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    मुस्तहब ग़ुस्ल

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    (651) इस्लाम की मुक़द्दस शरीअत में बहुत से ग़ुस्ल मुस्तहब हैं जिन में से कुछ यह हैं:

    जुमे के दिन का ग़ुस्ल
    1-
    इस का वक़्त सुब्ह का अज़ान के बाद से सूरज के ग़ुरूब होने तक है और बेहतर यह है कि ग़ुस्ल ज़ोहर के क़रीब किया जाये (और अगर कोई शख़स उसे ज़ोहर तक अंजाम न दे तो बेहतर यह है कि अदा और क़ज़ा की नियत किये बग़ैर ग़रूबे आफ़ताब तक बजालाये) और अगर जुमे के दिन ग़ुस्ल न करे तो मुस्तब है कि हफ़ते के दिन सुबह से ग़ुरूबे आफ़ताब तक उस का क़ज़ा बजा लाये। और जो शख़स जानता हो कि उसे जुमे के दिन पानी मयस्सर न होगा तो वह रजाअन जुमेरात के दिन ग़ुस्ल अंजाम दे सकता है और मुस्तहब है कि ग़ुस्ले जुमा करते वक़त यह दुआ पढें:

    अशहदु अन ला इलाहा इल्लल्लाहु वहदहु ला शरीकलहु व अशहदु अन्ना मुहम्मदन अब्दुहु व रसूलुहू अल्लाहुम्मा सल्लि अला मुहम्मदिन व आलि मुहम्मद व इजअलनी मिनत तव्वाबीना व इजअलनी मिनल मुत्ताहिरीन।

    (2-7) माहे रमाज़ान की पहली और सतरहवीं रात और उन्नीस्वी, इक्कीससवीं, और तेईसवीं रातों के पहले हिस्से का ग़ुस्ल और चौबीसवीं रात का ग़ुस्ल।

    (8-9) ईदुलफ़ित्र और ईदे क़ुरबान के दिन का ग़ुस्ल, उस का वक़्त सुब्ह की अज़ान से सूरज ग़ुरूब होने तक है और बेहतर यह है कि ईद की नमाज़ से पहले कर लिया जाये।

    (10-11) माहे ज़िल हिज्जा के आठवें और नवें दिन का ग़ुस्ल और बेहतर यह है कि नवें दिन का ग़ुस्ल ज़ोहर के नज़दीक किया जाये।

    (12) उस शख़्स का ग़ुस्ल जिसने अपने बदन का कोई हिस्सा ऐसी मय्यित के बदन से मस किया हो जिसे ग़ुस्ल दिया जा चुका हो हो।

    (13) अहराम का ग़ुस्ल।

    (41) हरमे मक्का में दाख़िल होने का ग़ुस्ल।

    (15) मक्काए मुकर्रमा में दाखिल होने का ग़ुस्ल।

    (16) ख़ान-ए-काबा की ज़ियारत का ग़ुस्ल।

    (17) काबे में दिखिल होने का गुस्ल।

    (18) ज़िब्ह और नहर के लिये ग़ुस्ल।

    (19) बाल मूनडने के लिए गुस्ल।

    (20) हरमे मदीना में दिख़िल होने का ग़ुस्ल।

    (21) मदीन-ए- मुनव्वरा में दाख़िल होने का ग़ुस्ल।

    (22) मस्जिदुन नबी में दाख़िल होने का ग़ुस्ल।

    (23) नबी-ए-अकरम सल्लल्लाहु अलैहे व आलिही वसल्लम की क़ब्रे मुतह्हर से विदा होने का ग़ुस्ल।

    (24) दुश्मन के साथ मुबाहिला करने का ग़ुस्ल।

    (25) बच्चे के पैदा होने के बाद उसे ग़ुस्ल देना।

    (26) इस्तिख़ारा करने का ग़ुस्ल।

    (27) तलबे बारान का ग़ुस्ल।

    (652) फ़ोक़ाहा ने मुस्तब ग़ुस्लों के बाब में बहुत से ग़ुस्लों का ज़िक्र फ़रमाया जिन में से चंद यह हैं:

    (1) माहे रमाज़ानुल मुबारक की तमाम ताक़[1] रातों का ग़ुस्ल और उस का आख़री दहाई की तमाम रातों का ग़ुस्ल और उस का तीसवीं रात के आख़री हिस्से में दूसरा ग़ुस्ल।

    (2) माहे ज़िल हिज्जा के चौबीसवें दिन का ग़ुस्ल।

    (3) ईदे नोरोज़ के दिन और पंद्रहवीं शाबान और नवीं और सतरहवीं रबी उल अव्वल और ज़ीक़ादा के पच्चीसवें दिन का ग़ुस्ल।

    (4) उस औरत का ग़ुस्ल जिस ने अपने शौहर के अलावा किसी और के लिये ख़ुशबू इस्तेमाल की हो।

    (5) उस शख़्स का ग़ुस्ल जो मसती की हालत में सो गया हो।

    (6) उस शख़्स का ग़ुस्ल जो किसी सूली चढ़े हुए इंसान को देखने गया हो और उसे देखा भी हो लेकिन अगर इत्तेफ़ाक़न या मज़बूरी की हालत में नज़र गई हो या अगर शहादत (गवाही) देने गया हो तो ग़ुस्ल मुस्तहब नही है।

    (7) दूर या नज़दीक से मासूमीन अलैहिमुस्सलाम की ज़ियारत करने के लिए ग़ुस्ल, लेकिन अहवत यह है कि यह तमाम ग़ुस्ल रजा का नियत से बजा लाये जायें।

    (653) उन मुस्तहब ग़ुस्लों के साथ जिन का ज़िक्र मस्ला 651 में किया गया है इंसान ऐसे काम कर सकता जिनके लिए वुज़ू लाज़िम है जैसे नमाज़ (यानी वुज़ू करना ज़रूरी नहीं है) लेकिन जो ग़ुस्ल रजा की नियत से किये जायें उनके बाद वुज़ू करना ज़रूरी है। (हज़रत आयतुल्लाहिल उज़मा सैयद अली हुसैनी सीसतानी (ह.ज़))

    (654) अगर इंसान के ज़िम्मे कई मुस्तहब ग़ुस्ल हों और वह शख़्स सब की निय्यत कर के एक ग़ुस्ल कर ले तो काफ़ी है।

    [1] ताक़ राते उन रातों को कहा जाता है जिनकी गिनती में जोड़े नही होते जैसे पहली, तीसरी, पाँचवीं, सातवीं….।