islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. मुक़द्दम ए सैयदुल उलामा ……….

    मुक़द्दम ए सैयदुल उलामा ……….

    Rate this post

    “मैने सत्तर खुत्बे अली इब्ने अबी तालिब (अ) अजबर (याद) किए हैं, जिनके फुयूज़ो-बरकात मेरे यहां नुमायां (स्पष्ट) हैं। ”

    इसके बाद इबनूल मुतवफ्फी (मृतक) सन् 142 का एतिराफ है जिसे अल्लामा हसन अन्नदूबी ने अपने उन हवाशी में जो किताब अल बयान वत तबईन लिल जाहिज़ पर लिखे हैं , वह इब्ने मुक़फ्फह के बारे में लिखते हैः

    “ ग़ालिबन इब्ने मुक़फ्फह ने बलाद़त में अमीरुल मोमेनीन अली इब्ने अबी तालिब “अलैहिस सलातो वस्सलाम ” के खुत्बों से इस्तेफादह किया था और इसी बिना पर वह कहते थे कि मैनें खुत्बों के चशमे से सैराब होकर पिया है और उसे किसी एक तरीक़े में महदूद नही रखा है। तो उस चशमें के बरकात बढे़ और हमेशा बढ़ते रहे। ”

    इसके बाद इब्ने नबाता मुतवफ्फी (मृतक) सन् 374 हिजरी यह भी सैय्यद रज़ी से मुक़द्दम (पहले के) हैं और उनका यह क़ौल हैः

    “ मैनै खिताबत का एक ख़ज़ाना महफूज़ किया है, जिससे जितना ज़ियादा काम लिया जाए, फिर भी उसमें बरकत ज़ियादा ही होती रहेगी। मैने सौ फ़सलें अली इब्ने अबी तालिब (अ) के मौएज़ों (प्रवचनों) में से याद की हैं।”

    इब्ने नबाता के इस क़ौल का भी इब्ने अबिल हदीद नें तज़किरा किया है।

    रिजाले कश्शी मेँ अबुस्सबाहे कनानी के हालात में लिखा है कि ज़ैद इब्ने अली इब्निल हुसैन कि जो ज़ैद-ए-शहीद के नाम से मशहूर हैं और जिनकी शहादत इमाम जाफर सादिक़ (अ) के इमामत के ज़माने में हुई वह बराबर हज़रत अली (अ) के खुत्बों को सुना करते थे।

    अबुस्सबाह कहते हैं “काना यसमों मिन्नी खुतुबे अमीरिल मोमिनीन (अ) ” यह दूसरी सदी हिजरी का ज़िक्र है। और इससे भी साफ ज़ाहिर है कि एक ज़खीरा खुत्बों का उस वक़्त भी मौजूद था, जो मुसल्लम तौर पर हज़रत अली (अ) की तरफ निस्बत रखता था। इन तमाम मक़ामात पर बतौर इरसाल मुसल्लमाते खुतुबे अली (अ) का कहना बताता है कि उस ज़माने में इस बारे में कोई शको शुब्हा भी महसूस नही किया जाता था। वरना जैसा कई सदी बाद जब कुछ अग़राज़ की बिना पर मुसन्निफीन ने इस हक़ीक़त को मशकूक (संदिग्घ) बनाना ज़रूरी समझा तो अलमनसूबतो इला अली कहने लगे। दौरे अव्वल में इस क़िस्म के शको शुब्हा का इज़हार करने वाली कोई लफ्ज़ (अक्षर) पाई नही जाती।

    रिजाले कबीर से मालूम होता है कि ज़ैद इब्ने वहबे ज़ेहनी (मुतवफ्फी तक़रीबन सन 90 हिजरी) ने जो खुद हज़रत अमीरुल मोमिनिन के रोवाते-अहादीस (हदीसें बयान) करने वालों ) में से हैं , आपके खुत्बों को जमा किया था और उसके बाद और मुख्तलिफ (विभिन्न) लोग हैं जिन्होंने सैय्यद रज़ी के पहले हज़रत के खुत्बों और अक़वाल को जमा किया जैसे:

    (1) हिशाम इब्ने मुहम्मद इब्ने साइबे कलबी देहान्त सन 146 हिजरी इनके जमओ-तालीफ का ज़िक्र फेहरिस्ते इब्ने नदीम जुज़्व 7 पेज 251 में मौजूद है।

    (2) इबराहीम इब्ने ज़हीरे फ़राज़ी , इनका ज़िक्र फेहरिस्ते तूसी में यूँ है :-

    “मुख्तलिफ (विभिन्न) किताबें तसनीफ कीं। मिनजुमला उनके किताबुल मलाहिम और किताबे खुतुबे अली (अ) है।”

    और रिजाले नज्जाशी में भी उनका तज़किरा है।

    (3) अबू मुहम्मद-ए-मिसअदह इब्ने सदक़ह-ए-अब्दी इनके मुतअल्लिक़ रिजाले नज्जाशी में है :-

    “ इनकी मुख्तलिफ (विभिन्न)  तसनीफ़ है जिनमें से एक किताबे खुतुबे हज़रत अली (अ) है । ”

    (4) अबुल क़ासिम अब्दुल अज़ीम इब्ने अब्दुल्लाहे हसनी, जिनका मज़ार तेहरान से थोड़े फ़ासिले पर शाह अब्दुल अज़ीम के नाम से मशहूर है। यह इमाम अली नक़ी (अ) के अस्हाब में से थे। इनके जमा किए हुए खुत्बों का ज़िक्र रिजाले नज्जाशी में इस तरह है :-

    “ इनकी एक किताब खुतुबे हज़रत अली (अ) है । ”

    (5) अबुल खैर सालेह इब्ने अबी हम्माद-ए-राज़ी , यह भी इमाम अली नक़ी (अ) के अस्हाब में से थे। नज्जाशी में है :-

    “ मिनजुमला आप की तालीफात के किताबे खुतुबे अली (अ) है। ”

    (6) अली इब्ने मुहम्मद इब्ने अब्दुल्लाहे मदाइनी (देहान्त सन 335 हिजरी), इन्होनें इज़रत के खुत्बों को और उन मकतूबों (खतों) को जमा किया , जो हज़रत ने अपने उम्माल को तहरीर फ़रमाए थे। इस का ज़िक्र मोअजमुल उदबा-ए-याक़ूते हमवी जुज़्व 5 पेज 313 में है।

    (7) अबु मुहम्मद अब्दुल अज़ीज़े जलूदी-ए-बसरी (देहान्त सन 330 हिजरी), के तसानीफ में किताबे खुतुबे अली (अ), किताबे रसाइल, किताबे मवाएज़े अली (अ), किताबे खुतुबे अली (अ) फिल मलाहिम, किताबे दुआए अली (अ) मौजूद है, जिनका तज़किरा शैख तुसी नें फेहरिस्त में और नज्जाशी नें उनके तवील तसनीफात के ज़ैल में अपने रिजाल में किया है।

    (8) अबु मुहम्मद हसन इब्ने अली इब्ने शअब-ए-हलबी (देहान्त सन 320 हिजरी), नें अपनी मशहूर किताब उक़ूल (पेज 13 तबअ ईरान) में अमीरूल मोमिनीन के कुल कलिमात-ए-अमसाल और खुतुब को दर्ज करने के बाद लिखा है :-

    “ अगर हम वह सब लिखना चाहें जो हम तक हज़रत के खुत्बे और आप का कलाम सिर्फ तौहीद के बारे में पहुँचा है अलावा दूसरे मौज़ुआत के तो वह पूरी इस किताब (तुहफुल उक़ूल) के बराबर होगा। ”

    अब मज़कूरा बाला तफ़सील पर नज़र डाली जाती है तो मालूम होता है कि पहली सदी में ज़ैद इब्ने वहबे ज़हनी ने हज़रत के खुत्बों का एक मजमूआ तैयार किया था। दूसरी सदी में अब्दुल हमीद इब्ने यहया कातिब और इब्ने मुक़फ्फह के दौर में वह ज़खीरा मुसल्लम तौर पर मौजूद था और उस सदी के बीच के दौर में वह खुत्बे पढ़े और सुने जाते थे जैसा कि ज़ैदे शहीद के वाक़ए से ज़ाहिर हुआ और उदबा उसको ज़बानी हिफ्ज़ (याद) करते थे जैसा कि अब्दुल हमीद और इब्ने मुक़फ्फह की तसरीहात से ज़ाहिर हुआ है।

    और तीसरी सदी में विभिन्न लेखकों (मुसन्निफीन) नें जो जो खुत्बे उन तक पहुंचे थे उनको मुदव्विन किया। ऐसी सूरत में जनाब सैय्यद रज़ी को इसकी ज़रूरत ही क्या थी कि वह इन तमाम ज़खीरों को नज़र अन्दाज़ करके यह दिमाग़ी काहिश व कोशिश गवारा करें कि वह अज़ खुद कलामे अमीरूल मोमिनीन के नाम से कोई चीज़ तसनीफ़ करें।

    छटा अम्र यह है कि इन तमाम ज़खीरों को साबिक़ से मौजूद होने के बाद ज़ाहिर है कि अल्लामा सैय्यद रज़ी के लिए तो क़तई मुमकिन नहीं था कि वह उन तमाम ज़खाएर को तलफ़ करा देते और फिर उसी की तरवीज करते जो उनहोंने कलामे अमीरूल मोमिनीन क़रार दिया था। यह क़तई नामुमकिन था अगर वह जख़ीरा किसी एक लेखक के पास किसी एक दूरो दराज़ जगह होता तो यह इमकान भी था जैसा कि मशहूर है कि शैख अबू अली सीना ने फ़ाराबी के तमाम मुसन्निफ़ात को किसी एक आदमी से हासिल करके उनहें तलफ कर दिया और उन चीज़ो को अपनी तरफ मनसूब कर लिया। यहां यह सूरत क़तअन नामुमकिन थी जब कि वह कलाम उदबा के सीनों में महफूज़ था। अतराफो क़तारे आलमें इस्लामी में मुन्तशिर था और बहुत से लेखक उसकी तदवीन कर चुके थे। फिर जब कि सैय्यद रज़ी का जमा किया हुआ कलाम उस ज़खीरों से मुख्तलिफ होता या उसलूबे बयान में उस से जुदा होता तो वह तमाम उदबाए ज़माना, खुताबाए रोज़गार, उलमाए वक़्त जो उस कलाम को देखे हुए, पढ़े हुए या याद किए हुए थे, सदाए एहतिजाज बलन्द कर देते उनमें तलातुम हो जाता और सैय्यद रज़ी तमाम दूनिया में इसकी वजह से बदनाम हो  जाते। कम अज़ कम कोई उसके हम अस्र उदबा मे से इस की तनक़ीद ही करता हुआ एक किताब ही इस मौज़ुअ (विषय) पर लिख देता कि अमीरूल मोमिनीन (अ) का जो कलाम अब तक महफूज़ रहा यह सैय्यद रज़ी के जमा किए हुए ज़खीरे से मुख्तलिफ है। खुसूसन जब वह वजह जो बाद में एक तबक़े (वर्ग) को इस बाब में इनकार या तशकीक की मूजिब हुई जिसकी तफ्सील किसी हद तक आइन्दा दर्ज होगी, वह एक मज़हबी बुनियाद थी। यअनी यह कि नहजुल बलाग़ह में उन लोगों के बारे में जिन्हें सवादे आज़म क़ाबिले एहतिराम समझता है। कुछ तअरीज़ात या इन्तिक़ादी कलिमात हैं।

    ज़ाहिर है कि नहजुल बलाग़ह सलतनते अब्बासिया के दारूस सलतनत में लिखी गई जो अहले सुन्नत का मरकज़ था। उस वक़्त बड़े बड़े उलमा, हुफ्फाज़, उदबा, खुत्बा, अहले सियर और मुहद्दिसीन अहले सुन्नत में मौजूद थे और उनका जम्मे ग़फीर खास बग़दाद में मौजूद था। अगर अमीरूल मोमिनीन (अ) के वह खुत्बात जो इब्नुल मुक़फ्फ, इब्ने नबाता, अब्दुल हमीद इब्ने यहया, जाहिज़ और दीगर मुसल्लमुस सुबूत उदबा के दौर में मौजूद थे, इन तअज़ीरात से खाली थे और इस क़िस्म के मज़ामीन उनमें न थे बल्कि फितरी तौर पर इस सूरत में उसके खिलाफ चीज़ो पर उन्हें मुश्तमिल होना चाहिए था। तो उस वक़्त के अहले सुन्नत के उलमा उस पर क़यामत बरपा कर देते और उसको अपने मज़हब के खिलाफ एक अज़ीम हमला तसव्वुर करके पूरे तौर से उसका मुक़ाबला करते और उसकी धज्जियाँ उड़ा देते। मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ। कोई धीमी सी आवाज़ भी इसके खिलाफ बन्द नहीं हुई। यह इसका क़तई सुबूत है कि सैय्यद रज़ी के जमा किए हुए मजमुए में कोई नई चीज़ न थी बल्कि वह वही था जो उसके पहले मज़बूत व मुदव्विन, मुतदाविल व महफूज़ रहा था उलना क़तअन उससे अजनबियत नही रखते थे बल्कि उससे मानूस और उसके सुनने के और याद करने के आदी थे वह इस अदबी ज़खीरे को उसकी अदबी इफादियत के एतेबार से सर आखों पर रखते थे और इस तंग नज़री में मुब्तला न थे कि चूंकि इसमें कुछ चीज़ें हमारे मज़हब के खिलाफ हैं इस लिए इसका इनकार किया जाए या इससे अजनबियत बरती जाए।

    सातवाँ अम्र यह है कि बहुत सी किताबें अल्लामा सैय्यद रज़ी के क़ब्ल की इस वक़्त भी ऐसी मौजूद हैं जिनमें अमीरूल मोमिनीन (अ) के अक्सर मवाक़े के कलाम या खुत्बात को किसी मुनासिबत से ज़िक्र किया है, जैसे जाहिज़ (देहान्त सन 255 हिजरी), की अलबयान वत्तबईन, इब्ने कुतैबए दैनवरी (देहान्त सन 276 हिजरी), की उयूनुल अखबार व ग़रीबुल हदीस, इब्ने वाज़ेह यअक़ूबी (देहान्त सन 278 हिजरी), की मशहूर तारीख, अबू हनीफए दैनवरी (देहान्त सन 280 हिजरी), की अखबारूत्तुवाल, अबुल अब्बास अलमुबर्रद  (देहान्त सन 286 हिजरी), की अलमुबर्रद, मशहूर मुवर्रिख (इतिहासकार) इब्ने जरीरे तबरी  (देहान्त सन 410 हिजरी), की तारीखे कबीर, इब्ने वरीद (देहान्त सन 321 हिजरी), की किताब अलमुजतना, इब्ने अब्दे रूबेह (देहान्त सन 328 हिजरी) की इक़दुल फरीद, सक़तुल इस्लाम कुलैनी (देहान्त सन 329 हिजरी) की मशहूर किताब काफ़ी, मसऊदी (देहान्त सन 346 हिजरी) की तारीखे मुरुजुज़ ज़हब, अबुल फरजे इसफहानी (देहान्त सन 356 हिजरी) की किताब अग़ानी, अबु अली क़ाली (देहान्त सन 356 हिजरी) की किताब अननवादिर, शैख सदूक़ (देहान्त सन 381 हिजरी) की किताब अत्तौहीद और उनके दूसरे जवाम-ए-हदीस, शैख मुफ़ीद (देहान्त सन 416 हिजरी) अगरचे तारीखे वफ़ात के एतिबार से जनाबे रज़ी के बाद हैं मगर उनके उस्ताद होने की वजह से तबक़े (वर्ग) में उनसे पहले हैं, उनकी किताब अल-इर्शाद और किताबुल जमल। इन तमाम किताबों में जो हज़रत के खुत्बे दर्ज हैं, उनका जब मुक़ाबला अल्लामा सैय्यद रज़ी के मुन्दरजा खुतुब और अजज़ाए कलाम से किया जाता है तो अक्सर वह बिल्कुल मुत्तहिद होते हैं और नहजुल बलाग़ा में ऐसा दर्ज किया हुआ कलाम अगर कोई है जो इन किताबों में दर्ज नहीं है या इन किताबों में कोई कलाम ऐसा है जो नहजुल बलाग़ा में ज़िक्र नही है तो उसलूबे बयान और अन्दाज़े कलाम, तसलसुल व बलन्द आहंगी, जोश व हक़ाइक़ निगारी के लिहाज़ से यक़ीनन मुत्तहिद होता है। जिसमें किसी वाक़िफे अरबीयत को शक नहीं हो सकता। अमीरूल मोमिनीन के इस कलाम का जो नहजुल बलाग़ा में दर्ज है उस तमाम कलाम से जो हज़रत की तरफ निस्बत देकर और दूसरी किताबों में दर्ज है मुत्तहिदुल उसलूब होना फिर इस पहलू के ज़मीमे के साथ जिसका पहले तज़किरा हो चुका है कि वह खुद सैय्यद रज़ी के उस कलाम से जो नहजुल बलाग़ा में बतौर मुक़द्दमा या बतौर तबसिरा मौजूद है, बिल्कुल मुख्तलिफ होना एक ग़ैर जानिबदार शख्स के लिए इसका काफी सुबूत है कि यह वाक़ई अमीरूल मोमिनीन (अ) का कलाम है जिसे सैय्यद रज़ी ने जमा किया है।

    आठवां अम्र यह है कि खुद सैय्यद रज़ी के मुआसिरीन यी उनसे क़रीबुल अहद मुत्तहिद लोगों ने बतौरे खुद भी कलामे अमीरूल मोमिनीन (अ) के जमा करने की कोशिश की है और कुछ ने अपनी किताबों के ज़िम्न में दर्ज किया है। जैसे इब्ने मसक़ोया (देहान्त सन 421 हिजरी) ने हुलयतुल औलिया में अबू जाफर-ए-तूसी (देहान्त सन 460 हिजरी) ने जो शैख मुफीद से तलम्मुज़ की हैसियत से अल्लामा रज़ी के हम तबक़ा और सैय्यद मुर्तज़ा के शिष्य (शागिर्द) होने की हैसियत से भी और साले वफात के एतिबार से उनसे ज़रा मुअख्खर हैं। अपनी किताब तहज़ीब और किताबुल-अमाली में नीज़ अब्दुल वाहिद इब्ने अब्दुल वाहिद-ए-आमदी जो उसी अस्र के थे अपनी मुस्तक़िल किताब ग़ुरारूलहेकम जो अमीरूल मोमिनीन (अ) के मुख्तसर कलिमात पर मुश्तमिल है और  मिस्र व सैदा और हिन्दुस्तान में छप चुकी है और उसका उर्दू में तर्जुमा भी हो चुका है। नीज़ अबू सईद मनसूर इब्ने हुसैन आबी वज़ीर (देहान्त सन 422 हिजरी) अपनी किताब नुज़हतुल अदब व नसरूल दुरद में जिसका ज़िक्र कशफुज़-ज़ुनून बाबुन नून में है और क़ाज़ी अबू अबदुल्लाह मुहम्मद बिन सलामए क़ुताई शाफेई (देहान्त सन 453 हिजरी) जिनकी अज़ीमुश्शान किताब इस मौज़ुअ पर दस्तूरे मआलिमुल हेकम के नाम से है और वह मिस्र में छप चुकी है। यह सब तक़रीबन सैय्यद रज़ी के मुआसिरीन ही हैं। इन सब की कोशिशें हमारे सामने मौजूद हैं सिवाय अबू सईद मनसूर की किताब कि जिसका कशफुज़-ज़ुनून में तज़किरा है। बाक़ी यह सब किताबें मतबूअ व मुतदाविल हैं। इन में जो कलाम मुन्दरिज हैं वह भी अल्लामा सैय्यद रज़ी के दर्ज किए हुए कलाम से ऐनन मुत्तहिद या उसलूब में मुत्तफिक़ ही हैं। फिर अगर सैय्यद रज़ी की निस्बत यह तसव्वुर किया जाए कि उन्होने खुद इस कलाम में तस्नीफ़ कर दिया है तो उम तमाम जामेईन और अपनी किताबों के ज़िम्न में दर्ज करने वाले दूसरे अफराद को क्या कहा जाएगा फिर उनकी निस्बत भी यही तसव्वुर करना चाहिए जबकि उनमें से सब या ज़्यादा अफराद यक़ीनन जलालते शान और वरअ व तक़वा में सैय्यद रज़ी से बालातर नहीं मालूम होते। अब अगर उन सब की निस्बत यही ख्याल किया जाए तो खैर सैय्यद रज़ी तो अशअरूत्तालिबीन थे और कुतुबे सियर उन्हें खुद अदबियत और फ़साहत व बलाग़त में मेराजे कमाल पर ज़ाहिर करते हैं। मगर उनमें से हर शख्स की निस्बत तो यह तसव्वुर क़तई ग़लत है कि वह सब सैय्यद रज़ी ही के अदबी हैसियत से हमपाया थे। फिर ऐसे मुख्तलिफुल मर्तबा अश्खास की ज़हनी काविशों और क़लमी समरात में उतना फर्क़ क्यों नहीं है ? जो खुद उन अश्खास के मबलग़े इल्मी में यक़ीनी तौर पर पाया जाता है। अश्खास कि जो कलाम के जमा करने वाले हैं उनमें आपस में ज़मीनों आसमान का फर्क़ और कलाम जो उन्होने जमा किया है वह सब एक ही मरतबा, एक ही शान का इसे देखते हुए सिवाय ऐसे शख्स के जो जानबूझ कर हक़ीक़त का इनकार करने पर तुला हुआ हो और किसी को उसमें शको शुब्हा भी बाक़ी नही रह सकता कि उन अश्खास का कारनामा सिर्फ जमओ-तालीफ ही है। जिसमें उनके सलीक़े और ज़ौक़ का इख्तिलाफ फक़त शाने तरतीब और उनवाने तालीफ में नमूदार होता है, लेकिन अस्ल कलाम में उनकी ज़ाती क़ाबिलीयत, ज़िहानत और मब्लग़े इल्मी व मेयारे अदबी को ज़र्रा बराबर भी दख्ल नहीं है।

    नवां अम्र यह है कि ऊपर ज़िक्र किए गए अफराद अगरचे अपने ज़मानए हयात के कुछ हिस्सों में तो सैय्यद रज़ी से मुत्तहिद हैं, मगर उनमें से मुत्तहिद अफराद के देहान्त के वर्ष को देखते हुए यह यक़ीन है कि उनका ज़माना जमओ-तालीफ़े नहजुल बलाग़ा से मुअख्खर है और उसके बाद एक ऐसा मुअख्खर है और उसके बाद एक ऐसा तबक़ा (वर्ग) है जो बिल्कुल सैय्यद रज़ी से मुअख्खर ही है। जैसे इब्ने अबिल हदीद (देहान्त सन 655 हिजरी), सिब्ते इब्ने जौज़ी (देहान्त सन 606 हिजरी) और उसके बाद बहित से मुसन्निफ़ीन। ज़ाहिर है कि सैय्यद रज़ी की किताब नहजुल बलाग़ा गोशए गुमनामी में उन लोगों से मख्फ़ी न थी। उन लोगों का मुहर्रिक जमओ-तालीफ़ पर सिर्फ़ यह था कि सैय्यद रज़ी ने इन्तिखाब से काम लेते हुए या माखज़ों की कमी से या उन नुस्खों के किर्म खुर्दा या नाक़िस होने की वजह से जो उनके पास थे, बहुत से अजज़ा कलामें अमीरूल मोमिनीन (अ) के नक़्ल नही भी किए थे। इस लिए मुसन्निफ़ीन को मुस्तदरक और मुस्तदरक दर मुस्तदरक की ज़रूरत पड़ती रही जिसका सिलसिला माज़िए क़रीब में अल्लामा शैख हादी आले काशिफुल ग़िता तक जारी रहा। जिन्होनें मुस्तदरक-ए-नहजुल बलाग़ा तहरीर फरमाया। जो नजफे अशरफ में छप चुकी है। अगर सैय्यद रज़ी के क़रीबुल अहद या उनके बाद के अहले क़लम में किसी को भी नहजुल बलाग़ा के मुन्दरजा कलिमाते खुतुब में यह ख्याल होता कि यह सैय्यद रज़ी ने तस्नीफ करके उसमें शामिल कर दिए हैं तो वह सब बिल-खुसूस मुआसिरीन जो किसी रियायत के लिए कभी तैयार नही होते, अपनी किताब की वजहे तालीफ़ में इसका तज़किरा ज़रूरी समझते कि चुंकि इसके क़ब्ल जो किताब जो अमीरूल मोमिनीन (अ) के खुत्बों पर मुश्तमिल कह कर लिखी गई है उसमें आप का अस्ल कलाम मौजूद नहीं है। बल्कि साख्ता व परदाख्ता और वज़ई है। इस लिए हमें ज़रूरत महसूस हुई कि हम आपका अस्ली कलाम मन्ज़रे आम पर लायें, जब कि ऐसा नही हुआ और यह बिल्कुल मुशाहिदा है कि कि ऐसा नही हुआ, तो हमें मानना पड़ता है कि उन सबके नज़दीक अल्लामा रज़ी ने जो कलाम जमा किया वह बिला शुब्हा कलामे अमीरूल मोमिनीन (अ) की हैसियत से इसके पहले से मुदव्विन व मुतदाविल था और उनको अल्लामा रज़ी से शिकायत सिर्फ बअज़ खुत्बों को छोड़ देने या इहाता व इस्तिक़ज़ा न करने या शाने तरतीब व उनवाने तालीफ में किसी नामुनासिब तर सूरत को इख्तियार न करने की थी, जिसके लिए उन्होंने भी इस बारे में कोशिश ज़रूरी समझी, जिसका सिलसिला अभी तक जारी है और मुम्किन है कि बअज़ मुसन्निफीन अब भी किसी खास तरतीब से नहजुल बलाग़ा के मुन्दरिजा खुतुब को देखने के मुतमन्नी हों। यह दूसरी चीज़ है और अस्ल काम के बारे में किसी शको-शुब्हे का रखना दूसरी चीज़ है।

    दसवां अम्र यह है कि तलाश की जाती है तो नहजुल बलाग़ा के मुन्दरिजा खुतुब व अक़वाल का पता अब भी बे-उयूने अलफाज़ेहा नहजुल-बलाग़ा के क़ब्ल लिखी गई किताबों में मिल जाता है। और जब कि उसका अक्सर हिस्सा क़ब्ल की किताबों में मुन्दरिज मौजूद है तो थोड़ा सा हिस्सा अगर दस्तयाब न भी हो तो एक मोतदिल ज़हन में इससे कोई शक व शुब्हा पैदा नहीं हो सकता जब कि यह मालूम है कि दूनिया में मुख्तलिफ हवादिस के ज़ैल में किताबों के इतने ज़खीरे तलफ हुए हैं जो अगर मौजूद होते तो यक़ीनन मौजूदा ज़खाएर से बदरजहा ज़ियादा होते। खुद तारीख़ ने कलामे अमीरूल मोमिनीन (अ) के जिन जमा-शुदा ज़खीरों का पता अल्लामा रज़ी के क़ब्ल हम तक पहुंचा दिया है वही सब इस वक़्त कहां मौजूद हैं? इस लिए अगर बअज़ मुन्दरिजात राइजुल-वक़्त किताबों में नहीं भी मिलते तो ज़हन यही फैसला करता है कि उन किताबों में मौजूद होंगे, जिन तक हमारा इस वक़्त दस्तरस नहीं है। नहजुल बलाग़ा के मुन्दरिजात के उन हवालों को पहले अल्लामा शैख़ हादी काशिफुल-ग़िता मुस्तदरक-ए-नहजुल बलाग़ा के असनाए तालीफ ही में मदारिके नहजुल बलाग़ा के नाम से मुरत्तब किया था जो ग़ालिबन मुकम्मल शाए नहीं हुआ है और एक क़ाबिले क़द्र कोशिश रामपुर के एक सुन्नी फ़ाज़िल अर्शी साहब ने की है। जो “फारान” कराची में मक़ाले की सूरत में शाए हुई है और मज़ीद तलाश की जाए तो इस सिलसिले में मज़ीद कामयाबी का भी इमकान है।

    ग्यारहवां अम्र यह है कि मुहक़्किक़ीने उलमाए शीआ का रवैया देखा जाए तो वह हर उस किताब या मजमुए को जो मासूमीन में से किसी की तरफ मंसूब हों बिला चूनो चेरा सिर्फ इस लिए तस्लीम करने के लिए तैयार नहीं हो जाते कि वह मासूमीन की जानिब मंसूब है बल्कि वह पूरी फ़राख़ हौसलगी के साथ मुहक़्किक़ाना फ़रीज़े को अंजाम देते हुए अगर वह क़ाबिले इनकार होता है तो खुल कर उसका इनकार कर देते हैं और अगर मशकूक होता है तो शको शुब्हा का इज़हार कर दिया करते हैं और इस तरह बहुत से वह ज़ख़ीरे जो कलामे मासूमीन के नाम से मौजूद है मक़ामे एतबार में मुख्तलिफ दर्जे इख्तियार कर चुके हैं। मसलन दीवाने अमीरूल मोमिनीन (अ) भी तो कलामे अली ही राएज है मगर उलमाए शीया बिला रू रियायत उसे ग़लत समझते हैं। इससे बलातर ज़रा दर्जा तफसीरे इमाम हसन असकरी (अ) का है, हालांकि वह शोहरत में तक़रीबन नहजुल बलाग़ा से कम नहीं है और शैख सदूक़ ऐसे बलंद मरतबा क़दीम मुहद्दिस नें इस पर एतिमाद किया है मगर अक्सर उलमाए शीया इसे तसलीम नहीं करते। यहां तक कि हमारे क़रीबी दौर के मुहक़्क़िक़ अल्लामा शैख मुहम्मद जवाद-ए-बलाग़ी ने एक पूरा रिसाला इसके ग़लत होने के इल्बात में लिख दिया है फ़िक़हुर्रिज़ा इमामे रिज़ा (अ) की तरफ मन्सूब है मगर उसके एतबार और अदमे एतबार की बहस एक मुहतम बिश्शान इल्मी मसअला बन गई है। जिस पर मुसतक़िल किताबें लिखी गई हैं। इसी तरह जाफरियात और इमामे रिज़ा (अ) का रिसालए ज़हबिया वग़ैरह कोई नग़दो बहस से नहीं बचा है। इस रवैय्ये के बावजूद सैय्यद रज़ी के बाद से इस वक़्त तक किसी दौर में भी किसी शीया आलिम का  की तरफ मन्सूब है नहजुल बलाग़ा के खिलाफ आवाज़ बलंद न करना और उसमें ज़र्रा बराबर भी शको शुब्हा का इज़हार न करना इसका क़तई सुबूत है कि उन सब की नज़र में उसकी हैसियत इन तमाम मजमूओं से मुमताज़ और जुदागाना है। नहजुल बलाग़ा के हम पल्ला इस हैसियत से अगर कोई किताब है तो वह सिर्फ सहीफए कामिलह और उसी तरह मुसल्लम तौर पर इमामे ज़ैनुल आबिदीन (अ) के कलाम का मजमूआ है और कोई किताब इस ज़ैल में इन दोनो के हम-मरतबा नहीं है।

    मज़कूरा बाला वुजूह का नतीजा यह है कि अल्लामा रज़ी के बाद तक़रीबन दो ढ़ाई सौ बरस तक नहजुल बलाग़ा के खिलाफ कोई आवाज़ उठते हुए नहीं मालूम होती बल्कि मुख्तलिफ उलमाए अहले सुन्नत नें उसकी शरहें लिखी हैं। जैसे अबुल हसन अली इब्ने अबिल क़ासिमे बहीक़ी (देहान्त सन 655 हिजरी), अल्लामा सादुद्दीन तफताज़ानी वग़ैरह। ग़ालिबन इन्हीं उलमाए अहले सुन्नत के शरहें लिखने का नतीजा था कि अवाम में नहजुल बलाग़ा का चर्चा फैला और उसके बाद उन मज़ामीन के बारे में जो खुलफाए सलासा के बारे में हैं अहले सुन्नत में बेचैनी पैदा हुई और अब आपस में बहसें शुरू हो गई और उसकी वजह से उलमा को अपने उसूले अक़ाएद संभालने के लिए और अवाम को तसल्ली देने के लिए नहजुल बलाग़ा में शुकूक न शुब्हात और रफता-रफता इनकार की ज़रूरत पड़ी। चुनांचे सबसे पहले इब्ने खल्लकान (देहान्त सन 681 हिजरी) ने इसके मशकूक बनाने की कोशिश की और अल्लामा मुर्तज़ा के हालात में यह लिखा कि:-

    “लोगों में किताबे नहजुल बलाग़ा के बारे में जो अमीरूल मोमिनीन अली इब्ने अबी   तालिब (अ) के                                                               कलाम का मजमूआ है इख्तिलाफ है कि वह उन्हीं (सैय्यद मुर्तज़ा) का जमा कर्दा है या उनके भाई सैय्यद रज़ी का और बअज़ कहते हैं कि वह जनाबे अमीर का कलाम ही नही है, बल्कि जिसे जामेए समझा जाता है उसी की यह तसनीफ़ है। वल्लाहो अअलम!