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    मेरी बेटी केवल मेरी दोस्त

    मेरी बेटी केवल मेरी दोस्त
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    नौजवानी एक ऐसा टाइम होता है जब लड़की भावनाओं और एहसासों के बहाव में बहती है, साथ ही उसके दोस्तों का भी उसके ऊपर बहुत गहरा असर पड़ता है। लड़का और लड़की दोनों ही इसके लपेटे में ज़बरदस्त तरीक़े से आ जाते हैं। यह आपके सामने बहुत बड़ा चेलेंज है कि आप किस तरह अपने जवान बच्चों को हैंडिल करते हैं क्यों कि यही वह समय है जिसमें आप को गंभीर दौर से गुज़रना पड़ता है वह भी पॉज़ेटिव रिज़ल्ट के साथ। अफ़शीन की चौदह साल की बेटी है। वह अपनी बेटी को लेकर बहुत परेशान है। वह सारे दिन फ़ोन पर बाती करती है, अपनी दोस्त की देखा-देखी कपड़े पहनती है, अपनी दोस्तों के साथ बाहर घूमती फिरने की ज़िद करती है, और हर दिन उसकी नई-नई ज़िदें सामने आ रही हैं आख़िर वह कहां तक उन्हें कंट्रोल करें। अगर एक बात समझा बुझाकर मनवा भी ली जाए तो दूसरी कैसे मनवाएँ। उसके इस व्यवहार ने अफ़शीन को बड़ी टेंशन में डाल दिया है। इंटरनेट से जुड़े रहने की आदतों से माँ-बाप चिंतित हो जाते हैं। और होना भी चाहिए क्योंकि नौजवान बच्चों पर कहाँ तक नज़र रखी जा सकती है। वह ऐसी ऐज की तरफ़ क़दम बढ़ा रहे होते हैं जहाँ वह किसी की भी रोक-टोक पसंद नहीं करते हैं। बेटी के अंदर बदलते हुए व्यवहार को देखकर आपका परेशान होना नेचुरल है। और यही वह समय है जब आपका एक्टिव रहना और उसे संभालना सबसे ज़रूरी है। इस ऐज में उन्हें हैंडिल करना थोड़ा मुश्किल हो जाता है लेकिन अगर उन की परवरिश सही सिद्धांतों पर हुई होगी तो यह काम आसान हो जाएगा। किन्तु इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि नौजवानी में बदलाव आना नेचुरल है। इस ऐज में हर लड़की के सामने अड़चनें आती ही हैं। इस दौर में भटकने के चांसेज़ भी बहुत ज़्यादा होते हैं। इस लिए आप को लगता है कि कहीं वह बिगड़ने के रास्ते पर तो नहीं जा रही है। ऐसी सिचुएशन में उस पर पाबन्दी लगाने के साथ-साथ उसकी भावनाओं का ख़्याल रखते हुए प्यार से उसे समझाएँ।
    आज़ादी देनी होगी
    सख़्ती करना या रोक-टोक करना बेटी को हैंडिल करने का कोई बहुत अच्छा तरीक़ा नहीं है बल्कि आप को उसको कुछ आज़ादी तो देनी ही पड़ेगी। आप को उस पर भरोसा कर के ख़ुद उसे अपने लिए चीज़ें चुनने की छूट देनी होगी। उसके लिए आप को उसके भरोसे से लेकर उसके साथ बैठकर बात करनी होगी। इससे उसके दिल और दिमाग़ में क्या चल रहा है, वह क्या चाहती है, यह सब समझने में आप को मदद मिलेगी। याद रखिए, नौजवानी आपकी बेटी की ज़िन्दगी का एक बड़ा ख़ूबसूरत चैप्टर है। उसे इस दौरान बहुत ध्यान से संभालें।
    माँ से शिकायत
    ज़्यादा तर देखा गया है कि बेटी को माँ से यह शिकायत रहती है कि उसकी माँ उसे समझना ही नहीं चाहती। ऐसा तभी होता है जब माँ उसे कंट्रोल करने की कोशिश करती है। एक बिहेवियरल फ़िज़िशियन का कहना है कि जैसे ही “माँ” ज़बान पर आता है, तो दिमाग़ में जो इमेज बनती है वह उस औरत की होती है जो अपने बच्चों से ग़लतियाँ होने पर उन्हें माफ़ कर देती है। हमेशा उनका ख़्याल रखती है, उनको कोऑप्रेट करती है। इस में कोई शक नहीं कि माँ और बेटी का रिश्ता बहुत गहरा होता है, लेकिन वह अलग-अलग तरह से सोचती हैं क्यों कि उन के बीच जेनेरेशन गैप होता है। बेटी जब बड़ी हो जाती है तो वह दो अलग-अलग औरतें भी बन जाती हैं। इसलिए बेहतर यही होगा कि इस से पहले कि आप कि आपकी बेटी आपको ही अपना दुश्मन समझने लगे, आप उसके बड़े होते ही उसकी दोस्त बन जाएँ। अपनी बेटी के साथ इस तरह रहें और उसके अंदर ऐसी फ़ीलिंग पैदा करें कि वह आपको अपना दोस्त ही समझे क्यों कि जब आप दोस्त बन जाएंगी तो वह आप से बिना झिझके सारी बातें कर लेगी।
    ख़ुद को आइडियल बनाना होगा
    आपकी बात का किसी पर भी तब तक असर नहीं होगा जब तक कि आप ख़ुद उस बात पर अमल न करती हों। इस लिए आपको अपनी बेटी के लिए एक अच्छी मिसाल बनना होगा। अपनी नौजवान बेटी के साथ जैसे को तैसा वाला बर्ताव बिल्कुल नहीं करना चाहिए। अपने व्यवहार से उसे यह जताएँ कि आप उससे प्यार करती हैं। आपकी बेटी से अगर कोई ग़लती हो भी जाए तो नाराज़ होने के बजाए उस बारे में उस से बात करें और उसे समझाएं कि उससे कहाँ और कैसे ग़लती हुई है। नौजवान जानते हैं कि क्या सही है और क्या ग़लत है लेकिन फिर भी एक एक्सपेरिमेंट करना चाहते हैं क्यों कि उन्हें एक्सपेरिमेंट करना पसंद है। इस लिए उन्हें इतनी आज़ादी दें कि वह अपने एक्सपेरिमेंटस आप के साथ शेयर कर लें।
    क्वॉलिटी टाइम
    अपनी बेटी के साथ क्वालिटी टाइम ज़रूर बिताएं। उसे यक़ीन होना चाहिए कि आप उसे कुछ करने से रोकेंगी नहीं। फिर वह हर बात आप को बताएगी और इस तरह आप जब उसके दिल की बात जान लेंगी तो फिर आप उसे सही तरह से गाइड कर पाएंगी। इस तरह वह आपके अगेंस्ट जाने के बजाए आपकी राय माल लेगी।
    स्पेस दें
    ग़ैर ज़रूरी रोक-टोक आपके लिए फ़ाएदेमंद साबित नहीं होगी। ज़्यादा रोकने-टोकने से आपके ताल्लुक़ात में ख़राबी पैदा हो सकती है। इस लिए उसे ज़रूरी और थोड़ा स्पेस दें। थोड़ी सी आज़ादी और थोड़ी सी रोक-टोक उसकी लाइफ़ में एक बैलेंस बनाने के लिए बहुत ज़रूरी है। इस लिए मौक़ा देख कर प्यार और डांट फटकार भी ज़रूरी है।
    लाइफ़ में हर चीज़ की अपनी एक जगह होती है। जगह बदलने से उसका बैलेंस बिगड़ जाता है। अपने बच्चों की परवरिश में इसका ख़याल रखना बहुत ज़रूरी है। इमाम अली (अ.) ने इंसाफ़ (न्याय) की डिफ़ीनीशन यह बताई है कि किसी भी चीज़ को उसकी सही जगह पर रख देने को इंसाफ़ (न्याय) कहते हैं और किसी भी चीज़ को उसकी जगह से हटा देने को ज़ुल्म कहते हैं। इसलिए ख़ास कर इस मामले में बच्चों के साथ इंसाफ़ से पेश आएं।