islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. मुसलमानो के दरमियान क़ुरआन की क्या अहमियत है? : 9

    मुसलमानो के दरमियान क़ुरआन की क्या अहमियत है? : 9

    Rate this post

    क़ुरआने मजीद जो इन फ़ैसला कुन और पुख़्ता अंदाज़ से ख़ुदा का कलाम होने का ऐलान और उसका सबूत फ़राहम करता है। अव्वल से लेकर आख़िर तक साफ़ तौर पर हज़रत मुहम्मद (स) का अपने रसूल और पैग़म्बर के तौर पर तआरुफ़ कराता है और इस तरह आँ हज़रत (स) के नबूवत की सनद लिखता है। इसी बेना पर कई बार ख़ुदा के कलाम में पैग़म्बरे अकरम को हुक्म दिया जाता है कि अपनी नबूवत व पैग़म्बरी के सबूत में ख़ुदा की शहादत यानी क़ुरआने मजीद की रौ से अपनी नबूवत का ऐलान करें: ऐ नबी कह दें कि मेरे और तुम्हारे दरमियान, मेरी नबूवत और पैग़म्बरी के मुतअल्लिक़ ख़ुद ख़ुदा की शहादत काफ़ी है। (सूरह रअद आयत 43) एक और जगह (क़ुरआने मजीद) में ख़ुदा वंदे करीम की शहादत के अलावा फ़रिश्तों की शहादत भी है: लेकिन ख़ुदा वंदे तआला ने जो चीज़ तुझ पर नाज़िल की है उसके मुतअल्लिक़ ख़ुद भी शहादत देता है और फ़रिश्ते भी शहादत देते हैं और सिर्फ़ ख़ुदा वंदे तआला की शहादत काफ़ी है। (सूरह निसा आयत 166)