर उसे पेट में रखा है और उसकी दूध बढ़ाई भी दो साल में हुई है कि मेरा और अपने माँ बाप का शुक्रिया अदा करो कि तुम सब का पलटना मेरी ही तरफ़ है और अगर तुम्हारे माँ बाप इस बात पर ज़ोर दें कि किसी ऐसी चीज़ को मेरा शरीक बनाओ जिसका तुम्हें इल्म नहीं है तो कदापि उनका आज्ञापालन ना करना लेकिन दुनिया में उन के साथ नेकी का व्यवहार करना।
    जनाबे ज़करिया इबने इब्राहीम पहले ईसाई थे और बाद में हज़रत इमाम-ए-जाफ़रे सादिक़ अलैहिस्सलाम के मुबारक हाथों पर इस्लाम लाए, एक दिन जनाबे ज़करिया ने हज़रत इमाम-ए-जाफ़रे सादिक़ अलैहिस्सलाम से सवाल किया कि मेरे माँ बाप ईसाई हैं मेरी माँ अंधी है और मैं अपने घर वालों के साथ रहता हूँ और उनके बरतनों में उनके साथ खाना खाता हूँ इसका किया हुक्म है?
    इमाम ने सवाल कियाः
    किया वह लोग सुवर का गोश्त खाते हैं?
    जनाबे ज़करिया ने कहाः ऐ मौला! कदापि नहीं खाते हैं।
    तो इमाम ने फ़रमायाः
    तुम उनके साथ खाना खा सकते हो और जितना सम्भव हो अपनी माँ के साथ अच्छा व्यवहार करना।
    इसलिए जनाबे ज़करिया कूफ़े वापिस आये और अपनी माँ के साथ अच्छा व्यहवार करने लगे, उन्हें अपने हाथ से खाना खिलाते थे, खुद ही उनके कपड़े धोते थे, और उनकी सफ़ाई का ख़्याल रखते थे, जिससे उनको बहुत आश्चर्य हुआ तो उन्होंने एक दिन उनसे पूछा कि ऐ बेटा जब तुम ईसाई थे तो मेरे साथ यह अच्छा व्यवहार नहीं करते थे और अब तो तुम मुझ से कुछ ज़्यादा ही मुहब्बत और अच्छा व्यवहार के साथ पेश आ रहे हो?
    तो जनाबे ज़करिया ने अपनी माँ से कहा इस्लामी अदब और अख़लाक़ यही है और हज़रत मुहम्मद मुसतफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम की संतान में से एक आदमी ने मुझे इसकी हेदायत दी है तो उनकी माँ ने कहाः
    बेटा किया वह नबी हैं?
    जनाबे ज़करिया ने जवाब दियाः
    नहीं, बल्कि वह नबी की संतान में से हैं।
    तो उनकी माँ ने जवाब दियाः
    मगर यह तो अम्बिया की हिदायत और ग़ुफ़तगू महसूस होती है।
    जनाबे ज़करिया ने जवाब दियाः
    वह नबी नहीं है बल्कि नबी की संतान में से हैं और इमाम हैं।
    तो उनकी माँ ने बेसाख़ता कहाः
    ऐ मेरे लाल, तुम इसी दीन के पाबंद रहना क्योंकि सबसे बेहतरीन दीन यही है, उनकी माँ ने कहा बेटा ज़रा मुझे अपना मज़हब सिखा दो।
    तो जनाबे ज़करिया ने इस्लामी अक़ाएद, सिद्धांत और उसकी शिक्षाओं को उनके सामने बयान कर दिया और वह उसी समय मुस्लमान हो गयीं, उन्होंने नमाज़ पढ़ना सीखी जब नमाज़े ज़ोहर का समय आया तो नमाज़े ज़ोहर अदा की फिर अस्र की नमाज़ अदा की, सूरज डूब जाने के बाद मग़रिब की नमाज़ पढ़ी और फिर इशा की नमाज़ अदा की।
    और अल्लाह की इच्छा यह थी कि उसी रात उन्होंने दुनिया से कूच किया और अपनी जान का नज़राना अल्लाह की बारगाह में पेश कर दिया और एक मुस्लिमा और मोमिना की सूरत में दुनिया से गयीं, सब मुस्लमान उनकी अंतिम संस्कार में शामिल हुए और सम्मान के साथ इस्लामी अहकाम के अनुसार उन्हें मुसलमानों के क़ब्रिस्तान में दफ़्न किया गया।
    3.  स्नेह और नरमी
    रु में हम ने सूरए इसरा की यह आयत पढ़ी थीः
    واخفض لھماجناح الذّل من الرحمۃ
    और उनके लिए नम्रता के साथ अपने कंधों को झुका देना।
    इस आयत में (خفض جناح) कंधे झुका देने का मतलब यह है कि उनके सामने अत्यंत विनम्रता का प्रदर्शन किया जाए।
    हज़रत इमाम-ए-जाफ़रे सादिक़ अलैहिस्सलाम ने इस आयत का स्पष्टीकरण यूँ किया हैः
    जब भी तुम उनकी तरफ़ देखो तुम्हारी आँखें रहमत, स्नेह और नर्मी से भरी हों और उनकी आवाज़ पर अपनी आवाज़ और उनके हाथ के ऊपर अपना हाथ बुलंद न करना और उनके आगे न चलो। (बेहारुल अनवार जि 74, पे 39/40)
    फिर आपने इस आयत (وقل لھما قولاً کریما) के स्पष्टीकरण में फ़रमाया कि इसका मतलब यह है कि अगर वह तुम को मारें तो उनसे कहो (غفر اللہ لکما) यानी परवरदिगार आप के गुनाहों को माफ करे।

    खुलासा
    इस्लाम एक समाजिक और सोशली दीन है और उसके मानने वाले केवल अल्लाह तआला की इच्छा के लिए और उसकी राह में क़दम उठाते हुए एक दूसरे से सम्बंध और सम्पर्क रखते हैं। इसलिये हमारी भी ज़िम्मेदारी है कि हम अपने ऊपर दूसरों के वाजिब अधिकार को पहचानें ताकि उनको आसानी के साथ अदा करने में हमें मदद मिल सके।
    इन्हीं अधिकारों में से कुछ माँ बाप के अधिकार भी हैं जिनको अल्लाह तआला ने अपने आज्ञापालन के साथ बयान किया है और पैग़म्बरे इस्लाम स. ने भी माँ बाप के साथ अच्छा व्यवहार करने को सब से अहेम कर्तव्य बताया है जैसा कि आप का इरशाद हैः कि वह तुम्हारी जन्नत और दोज़ख़ हैं।
    इसलिये हमारी ज़िम्मेदारी यह है कि माँ बाप के साथ हमेशा अच्छा व्यवहार करें चाहे वह मुस्लमान हों या ग़ैरे मुस्लिम।

    सवालात
    1. माँ बाप के साथ अच्छा व्यवहार (एहसान) करने के बारे में क़ुर्आने मजीद ने किया कहा है ?
    2.  इमाम जैनुल आबदीन अलैहिस्सलाम ने दूसरों के अधिकार ज़िक्र करते हुए माँ के किया अधिकार बयान किये हैं?
    3. आक़ होने के बारे में हज़रत मुहम्मद मुसतफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम की एक हदीस बयान करें?
    4. रिवायात की रौशनी में किस किस चीज़ से संतान आक़ हो सकती है?
    5.  हज़रत इमाम-ए-जाफ़रे सादिक़ अलैहिस्सलाम ने सूरए इसरा की 25वीं आयत की स्पष्टीकरण में किया इरशाद फ़रमाया है?