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    मानवाधिकार-3

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    मार्गदर्शन में हम विभिन्न विषयों पर इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता का विचार पेश करते हैं। इस कार्यक्रम में हम मानवाधिकार के विषय पर इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनई के विचार पेश करेंगे। हम बात करेंगे मानवाधिकार के संबंध में पश्चिमी देशों के झूठे दावों की। यह कार्यक्रम इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता के विभिन्न भाषणों से चयनित खंडों पर आधारित है।

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    किस को नहीं मालूम है कि वाइट हाउस के अधिकारी मानवाधिकार और लोकतंत्र के बारे में जो दावे करते हैं वह झूठे दावे हैं। बीते वर्षों में नरसंहार के हृदय विदारक उदाहरण पेश करने वाली अमरीकी सरकार, जिसने एशिया, अफ़्रीक़ा और लैटिन अमेरिका की स्वाधीन सरकारों के विरुद्ध षडयंत्र रचे, जिसने विद्रोह करके जनता पर स्वयं को थोप देने वाली रूढ़िवादी सरकारों का समर्थन किया है, जिसने पूरे विश्व में महाविनाश के हथियारों की सप्लाई की है, जिसने ख़तरनाक आतंकवादियों को मैदान में उतारा है और इससे पहले उनका पालन पोषण किया है, जिसने असंख्य लोगों को मौत के घाट उतार दिया, जिसने विश्व की सबसे पीड़ित जनता अर्थात फ़िलिस्तीनी जनता के अधिकारों का हनन किया है।

    अमरीकी सरकार ने 1945 से अब तक चालीस स्वाधीन सरकारों को गिराने में भूमिका निभाई, जो अमरीकी सरकार के दिशा निर्देशों पर चलने को तैयार नहीं होती थीं। अमरीका ने बीस से अधिक अवसरों पर सैनिक हस्तक्षेप किया। इन हस्तक्षेपों के दौरान बड़ी संख्या में इंसान मारे गए और त्रास्दियां घटित हुईं। कुछ अवसरों पर उसे सफलता मिली और कभी उसे पराजय का मुंह देखना पड़ा। उसने दूसरे विश्व युद्ध के समापन से पूर्व जापान पर परमाणु बम्बारी कर दी। वियतनाम की रक्तरंजित लड़ाइयां, वह भयानक नरसंहार, वह कभी न भुलाई जाने वाली त्रास्दियां जिनमें अंततः अमरीका को मुंह की खानी पड़ी। चिली का उदाहरण ले लीजिए, स्वयं ईरान का उदाहरण ले लीजिए कि 19 अगस्त को अमरीकी दूत ईरान आता है और साज़िशों में व्यस्त हो जाता है। यह सारी बातें बाद में स्वयं उन्हीं की ओर से सार्वजनिक हुईं और आज यह जानकारियां सब की पहुंच में हैं। यही सब कुछ दूसरे स्थानों पर भी हुआ। यह सब बड़ी कंपनियों के करतूत थे। अमरीका के बड़े पूंजीपतियों की चालें थीं, सत्ता लोभी दलों की योजनाएं थीं। इस सब के पीछे ज़ायोनियों का हाथ था। यह बड़े भयानक अपराधों का रिकार्ड है। यह बड़ा लज्जाजनक और शर्मनाक अतीत है। यह साधारण बात नहीं है। इन लोगों के लिए आम मनुष्यों की जानों का चला जाना, संसाधनों की बर्बादी और न्याय का दमन तथा किसी भी प्रकार की मानवीय त्रासदी का घटना कोई विशेष बात नहीं है। यह चीज़ें उनकी राह में कभी भी रुकावट नहीं बनतीं। अलबत्ता दिखावा और मक्कारी करने के लिए उनके पास मीडिया शक्ति अवश्य है। वह अपनी इसी शक्ति के माध्यम से विश्व के वातावरण को एसा रूप देने की कोशिश करते हैं जिस से उनके हाथों अस्तित्व में आने वाली त्रासदियों पर पर्दा पड़ जाए तथा उन्हें शांति प्रिय, मानवाधिकार समर्थक और लोकतंत्र प्रेमी के रूप मे जाना जाए। जार्ज बुश सीनियर के काल में कालों पर जो खुला अत्याचार हुआ उसके परिणाम में अमरीका के कुछ राज्यों में व्यापक स्तर पर विद्रोह आरंभ हो गए। पुलिस उन पर नियंत्रण न पा सकी तो सेना को तैनात किया गया। इसके बाद वाले राष्ट्रपति के काल में ईसाई धर्म के एक सम्प्रदाय दाऊदिया या डेविडियन से संबंध रखने वाले 80 लोगों को जो सरकार की नीतियों के विरोधी थे और एक इमारत के भीतर एकत्रित थे जो पुलिस के अल्टीमेट पर बाहर नहीं निकल रहे थे, महिलाओं और बच्चों की आंखों के सामने ज़िन्दा जला दिया गया। यह है उनका मानवाधिकार प्रेम। जूनियर बुश के राष्ट्रपति काल में उत्तरी अफ़ग़ानिस्तान में जब वह अफ़ग़ानिस्तान पर क़ब्ज़ा कर रहे थे, लोगों पर जो बम बरसाए गए, बस्तियों में जो हृदय विदारक त्रासदियां हुईं वह तो अलग, एक जेल में क़ैद बहुत से क़ैदियों पर गोलियां बरसा कर उनका नरसंहार किया गया। यह ख़बर पूरी दुनिया में जंगल की आग की तरह फैली ही किंतु मीडिया माफ़ियाओं ने इन ख़बरों को अधिक देर तक आंखों के सामने नहीं रहने दिया। अचानक उसके बारे में बातचीत रोक दी कि कहीं यह घटना लोगों के मन में बैठ न जाए। अमरीका में मानाधिकारों का हनन और विश्व भर में अमरीकियों के हाथों मानवाधिकारों का उल्लंघन इतना अधिक है कि इसका अनुमान लगाना कठिन है किंतु वह ईरानी जनता और ईरानी सकार तथा इस्लामी लोकतांत्रिक व्यवस्था पर मानवाधिकारों के हनन का आरोप लगाते नहीं थकते। मानवाधिकार का ध्वज एसे लोगों के हाथों में है जो वास्तव में सबसे बढ़कर मानवाधिकारों का हनन कर रहे हैं।

    पिछली शताब्दी के दौरान यूरोपीय देशों ने मानवाधिकारों की धज्जियां उड़ा दी। यदि कोई सौ साल पहले के इतिहास का अध्ययन करे तो वहां भी यही स्थिति नज़र आएगी। इन सौ वर्षों में इन यूरोपीय महाशयों ने दो विनाशकार विश्व युद्ध लड़े। यह दोनों विश्व युद्ध दसियों साल पहले हुए थे। वर्तमान समय में भी आप देखिए कि किन लोगों ने इराक़ में रासायनिक शस्त्रों का कारख़ाना तैयार किया जिससे इतनी भयानक त्रासदी हुई? इन्हीं यूरोपीयों की यह कारस्तानी थी। किस ने इराक़ में परमाणु बम बनाने के लिए संयंत्र लगाए जिससे पूरे क्षेत्र की सुरक्षा पर ख़तरे के बादल मंडराने लगे थे? इन्हीं यूरोपीयों ने। कौन इस्राईल की आपराधिक कार्यवाहियों के लिए रास्ता साफ़ करता आ रहा है और जिसके कारण वह दिन प्रतिदिन नए नए अपराध कर रहा है? यही यूरोपीय देश यह काम कर रहे हैं।

    अंग्रेज़ों ने पूरी दुनिया में स्वयं को सहिष्णुता और सज्जनता के लिए मशहूर कर रखा है। अलबत्ता विश्व जनमत ने इराक़ में उनकी इस सहिष्णुता के दृष्य देख लिए हैं। हथियारों के साथ लोगों के घरों में घुस जाना, उनका सुकून चैन छीन लेना, छोटे छोटे बच्चों को आतंकित करना, बग़दाद मूसिल तथा अन्य स्थानों पर जिनके समाचार सब तक नहीं पहुंच पाते प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चला देना! क्या यही लोकतंत्र, मानवताप्रेम और मानवाधिकार से प्रेम है? वस्तुतः यह मामले पाठ सिखाने वाले हैं। इनको ध्यान से देखने और समझने की आवश्यकता है।

    मानवाधिकारों को ईश्वरीय धर्मों ने सुनिश्चित किया है। इस्लाम मानवाधिकारों का रक्षक है। किसी भी भौतिक विचारधारा में मनुष्य को वह महत्व नहीं दिया गया है जो उसे इस्लाम में प्राप्त हुआ है। इस्लाम के परिचय के समय एक सिद्धांत हमेशा पेश किया जाता है कि मानव प्रतिष्ठा बहुत मूल चीज़ का नाम है। इस्लाम मानवाधिकारों की रक्षा करता है तथा मानवाधिकारों को सार्थक बनाता है।

    पश्चिमी देश इस्लामी गणतंत्र ईरान पर आरोप लगाते हैं कि वह मानवाधिकारों का ध्यान नहीं रखता। उनका इशारा इस्लामी नियमों में विभिन्न पापों पर रखी गई सज़ाओं की ओर होता है। ईश्वर ने क़ुरआन में कहा है कि ईश्वर ने सीमाओं का निर्धारण कर दिया है और जो भी इन सीमाओं को तोड़ता है ईश्वरीय प्रकोप और दंड का पात्र बनता है। इस्लामी लोकतांत्रिक व्यवस्था मानवाधिकारों की समर्थक एवं रक्षक है उसे इस बात की आवश्यकता नहीं है कि पश्चिम वाले आकर मानवाधिकार का पाठ सिखाएं। इस्लामी गणतंत्र ईरान वास्तव में इस्लाम धर्म के नियमों और आदेशों के आधार पर मानवाधिकारों का पालन करता है क्योंकि यह इस्लामी सिद्धांतों में शामिल है। पश्चिम वाले जो बात कहते हैं वह केवल एक धोखा और दिखावा है।

    इस्लामी नियमों के संबंध में यह गर्व की बात है कि वर्तमान युग में एक एसे संसार में जहां हर ओर भ्रामक प्रचारों की बाढ़ सी आई हुई है, मुसलमान महिला इस साहस और वैचारिक स्वतंत्रता के साथ अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन का उपयोग और प्रदर्शन कर रही है। यह इस्लाम की बरकतें हैं। महिलाओं को इस पर गर्व होना चाहिए।