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    मानवाधिकार-5

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    आजकल राजनैतिक और सांस्कृतिक मामलों में साम्राज्यवादी शक्तियां यह हथकंडे अपनाती हैं कि दूसरों को पश्चिम की विचारधारा के सामने हीन भावना से ग्रस्त कर दें। महिलाओं का मामला हो, मानवाधिकारों का मामला हो, लोकतंत्र की बात हो या स्वतंत्रताप्रेमी आंदोलनों का विषय, अपने प्रतिद्वंद्वी को पीछे हटने पर विवश करने के लिए पश्चिमी सरकारें भारी हंगामा करती हैं।

     

    जो लोग वास्तव में मानवाधिकारों को कोई महत्व नहीं देते उन्होंने इसे दूसरों को हांकने वाला डंडा बना लिया है। अमरीका विश्व में मानवाधिकारों का ठेकेदार बन बैठा है। युद्ध के आरंभ से पहले अमरीका की दृष्ट में इराक़ी सरकार आतंकवाद की समर्थक और सहायक सरकार थी, 1981-82 में ईरानी जियाले शत्रु को घुटने टेकने पर विवश कर ले गए और उन्होंने उसे अपनी सीमाओं से बाहर खदेड़ दिया। इराक़ी अतिक्रमणकारी ईरानी बहादुरों का मुक़ाबला करने के लिए रासायनिक तथा महाविनाश के शस्त्र प्रयोग करने अर्थात युद्ध अपराध करने पर तैयार हो गया। उसी अवसर पर अमरीकी सरकार को यह आभास हुआ कि इराक़ियों की सहायता करनी चाहिए ताकि इराक़ की बासी सरकार इस्लामी लोकतांत्रिक व्यवस्था के विरुद्ध अपनी अमानवीय भूमिका सफलता से निभाएगी। उन्हीं वर्षों में इराक़ी सरकार ने रासायनिक हथियारों का प्रयोग किया और अमरीकियों ने इराक़ का नाम आतंकवाद की समर्थक सरकारों की सूचि से निकाल दिया। मानवाधिकार से उनके प्रेम की यह सच्चाई है।

     

    विश्व में जहां कहीं भी मानवाधिकारों का हनन हो रहा है वहां इसका सबसे अधिक समर्थन यही अमरीका जैसी साम्राज्यवादी सरकारें ही कर रही हैं और कितना भयानक मज़ाक़ है कि वही सरकारें मानवाधिकार की ठेकेदार भी बनी बैठी हैं तथा इसे वह अपनी विरोधी सरकारों के ख़िलाफ़ हथियार के रूप में प्रयोग करती हैं।

     

    महिलाओं के अधिकारों के संबंध में भी यही चीज़ है। क़ानूनी सरकार के गठन के बाद इस्लामी देश ईरान में ईश्वर की कृपा से महिलाएं बड़ी सीमा तक अपनी पहिचान बहाल करने में सफल रही हैं। वह विभिन्न क्षेत्रों में भूमिका निभाने तथा मुस्लिम महिलाओं की भावनाओं की महानता का प्रदर्शन करने में सफल हुई हैं जबकि पश्चिम वाले इस्लामी व्यवस्था में महिलाओं के अधिकारों के हनन की रट लगाए हु हैं। पश्चिमी दुनिया को समझना चाहिए कि अपना दृष्टिकोण इस्लामी गणतंत्र व्यवस्था के दृष्टिकोण से निकट और समन्वित बनाए। पश्चिम वालों को चाहिए कि महिलाओं के अधिकारों, मानवाधिकारों, स्वतंत्रता तथा लोकतंत्र के बारे में अपने ग़लत दृष्टिकोण को सुधारे तथा उसे इस्लामी दृष्टिकोण के साथ रखकर परखे। ईरानी राष्ट्र ने साबित कर दिया कि वह दुशमन के ढीटपने, वर्चस्ववाद और विस्तारवाद के सामने एक क़दम भी पीछे हटने वाली नहीं है। यह बहुत अच्छी शैली है।

     

    इस्लाम में महिलाओं के अधिकार और सामाजिक एवं राजनैतिक मैदानों में उनकी भूमिका का विचार एक मान्य सच्चाई है। इस्लाम कहता है कि महिलाएं जाकर पैग़म्बरे इस्लाम की बैअत करती थीं। पैग़म्बरे इस्लाम ने यह नहीं कहा कि पुरुष बैअत करें और महिलएं अपने पति या पिता के फ़ैसले के अनुरूप कार्य करें। नहीं, उन्होंने कहा कि पुरुष भी बैअत करें और महिलाएं भी बैअत करें। इस प्रकार देखा जाए तो पश्चिम वाले इस्लाम से बहुत पीछे हैं।

     

    यदि देश में महिलाओं के वर्ग को इस्लामी शिक्षाओं के आधार पर उन तथ्यों के परिचित कराया जाए जिनका इस्लाम ने आदेश दिया है तो देश का विकास कई गुना बढ़ जाएगा। जिस क्षेत्र में भी महिलाओं ने दायित्व संभाल लिया उसमें विकास की गति कई गुना वृद्धि हो जाएगी। विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं की उपस्थिति की विशेषता यह है कि जब घर की महिला किसी मैदान में क़दम रखती है तो इसका अर्थ यह होता है कि उसका पति और उसके बच्चे भी उस मैदान में उतर गए हैं।

     

    यदि महिला को ज्ञान प्राप्ति का पूरा अवसर न दिया गया तो यह उसके साथ अन्याय होगा। यदि बहुत अधिक व्यस्तता के कारण महिला अपने शिष्टाचार औज्ञ अपने धर्म के बारे में सोचने का अवसर प्राप्त न कर सकी तो यह उसके साथ अन्याय होगा। यदि महिला को उसकी निजी सम्पत्ति से उसकी इच्छा के अनुरूप स्वतंत्रतापूर्वक लाभ उठाने का अवसर न दिया गया तो यह भी उसके साथ अत्याचार होगा। विवाह के समय यदि महिला पर पति को थोप दिया जाए, अर्थात यदि पति के चयन में उसकी अपनी कोई भूमिका न हो और उसकी इच्छा कुछ और हो तो यह उसके साथ सरासर अन्याय और अत्याचार होगा।

     

    वैवाहिक जीवन के दौरान या पति से अलग हो जाने के बाद यदि महिला को बच्चों के संबंध में अपनी भावनाओं को संतुष्ट करने का अवसर न दिया जाए तो यह उसके साथ अत्याचार है। यदि महिला के भीतर योग्यताएं हैं जैसे ज्ञान संबंधी योग्यताएं, अनुसंधान की योग्यताएं, आविष्कार की योग्यताएं, राजनैतिक योग्यताएं, सामाजिक कामों की क्षमताएं और उसे इन योग्यताओं के प्रयोग और उन्हें निखारने का अवसर न  दिया गया तो यह उन पर अत्याचार है।

    यदि मानवाधिकारों के संबंध में चिंता है, जैसा कि हम भी यूरोपीय देशों में मानवाधिकार की स्थिति के बारे में चिंतित हैं तो दोनों पक्षों को चाहिए कि अपने प्रतिनिधियों को एक दूसरे के यहां भेजें और स्थिति का निरीक्षण करें। वह लोग हमारे यहां आएं और हम अपने प्रतिनिधि उनके यहां भेजें जो यह देखें कि जेलों और सरकारी सामाजिक एवं नागरिक संस्थाओं में मानवाधिकार की क्या स्थिति है तथा मानवाधिकार का कितना सम्मान किया जाता है। यह एक तार्किक प्रस्ताव है। इन सुझावों को स्वीकार करने से इस्लामी गणतंत्र ईरान और पश्चिम का आपसी संबंध भी बढ़ेगा।  (http://hindi.irib.ir/)