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    मोतियों का हार

    मोतियों का हार
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    अब्दुल्लाह ने अपने हीरे मोतियों पर एक नज़र डाली और उन पर हाथ फेरा। उन्हें वह कितना अधिक पंसद करता था। उनमें से कुछ मोती बड़े और सुन्दर थे जिन्हें अब्दुल्लाह प्रतिदिन कई बार थैली से निकालता था और देखता था और फिर से थैली में रख देता था। यह उसकी दैनिक दिनचर्या थी, ऐसा प्रतीत होता था कि मोतियों के बग़ैर वह सांस भी नहीं ले पायेगा।

    उन्हें निहारते समय उसके मन में उनमें छेद करने का विचार आया। इस प्रकार वह अपनी पत्नी के लिए एक बहुत सुन्दर और क़ीमती हार तोहफ़े में दे सकता था। तुरंत मोतियों को थैली में डाला और एक डिब्बे में रखा। अब उसे बाज़ार जाना था। टोपी पहनी और गले में रूमाल डाला और घर से निकल गया। बाज़ार ज़्यादा दूरी पर नहीं था। पैदल ही चल पड़ा। गलियों से गुज़रते हुए वह बाज़ार पहुंचा। कुछ समय तक खोजने के बाद जिससे मिलने आया था उसे ढूंढ निकाला। इबाद नामक एक प्रतिभाशाली एवं कलाकार युवा कि जो अपनी कला में अद्वितीय था। तैय यह पाया कि इबाद 100 दीनार लेकर उन मोतियों में सूराख़ करेगा। दोनों अब्दुल्लाह के घर की ओर चल पड़े।

    इबाद ने जैसे ही घर के अंदर प्रवेश किया तो उसकी सुन्दरता और विशालता देखकर दंग रह गया। ऐसा बड़ा घर कि जिसका आंगन फूलों और पौदों से भरा हुआ था तथा आंगन के बीचो बीच एक मनमोहक पानी का हौज़ था। उन्होंने एक ऐसे हॉल में प्रवेश किया कि जिसकी दीवारें सुन्दर वस्तुओं एवं चित्रकारी से सजी हुईं थीं। अब्दुल्लाह ने इबाद से कहा तुम यहीं ठहरो, मैं मोती लेकर आता हूं।

    उसके बाद वह हॉल से बाहर चला गया। इबाद कि जो इसी तरह अपने चारों ओर देख रहा था तो उसकी नज़र चंग नामक एक बड़े एवं सुन्दर वीणा पर पड़ी कि जो एक कोने में बहुत ही सलीक़े से रखा हुआ था। वह उसके निकट गया और उस पर हाथ फेरने लगा तथा उसके हाथ ने उसके तारों को छेड़ा। चंग की मनमोहक एवं मधुर आवाज़ ने हॉल की ख़ामोशी को तोड़ा। उसी समय अब्दुल्लाह ने हॉल में प्रवेश किया और चंग से निकलने वाले संगीत को सुनकर अचंभे में रह गया तथा आश्चर्य से उसने अपनी भंवों को सिकोड़ते हुए इबाद से कहा, क्या तुम्हे पता है यह कौन सा यंत्र है? जी साहब, चंग है। क्या तुम इसे बजा सकते हो? जी बजा सकता हूं। बहुत बढ़िया। फिर तो अच्छा है कि काम शुरू करने से पहले थोड़ा सा चंग बजा लो ताकि दिलो दिमाग़ ताज़ा हो जाए। इबाद ने चंग बजाना शुरू कर दिया। जैसे जैसे तारों पर उसकी उंगलियां पड़ रही थीं चंग से मधुर संगीत उठ रहा था और अब्दुल्लाह उसे सुनकर मस्त हो रहा था। इबाद बजाये जा रहा था और उसे मज़ा आ रहा था। दोपहर हो गई, इबाद ने बजाना बंद कर दिया। वह चंग को रखने ही वाला था कि अब्दुल्लाह ने कहा क्या कर रहे हो? और सुनने का मन कर रहा है। जल्दी क्या है, अभी और बजाओ। इबाद कि जिसे मोतियों में सूराख़ करने चिंता हो रही थी कहने लगा, लेकिन साहब लगता है आप भूल गए हैं कि में आपकी सेवा में क्यों उपस्तिथ हुआ हूं। मुझे अपना अस्ल काम शुरू करना चाहिए। ज़्यादा समय लगेगा। मुझे डर है कि कहीं पूरा न हो सके। अब्दुल्लाह कि जो मोतियों को एकदम भूल चुका था कहा, तुम ठीक कहते हो। लेकिन अभी शाम होने में काफ़ी समय है। दोपहर के खाने के बाद भी तो यह काम किया जा सकता है। मेरे लिए और बजाओ, तुम्हारे हाथों में जादू है और तुम्हे चंग बजाने में पूरी दक्षता प्राप्त है। इबाद ने आभार व्यक्त किया और फिर से शुरू कर दिया। वह बजाये जा रहा था और अब्दुल्लाह मस्त हो रहा था तथा गुनगुनाए जा रहा था।

    धीरे धीरे दिन ढल रहा था और शरद ऋतु के सूर्य की गुनगुनी धूप में नरमी आ रही थी। खिड़की से अब बाहर का दृश्य नहीं दिख रहा था। मोती इसी तरह मेज़ पर रखे हुए थे और अब्दुल्लाह अभी भी मस्ती में डूबा हुआ था। इबाद ने चंग को एक ओर रखा और उठ खड़ा हुआ, साहब रात होने वाली है। मुझे अब चलना चाहिए। मुझे मेरी मज़दूरी दे दो। मज़दूरी? कैसी मज़दूरी? तुमने काम ही क्या किया है। बग़ैर काम के तो कोई मज़दूरी नहीं होती। मोतियों को देखो। अच्छा होगा अभी चले जाओ और कल आ जाओ। उस समय मैं तुम्हारी मज़दूरी का भुगतान कर दूंगा। इबाद ने कि जो अब्दुल्लाह की बातों से नाराज़ हो गया था कहा, मैं आपकी सेवा में था। सुबह से अब तक आपने मुझ से चंग बजाने के लिए कहा और मैंने ऐसा किया। यदि मोतियों में सूराख़ नहीं हुए तो इसमें आपका दोष है, न कि मेरा। अब्दुल्लाह ने उदासीनता से उत्तर दिया, मैं तुझे मज़दूरी नहीं दूंगा। जब तक कि अपना काम नहीं करोगे पैसा-वैसा नहीं मिलेगा। अगर चाहते हो तो रुक जाओ और तुरंत अपना काम शुरू कर दो। दोनों में गर्मा-गर्म बहस होने लगी जिसका कोई परिणाम नहीं निकल सका। अंततः न्यायाधीश के पास चले गए। इबाद ने न्यायाधीश को चंग और मोतियों की पूरी कहानी सुना दी। न्यायाधीश ने दोनों की बात सुनने के बाद अब्दुल्लाह की ओर देखकर कहा यह युवा सही कह रहा है। वह तुम्हारी सेवा में था। तुमने उससे चंग बजाने के लिए कहा और उसने बजाया, यद्यपि दूसरे कार्य के लिए नियुक्त हुआ था लेकिन तुम्हे उसे 100 दिरहम देना होंगे। यदि मौज मस्ती में नहीं डूबे होते और अपना आपा नहीं खोते तो अभी तक मोतियों का काम पूरा हो चुका होता और तुम भी यहां नहीं होते। उसकी पूरी राषि का भुगतान करो। अब्दुल्लाह के पास कोई उपाय नहीं था तथा न्यायाधीश के आदेश को नहींठुकरा सकता था। इबाद की मज़दूरी का भुगतान करने हेतु बाध्य हो गया और वहां से चला गया। अब वह था और वैसे के वैसे ही मोती और जो पैसा उसकी जेब से चला गया था। उसे अपनी ग़लती का अहसास हुआ। जब वह धीमे धीमे घर की ओर गली में जा रहा था तो उसने स्वयं से कहा, मेरा यह काम ठीक जीवन की तरह है। जो कोई भी अपने मूल कार्य एवं उद्देश्य की उपेक्षा करेगा और व्यर्थ कामों में व्यस्त हो जायेगा, तो उसका जीवन यूं ही गुज़र जायेगी और जाते समय कोई भी मूल्यवान चीज़ वह अपने साथ नहीं ले जा पायेगा। अब रात हो गई थी, अब्दुल्लाह तेज़ तेज़ चलने लगा। उसे जल्दी घर पहुंचना था और मोतियों को आभूषणों के डब्बे में रखना था।