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    मां- बाप को बच्चों के साथ कैसे व्यवहार करना चाहिये

    मां- बाप को बच्चों के साथ कैसे व्यवहार करना चाहिये
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    कहते हैं कि सुकरात को फांसी देने से पहले उससे पूछा कि तुम्हारी सबसे बड़ी इच्छा क्या है? उसने उत्तर दिया मेरी सबसे बड़ी आकांक्षा यह है कि एथेन्स के सबसे ऊंचे स्थान पर जाऊं और ऊंची आवाज़ में लोगों से कहूं कि हे लोगों क्यूं अपने जीवन के मूल्यवान वर्षों को धन संचित करने में खर्च कर रहे हो, तुम धन के वारिस यानी बच्चों की शिक्षा व प्रशिक्षा को महत्व क्यों नहीं देते हो?

    बहुत से महान व्यक्तियों, विद्वानों और शिक्षा व प्रशिक्षा से जुड़े व्यक्तियों के अनुसार पढ़ाई़- लिखाई के लिए सबसे अच्छा समय बाल्याकाल है। इस आधार पर अगर बच्चे की शिक्षा- प्रशिक्षा के लिए आवश्यक सुविधा व संभावना दी जाये तो उसके अंदर मौजूद योग्ताएं व क्षमताएं अच्छी तरह निखरेंगी। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि बच्चे में अनगिनत क्षमतायें व योग्यताएं निहित हैं और बच्चे के जीवन के जो आरंभिक अनुभव होते हैं वे उसके व्यक्तित्व के निर्माण में बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। इस संबंध में आस्ट्रिया के एक मनोचित्सक अल्फ्रेड एडलर कहता है” चार से पांच वर्ष के भीतर हर व्यक्ति के व्यवहार और जीवन शैली से उसका व्यक्तित्व स्पष्ट हो जाता है और यही बात जीवन के अंतिम समय तक जारी रहती है। अतः जिन बच्चों की उम्र पढ़ने, लिखने और सीखने की होती है उसके सही प्रयोग में किसी प्रकार के संकोच से काम नहीं लिया जाना चाहिये।
    बच्चों की शिक्षा- प्रशिक्षा एक ऐसा विषय है जो प्राचीन समय से महान व्यक्तियों के ध्यान का केन्द्र रहा है। महान व सर्वसमर्थ ईश्वर ने इंसानों की प्रशिक्षा के लिए बहुत सी बातों का आदेश दिया है।

    बच्चों की शिक्षा- प्रशिक्षा महत्वपूर्ण दायित्व है जो माता- पिता और शिक्षक के कांधों पर होता है। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि हर समाज में बड़े और सकारात्मक परिवर्तन का आरंभ बच्चों की शिक्षा- प्रशिक्षा से होता है। जो बच्चे बचपने से ही बुरे हो जाते हैं उनके बुरे प्रभाव से समाज अछूता नहीं रहता है और उसका नकारात्मक प्रभाव समाज पर अवश्य पड़ता है। जो बच्चे खराब हो जाते हैं उसके बहुत से कारण होते हैं उनमें से एक कारण स्वयं माता- पिता या अभिभावक की लापरवरवाही होती है। परिवार का वातावरण बच्चों की प्रशिक्षा में केन्द्रीय भूमिका निभाता है और जीवन की बहुत सी बातें एसी होती हैं जिन्हें बच्चा परिवार में ही सीखता है इसलिए बच्चे की योग्यताओं के निखार में परिवार की विशेष भूमिका व महत्व होता है। महान ईश्वर पवित्र कुरआन के सूरे तहरीम की ६ठीं आयत में कहता है” हे ईमान लाने वालों स्वयं को और अपने परिजनों को नरक की उस आग से बचाओ जिसके ईंधन पत्थर और इंसान हैं”
    महान व कृपालु ईश्वर ईमान लाने वालों से सिफारिश करता है कि वे स्वयं को और अपने परिजनों को नरक की आग से बचायें। इस आयत के अनुसार परिवार के हर सदस्य को चाहिये कि वह अपने परिवार के दूसरे सदस्यों को नरक की आग से बचाने का प्रयास करे और इस आयत में जिस चीज की अनुशंसा की गयी है कि वह परिवार के हर सदस्य से संबंधित है। यहां प्रश्न यह उठता है कि प्रशिक्षा क्या है? इसके उत्तर में विशेषज्ञों का कहना है कि उस क्षमता व योग्यता को निखारना है जो इंसान के अस्तित्व में मौजूद है। परिवार के अभिभावक के रूप में माता- पिता को चाहिये कि वह बच्चों की क्षमताओं व योग्यताओं को निखारने के लिए कार्यक्रम बनायें और उसे अपने बच्चों की प्रशिक्षा के संबंध में व्यवहारिक बनायें।

    समय की पहचान, प्रशिक्षा में एक बहुत महत्वपूर्ण चीज़ है। इसी कारण प्रशिक्षक अनुशंसा करते हैं कि बच्चों की ट्रेनिंग में उतावलेपन या लापरवाही से काम नहीं लिया जाना चाहिये। क्योंकि बच्चों की प्रशिक्षा में बहुत से नकारात्मक परिणाम उतावलेपन और लापरवाही के ही नतीजे होते हैं। बच्चे के अस्तित्व में छिपी क्षमता व योग्यता सीप में छिपे मोती की भांति होती है। अगर सीप का मुंह समय से पहले खोल दिया जाये तो मोती अधूरा रह जायेगा। बच्चों की प्रशिक्षा के भी कुछ प्राकृतिक नियम हैं जिन्हें धीरे धीरे तय किया जाना चाहिये और बच्चों की प्रशिक्षा में न तो उतावलेपन से काम लिया जाना चाहिये और न ही उसकी प्रशिक्षा के किसी चरण की अनदेखी की जानी चाहिये। अगर बच्चों की प्रशिक्षा में इन बातों को ध्यान में न रखा जाये तो प्रशिक्षा अप्राकृतिक होगी।

    आज के आपाधापी और भाग दौड़ के जीवन में शायद बच्चों की प्रशिक्षा के लिए समय देना कठिन कार्य प्रतीत हो परंतु जो चीज़ बच्चे की प्रशिक्षा में महत्वपूर्ण है वह समय से सही लाभ उठाना है। माता- पिता को चाहिये कि वह एक मिनट का भी सही प्रयोग करें और अपने बच्चों से बात करें और उनके प्रश्नों के उत्तर दें उन्हें प्यार करें उनके साथ खेलें बच्चों की चित्रकारी पर ध्यान दें उसे महत्व दें। माता- पिता को चाहिये कि वे अपने कार्यास्थल एवं दफ्तर से भी बच्चों के लिए फोन करें और सप्ताह में उनके लिए कुछ एसे कार्यों के लिए समय विशेष करें जिन्हें वे पसंद करते हैं। जैसे पार्क व सिनेमा जाना, साइकल चलाना और रेस्तरां आदि जाने के लिए समय विशेष करें। अलबत्ता इस बात को नहीं भूलना चाहिये कि बच्चों की अलग अलग आवश्यकताएं और रूचियां होती हैं। जैसे पांच या सात साल का जो बच्चा होता है उसकी आवश्यकताएं व रूचियां एक पांच या सात साल की बच्ची से भिंन्न होंती हैं। तो बच्ची और बच्चे की आवश्यकता एवं रूचि को ध्यान में रखकर कार्यक्रम तैयार किया जाना चाहिये।

    अपने जीवन के आरंभिक वर्षों में बच्चों को हर चीज़ आकर्षक व अच्छी लगती है और उनके जीवन की खुशी जल प्रवाहित नदी की भांति होती है और वे छोटी सी बात पर हंसते हैं और बहुत प्रभावित होते हैं। बच्चे नई नई चीज़ें जानने की जिज्ञासा में होते हैं। वे अपने प्रति माता- पिता के आभासों को अच्छी तरह समझते हैं और उससे प्रभावित होते हैं। माता- पिता और दूसरे लोग बच्चों के संदर्भ में जो कुछ करते व कहते हैं सब कुछ उनके मस्तिष्क में बाकी रहता है। अतः जिस सीमा तक सकारात्मक बातें अधिक होंगी उतना ही बच्चों की योग्यताओं व क्षमताओं को निखरने की भूमि प्रशस्त होगी।
    बच्चों का वांछित विकास, माता- पिता के प्रभावी व रचनात्मक संबंधों का ऋणी है। प्रशिक्षा के सही सिद्धांतों की जानकारी बच्चों के साथ माता- पिता के संबंधों में उनकी सहायता करता है। बच्चों के प्रति माता- पिता के सकारात्मक दृष्टिकोणों का बच्चों के प्रशिक्षण में बहुत प्रभाव पड़ता है। इसका अर्थ यह है कि बच्चों को ईश्वरीय उपहार के रूप में देखना चाहिये और कठिनाइयों व समस्याओं पर ध्यान दिये बिना उन्हें एक इंसान के रूप में स्वीकार करना चाहिये। इस दृष्टिकोण के साथ बच्चे को अपनी योग्यताओं को दर्शाने का अवसर देना चाहिये। वास्तविकता यह है कि बच्चे के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखने से उनमें आत्मविश्वास पैदा होता है। परिवार को प्रेम, ध्यान और सम्मान का केन्द्र होना चाहिये ताकि बच्चे को माता- पिता से जो प्रेम मिल रहा है उसे वह अपने लिए आदर्श बना लें।

    समाज से अपराधों को रोकने का एक मार्ग यह है कि इंसानों की सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और आध्यात्मिक जानकारी में वृद्धि की जानी चाहिये। इन चीज़ों की शिक्षा परिवार से आरंभ होनी चाहिये। इस आधार पर माता- पिता समाज की अच्छी परम्पराओं और आत्म विश्वास में वृद्धि के लिए बच्चों को प्रोत्साहित कर सकते हैं। माता- पिता का व्यवहार और उनका दृष्टिकोण बच्चों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जो माता -पिता बच्चों के साथ कड़ा व्यवहार करते हैं वास्तव में वे बच्चों के विकास में बाधा बनते हैं और वह अपनी उम्र के बच्चों के साथ सकारात्मक संबंध स्थापित नहीं कर पाते हैं जो कि उसके विकास के लिए बहुत प्रभावी है जबकि अच्छे माता- पिता अपने परेशान बच्चों के लिए शांति का स्रोत होते हैं। इस प्रकार के माता- पिता न केवल कठिनाइयों व समस्याओं के समाधान में अपने बच्चों के सहायक होते हैं बल्कि वे अपने बच्चों को स्वाधीन होने और जिम्मेदारी स्वीकार करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।

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