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    मानवाधिकार-4

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    कार्यक्रम मार्गदर्शन में हम विभिन्न विषयों पर इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता का विचार पेश करते हैं। आज हम मानवाधिकार के विषय पर इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनई के विचार पेश करेंगे। हम बात करेंगे सूचना के अधिकार के संबंध में। विश्व, देश और समाज के बारे में सही सूचनाएं प्राप्त करना हर व्यक्ति का अधिकार है और इस संदर्भ में मीडिया का रोल महत्वपूर्ण है। प्रस्तुत है इस विषय पर चर्चा। यह कार्यक्रम इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता के विभिन्न भाषणों से चयनित खंडों पर आधारित है।

    लोकतांत्रिक व्यवस्था जिसके ढांचे में जनता की भूमिका केन्द्रीय महत्व रखती है, जनता को सूचनाओं से अवगत रखने से स्वयं को अलग नहीं रख सकती। अर्थात इस व्यवस्था के अधीन रहने वाली जनता को वास्वतविकताओं से सूचित रखना आवश्यक है। उनमें विशलेषण की शक्ति को बढ़ाना आवश्यक है। जनता तक आवश्यक सूचनाएं पहुंचाना, उसके दृष्टिकोण को विस्तृत बनाना आवश्यक है। एसी व्यवस्था के लिए सूचना प्रक्रिया पानी और हवा की भांति अनिवार्य है। हमारी व्यवस्था एसी ही है। इसमें जनता को तथ्यों और सूचनाओं से जितना अधिक अगवत रखा जाएगा इस्लामी लोकतांत्रिक व्यवस्था को उतना ही अधिक लाभ पहुंचेगा।

    हमारा दृष्टिकोण यह है कि इस्लामी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए समाचार पत्र और पत्रिकाएं टाइम पास का साधन नहीं है बल्कि इसकी विविधता तथा इसका श्रेष्ठ मापदंड के अनुरूप होना इस्लामी व्यवस्था की मूल आवश्यकताओं में है। मैं अपने समाज तथा अच्छे जीवन के इच्छुक हर समाज के लिए समाचार पत्रों और पत्रिकाओं को आवश्यक मानता हूं। मेरी दृष्टि में प्रिंट मीडिया के तीन महत्वपूर्ण दायित्व हैं। टीका टिप्पणी, सच्चाई के साथ सूचना का प्रसारण, समाज के स्तर पर विचारओं का आदान प्रदान। मेरा मानना है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जनता और प्रिंट मीडिया का मूल और मान्यता प्राप्त अधिकार है। इसमें कोई संदेह नहीं है और यह संविधान का बिल्कुल स्पष्ट क़ानून भी है। मेरा मानना है कि यदि कोई समाज स्वतंत्र और उन्नति के मार्ग पर अग्रसर मीडिया तथा स्वतंत्र एवं जागते हुए क़लम से वंचित हो जाए तो वह बहुत सी चीज़ों से अपने आप वंचित हो जाएगा। स्वतंत्र मीडिया समाज के विकसित होने का चिन्ह बल्कि वास्तव में विकास का आधार है। अर्थात जहां एक ओर समाज की स्वतंत्रता और विकास मीडिया को अस्तित्व में लाती है वहीं मीडिया भी समाज के विकास और उन्नति में निर्णायक भूमिका निभाता है। अलबत्ता इसके साथ ही मेरा यह भी मानना है कि कुछ मूल्य और तथ्य एसे भी हैं जिन्हें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रा तथा मीडिया की आज़ादी के नाम पर कुचला नहीं जाना चाहिए। कमाल की बात यह है कि स्वतंत्रता भी बनी रहे और तथ्यों की जानकारी भी प्रसारित होती रहे। प्रिंट मीडिया स्वतंत्र भी रहे और हानिकारक आयामों से स्वयं को सुरक्षित भी रखे। कार्यशैली कुछ इस प्रकार की होनी चाहिए।

    पूंजीवादी व्यवस्था के मीडिया की स्वतंत्रता की भी समीक्षा कर ली जाए। यूरोप और अमरीका के किसी एक अख़बार का नाम बताइए जो पूंजीपतियों की संपत्ति न हो। मेरा प्रश्न यह है कि कौन सा अख़बार है जो समाज के मध्यवर्ग और ग़रबी तबक़े से संबंधित है। जिसके आधर पर मनुष्य उस वर्ग की स्वतंत्रता की कल्पना कर सके? समाचार पत्र किसकी सम्पत्ति हैं? तमाम समाचार पत्रों का संबंध बड़े बड़े पूंजीपतियों से है। अर्थात यह पूंजीपति जब पूरी स्वतंत्रता से काम करता है तो जब जिसकी साख को चाहता है मलियामेट कर देता है और जिसको चाहता है आसमान पर पहुंचा देता है। जनमत को अपने स्वार्थों के अनुसार दिशा देता है। इसे तो आज़ादी नहीं कहा जा सकता।

    मीडिया की वास्तविक पूंजी है जनता का विश्वास। यह विश्वास लोगों की आस्थाओं तथा शासन की प्रतिष्ठा की रक्षा और बयान में सच्चाई के माध्यम से प्राप्त होता है। यदि प्रिंट मीडिया जैसा कि संविधान में कहा गया है लोगों का दृष्टिकोण विस्तृत करने का दायित्व अदा करे। देश के हितों को ध्यान में रखे, क़लम का प्रयोग जनता के हितों के अनुरूप करे, धर्म के हितों को ध्यान में रखकर काम करे तो फिर पत्र और पत्रिकाओं की संख्या में जितनी भी वृद्धि को अच्छा है।

    इस्लामी व्यवस्था में प्रिंट मीडिया का सबसे महत्वपूर्ण आयाम क्रान्तिकारी जनता के मूल्यों और लक्ष्यों का समर्थन तथा जनता की जानकारी के स्तर को बेहतर बनाने के संबंध में अपनी भूमिका निभाना है। वर्तमान काल में विशेष रूप से मार्क्सवाद की विफलता के बाद पश्चिम सामराज्य क्रान्तिकारी राष्ट्रों पर अपना राजनैतिक एवं धर्म विरोधी दृष्टिकोण थोपने के लिए सांस्कृतिक हथियारों का प्रयोग कर रहा है। पश्चिम के इस सांस्कृतिक आक्रमणों का विभिन्न आयामों से उत्तर देना मीडिया का प्राथमिक मिशन होना चाहिए।

    मैं मीडिया से बार बार यह सिफ़ारिश करता हूं कि देश के मामलों में कर्तव्य परायणता के साथ काम करे तो इसका कारण यही है। हमें कभी भी शत्रु का हथियार नहीं बनना चाहिए। एसा न हो कि हमारे क्रियाकलापों से शत्रु का काम आसान हो जाए और वह इच्छानुसार हमारे समाज में जैसा चाहे बदलाव उत्पन्न कर दे और आप देश के भीतर अपने अपने समाचार पत्रों और टीवी चैनलों के माध्यम से उसे जनता के मन में बिठाने का प्रयास करें। यह बहुत बड़ी भूल होगी। यदि यह काम जान बूझ कर किया जाए तो बहुत बड़ा विश्वासघात है और यदि अनजाने में हो जाए तो बहुत बड़ी ग़लती है। बहुत सावधान रहने की आवश्यकता है। यही कारण है कि मीडिया की मानीटरिंग बहुत आवश्यक है। यह संविधान तथा मीडिया से संबंधित क़ानून भी कहता है। मानीटरिंग के बिना मीडिया से राष्ट्रीय हितों और मांगों के अनुरूप काम की अपेक्षा रखना उचित नहीं है। कुछ लोग समझते हैं कि जनमत एक आज़ाद मैदान है जहां कोई भी रोक टोक नहीं है। उसके साथ जो दिल में आए बर्ताव किया जा सकता है। जनमत प्रयोगशाला का चूहा तो नहीं भै कि जो जैसा चाहे उस पर प्रयोग करे। ग़लत विशलेषणों, अफ़वाहों, आरोपों और झूठ का सहारा लेकर लोगों की भावनाओं और आस्थाओं का अपमान किया जाता है। यह कहां तक सही है। अतः मानीटरिंग आवश्यक है ताकि यह हरकतें न हों। यह एक दायित्व है।