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    मुसलमानों के दरमियान क़ुरआन की अहमियत : 5

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    जैसे कि क़ुरआने करीम के सूरए अलक़ की आयत न. 1-5 में वर्णन हुआ है कि “इक़रा बिस्मि रब्बिका अल्लज़ी ख़लक़ * ख़लाक़ल इंसाना मिन अलक़ *इक़रा व रब्बुकल अकरम * अल्लज़ी अल्लमा बिल क़लम * अल्लमल इंसाना मा लम याअलम।”

    अनुवाद– उस अल्लाह का नाम ले कर पढ़ो जिसने पैदा किया। उसने इंसान को जमे हुए ख़ून से पैदा किया। पढ़ो और तुम्हारा पालने वाला (अल्लाह) बहुत करीम (दयालु) है। जिसने क़लम (लेखनी) के द्वारा शिक्षा दी। और इंसान को वह सब कुछ बता दिया जो वह नही जानता था।

    परन्तु यह सब होते हुए भी इंसान अल्लाह की सहायता का इच्छुक है। ताकि मूर्खता व घमंड की खाई में न गिर सके। अल्लाह ने इंसान की प्रधानता से सम्बंधित क़ुरआन की उपरोक्त वर्णित आयात का वर्णन करने फौरन बाद कहा कि—

    “कल्ला इन्नल इंसाना लयतग़ा * अन राहु इसतग़ना * ”

    अनुवाद– निःसन्देह इंसान सरकशी करता है। वह अपने बारे में यह विचार रखता है कि उसे किसी चीज़ की आवश्यक्ता नही है।

    बाद में वर्णित यह दोनों आयते इंसान की कमज़ोरी की ओर संकेत करती है। और क़ुरआने करीम की अन्य आयतें इंसान के सम्बंध में इस प्रकार वर्णन करती हैं।

    “ इन्नहु काना ज़लूमन जहूलान ” (सूरए अहज़ाब आयत न.72)

    अनुवाद–वह बहुत ज़ालिम व जाहिल था।

    “ इन्नल इंसाना लज़लूमुन कफ़्फ़ारुन”(सूरए अल इब्राहीम आयत न.34)

    अनुवाद–इंसान ज़ालिम व शुक्र न करने वाला है।

    “ काना अल इंसानु अजूलन” (सूरए अल असरा आयत न. 11)

    अनुवाद– इंसान बहुत जल्दबाज़ था।

    “ व ख़ुलिक़ल इंसानु ज़ईफ़न” (सूरए अन्निसा आयत न.28)

    अनुवाद–इंसान को कमज़ोर पैदा किया गया है।

    “ इन्नल इंसाना ख़ुलिक़ा हलूअन” (सूरए अल मआरिज आयत न. 19)

    अनुवाद–निःसन्देह इंसान को लालची पैदा किया गया है।