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    मित्रता का फल

    मित्रता का फल
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    प्राचीन काल की बात है एक शहर में एक दुकानदार रहता था। वह सदाचारी और ईमानदार व्यक्ति था। अपनी इसी विशेषता से वह लोगों में जाना जाता था। वह दुकानदार कृपालु और अतिथि प्रेमी भी था। सदैव ही वंचितों और निर्धनों की सहायता करता था। एक दिन वह अपनी दुकान में एक ग्रामीण से परिचित हुआ। थोड़े ही समय में दोनों घनिष्ठ मित्र बन गए। पतझड़ और जाड़े के मौसम में ग्रामीण शहर आता और वहां काम करता था। बसंत ऋतु के निकट आते ही वह अपने गांव वापस चला जाता। जिस दौरान ग्रामीण शहर में रहता वह एक व्यापारिक केन्द्र में काम करता था। दिन में वह काम करता और रात में धर्मशाला में ठहरता। एक दिन ग्रामीण के शहरी दोस्त ने उससे कहा कि मुझको पता है कि पतझड़ और जाड़े के मौसम में तुम्हारे पास गांव में कोई काम नहीं होता इसलिए कार्य के लिए तुम नगर आते हो लेकिन तुम जितना भी काम करो कुछ नहीं बचा सकते। इसका कारण यह है कि तुम जो कुछ कमाते हो उसे धर्मशाला वाले को दे देते हो। उचित यह होगा कि तुम मेरे घर आओ और रात मेरे ही घर में गुज़ारा करो। मैं तुम्हें एक कमरा दूंगा। जब तक तुम शहर में रहकर काम करते हो रात वहीं गुज़ारो।

    यह बात सुनकर ग्रामीण बहुत प्रसन्न हुआ और उसने अपने शहरी मित्र की बात मान ली। उसके बाद से जब तक ग्रामीण, शहर में काम करता अपने शहरी मित्र के घर ही ठहरता। अपने मित्र की दया, प्रेम तथा उसके अतिथि सत्कार के कारण कभी-कभी वह अपने मित्र का आभार व्यक्त करता और कहता हे मेरे प्रिय मित्र, मेरे कारण आपको बहुत कठिनाई होती है। मैं भी चाहता हूं कि आपके इस उपकार के बदले आपके साथ कुछ कर सकूं। आप कबतक इस नगर में रहेंगे? कभी समय निकालकर मेरे घर पधारिए ताकि प्रकृति की सुन्दरता का लाभ उठा । यदि आप ऐसा करेंगे तो मुझे बड़ी प्रसन्नता होगी। इस प्रकार मैं आपके उपकार का शायद थोड़ा सा बदला चुका सकूं।

    ग्रामीण जब कभी भी यह बात कहता तो उसका शहरी मित्र कोई न कोई बहाना बना देता। वह कहता प्रिय मित्र फिलहाल तो मेरे पास समय नहीं है। ईश्वर ने चाहा तो बाद में कभी चलेंगे। एक न एक दिन हम सपरिवार तुम्हारे गांव अवश्य चलेंगे। समय बीतता रहा और शहरी दुकानदार कोई न कोई बहाना बनाकर गांव जाने की बात को टाल जाता। कभी ग्रामीण नाराज़ होकर अपने शहरी मित्र से कहता, गर्मियां भी निकल गईं और आप मेरे गांव नहीं आए। इससे आपका क्या बिगड़ जाएगा कि आप एक बार गांव पधार कर मुझे और मेरे परिवार को प्रसन्न कर दें। शहरी दुकानदार हर बार कोई न कोई बहाना बना देता। वह कभी यह कहता कि मेरी पत्नी बीमार पड़ गई है। कभी कहता कि स्वयं मैं बीमार हूं और गांव जाने का अवसर नहीं मिल पा रहा है। हर साल दोनों मित्रों के बीच इस प्रकार की बातें होतीं किंतु शहरी दुकानदार गांव नहीं जा पाता। इसके बावजूद वह अपने ग्रामीण मित्र को अपने घर रखता और उसकी आवभगत करता। अन्तिम बार जब ग्रामीण नगर आया तो उसके शहरी मित्र ने उसे ६ महीनों तक अपने पास रखा और उसकी बहुत अच्छी तरह से आवभगत की। इस बीच एक बार ग्रामीण ने क्रोध में अपने शहरी मित्र से कहा, आप सदैव मेरे गांव आने का वचन देते हैं किंतु मेरे गांव नहीं आते। आपकी इस बात से मैं अप्रसन्न हूं। मेरे साथ आप जो इतना करते हैं इससे मैं शर्मिंदा हूं। इसपर शहरी दुकानदार ने कहा कि अबतक जो मैं तुम्हारे गांव नहीं आ सका उसका कारण यह नहीं है कि मैं आना नहीं चाहता बल्कि अवसर ही उपलब्ध नहीं हो सका। यदि ईश्वर ने चाहा तो अगली गर्मियों में मैं तुम्हारे यहां आऊंगा। ग्रामीण ने कहा कि गर्मियों में क्यों, बसंत में आइए ताकि कम से कम दो-तीन महीने आप मेरे मेहमान रह सकें। शहरी दुकानदार ने कहा ठीक है। यदि अवसर मिला और ईशवर ने चाहा तो अवश्य तुम्हारे गांव आऊंगा।बसंत निकट होते ही ग्रामीण ने अपने शहरी मित्र से विदा ली और गावं जाने से पहले उसने वचन लिया कि इस बार शहरी मित्र अपने वचन को पूरा करेगा और गांव आकर कुछ महीने उसका मेहमान रहेगा। गर्मी और बसंत दोनों ही मौसम गुज़र गए किंतु शहरी दुकानदार अपना वचन पूरा नहीं कर सका। इस बीच पतझड़ और जाड़े का मौसम भी गुज़र गया किंतु ग्रामीण के बारे में कोई भी जानकारी उसके शहरी मित्र को नहीं मिली। शहरी दुकानदार ने अपने घरवालों से कहा कि पता नहीं क्या बात है कि इस वर्ष मेरा मित्र शहर नहीं आया। उसकी पत्नी ने कहा कि हो सकता है कि वह तुमसे अप्रसन्न हो क्योंकि तुमने अपना वचन पूरा नहीं किया और तुम उसके गांव नहीं गए। ऐसा भी हो सकता है कि वह शहर आया हो किंतु हमारे घर न आया हो। शहरी दुकानदार ने अपनी पत्नी से कहा कि ऐसा नहीं है। यदि वह शहर आता तो मुझसे अवश्य मिलता। वह बेवफ़ा नहीं है और इतनी जल्दी वह अपने प्रिय मित्र को नहीं भूल सकता। कुछ वर्ष बीत गए किंतु ग्रामीण का कोई अता-पता नहीं चल सका। बसंत के मध्य की बात है कि शहरी दुकानदार के पुत्र ने अपने पिता से कहा, पिता जी लंबे समय से आप हमें यात्रा पर नहीं ले गए हैं। बहुत समय से नगर में रहते-रहते हम सुन्दर प्रकृति से दूर हो चुके हैं और इस स्थिति से हम थक चुके हैं। इसपर शहरी दुकानदार की पत्नी ने भी कहा कि हरएक को यात्रा और भ्रमण की आवश्यकता होती है अतः उचित होगा कि हम भी यात्रा पर निकलें। ऐसा करते हैं कि आपके ग्रामीण मित्र के घर चलते हैं। वह आपको सदैव ही अपने घर आने का निमंत्रण दिया करता था किंतु आपने आजतक उसकी बात पर कोई ध्यान नहीं दिया। शहरी दुकानदार ने अपनी पत्नी की बात मान ली और कहा कि तुम ठीक कहती हो। तैयारी करो। चलो अपने ग्रामीण मित्र के घर चलते हैं।