islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. मुस्तहब रोज़े

    मुस्तहब रोज़े

    Rate this post

    हराम और मकरूह रोज़ों के अलावा जिन का ज़िक्र किया जा चुका है साल के तमाम दिनों के रोज़े मुस्तहब है और बाज़ दिनों के रोज़े रखने की बहुत ताकीद की गई है जिन में से चंद यह हैः

    (1) हर महीने की पहली और आख़री जुमेरात और पहला बुध जो महीने की दसवीं तारीख़ के बाद आये। और अगर कोई शख्स यह रोज़े न रखे तो मुस्तहब है कि उन की कज़ा करे और रोज़ा बिल्कुल न रख सकता हो तो मुस्तहब है कि हर दिन के बदले एक मुद तआम या 12/6 नुख़ुद सिक्केदार चाँदी फ़क़ीर को दे। (2) हर महीने की तेरहवीं, चौदहवीं और पंद्रहवीं तारीख़। (3) रजब और शाबान के पूरे महीने के रोज़े। या उन दो महीनों में जितने रोज़े रख सकें चाहे वह एक दिन ही क्यों न हो। (4) ईदे नौ रोज़ के दिन। (5) शव्वाल की चौथी से नवीं तारीख तक। (6) ज़ीक़ादा की पच्चीसवीं और इक्कीसवीं तारीख़। (7) ज़ीक़ादा की पहली तारीख से नवीं तारीख़ (यौमे अरफ़ा) तक लेकिन अगर इंसान रोज़े की वजह से बेदार होने वाली कमज़ोरी की बिना पर यौमे अरफ़ा की दुआयें न पढ़ सके तो उस दिन का रोज़ा मकरूह है। (8) ईदे सईदे ग़दीर के दिन (18 ज़िलहिज्जा) (9) रोज़े मुबाहिला (24 ज़िलहिज्जा) (10) मुहर्रामुल हराम की पहली, तीसरी और सातवीं तारीख़। (11) रसूसले अकरम (स0) की विलादत का दिन (17 रबी-उल-अव्वल) (12) जमादीयुल अव्वल की पंद्रहवी तारीख़। और ईदे बेसत यानी रसूले अकरम (स0) के ऐलाने रिसालत के दिन (27 रजब) को भी रोज़ा रखना मुस्तहब है। और जो शख्स मुस्तहब रोज़ा रखे उस के लिए वाजिब नहीं है कि उसे इख़्तिताम तक ही पहुँचाये बल्कि अगर उस का काई मोमिन भाई उसे खाने की दावत दे तो मुस्तहब है कि उस की दावत क़बूल कर ले और दिन में ही रोज़ा खोल ले चाहे ज़ोहर के बाद ही क्यों न हो।