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    मोमिनून आयत 105

    मोमिनून आयत 105
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    क़ुरआन ईश्वरीय चमत्कार-604
    आइये पहले सूरए मोमिनून की आयत क्रमांक 105 और 106 की तिलावत सुनें।

    أَلَمْ تَكُنْ آَيَاتِي تُتْلَى عَلَيْكُمْ فَكُنْتُمْ بِهَا تُكَذِّبُونَ (105) قَالُوا رَبَّنَا غَلَبَتْ عَلَيْنَا شِقْوَتُنَا وَكُنَّا قَوْمًا ضَالِّينَ (106)
    (उनसे कहा जाएगा) क्या तुम्हें मेरी आयातें सुनाई नहीं जाती थीं? तो तुम उन्हें झुठलाते थे? (23:105) वे कहेंगे, हे हमारे पालनहार! हमारा दुर्भाग्य हम पर छा गया था और हम भटके हुए लोग थे। (23:106)

    इससे पहले क़ुरआने मजीद ने प्रलय में लोगों को मिलने वाले दंड व पारितोषिक की कसौटी, संसार में उनके अच्छे व बुरे कर्मों को बताया था और नरक वासियों को मिलने वाले कड़े दंड की ओर संकेत किया था। इन आयतों में ईश्वर नरक वालों को संबोधित करते हुए कहता है कि क्या मैंने अपने पैग़म्बरों के माध्यम से तुम्हारे लिए स्पष्ट आयतें और तर्क नहीं भेजे और तुम्हारे मार्गदर्शन के साधन उपलब्ध नहीं कराए? तो फिर तुमने सत्य स्वीकार करने के बजाए उसका विरोध करते हुए कुफ़्र क्यों अपनाया?

    ईश्वर के इस प्रश्न पर काफ़िरों का उत्तर यह होगा कि आंतरिक इच्छाएं हम पर इतनी अधिक छा गईं कि कोई भी सत्य बात हमारे दिल में नहीं उतरती थी और हम पथभ्रष्ट होते चले गए। स्पष्ट है कि यह उत्तर, संसार में उनके पापों का औचित्य दर्शाने के लिए है क्योंकि उनके ग़लत कर्मों के चलते ही उनके दिल सत्य की ओर से विमुख हो गए थे अन्यथा जन्म के समय से ही आंतरिक इच्छाएं उन पर हावी नहीं थीं।

    इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर की ओर से दंड और कोप, पैग़म्बरों और आसमानी किताबों द्वारा लोगों के समक्ष सभी तर्क प्रस्तुत कर दिए जाने के बाद आते हैं।
    प्रलय में अपराधी अपनी ग़लतियों को स्वीकार करेंगे किंतु उस समय अपने पापों की स्वीकारोक्ति का कोई लाभ नहीं होगा।
    आइये अब सूरए मोमिनून की आयत क्रमांक 107 और 108 की तिलावत सुनें।

    رَبَّنَا أَخْرِجْنَا مِنْهَا فَإِنْ عُدْنَا فَإِنَّا ظَالِمُونَ (107) قَالَ اخْسَئُوا فِيهَا وَلَا تُكَلِّمُونِ (108)
    हे हमारे पालनहार! हमें यहाँ से निकाल ले! तो यदि हम पुनः (कुफ़्र व पाप की ओर) लौट गए तो निश्चय ही हम अत्याचारी होंगे। (23:107) (ईश्वर उत्तर में) कहेगा, अपमान के साथ इसी (नरक) में पड़े रहो और मुझसे बात न करो। (23:108)

    काफ़िर और अपराधी अपने पापों की स्वीकारोक्ति के बाद ईश्वर से कहेंगे कि वह उन्हें नरक से बाहर निकाल ले और इससे भी बढ़ कर यह कि उन्हें संसार में लौटा दे ताकि वे अपने अतीत की क्षतिपूर्ति कर सकें। जबकि उनकी यह इच्छा पूरी हो ही नहीं सकती क्योंकि प्रलय से संसार में वापसी का कोई मार्ग ही नहीं है और मूल रूप से प्रलय कर्म का नहीं बल्कि बदले का स्थान है।

    यहीं पर ईश्वर उन्हें अपने पास से दूर भगा देगा और जिस प्रकार कुत्ते को दुत्कारा जाता है उसी प्रकार उनसे कहेगा कि दूर हो जाओ कि तुम मुझसे बात करने के योग्य ही नहीं हो, तुम्हारा ठिकाना नरक है और आग में जलना ही तुम्हारे लिए सबसे उपयुक्त दंड है।
    इन आयतों से हमने सीखा कि जब तक हम इस संसार में हैं और अवसर बाक़ी है, हमें इस प्रकार कर्म करना चाहिए कि प्रलय में हमें खेद, ग्लानि और पश्चाताप न हो।
    घमंड, कुफ़्र और ढिटाई जैसी बातें मनुष्य का मूल्य, पशुओं के स्तर तक नीचे ले आती हैं और प्रवृत्ति में यह परिवर्तन, प्रलय में साक्षात होगा।
    आइये अब सूरए मोमिनून की आयत क्रमांक 109, 110 और 111 की तिलावत सुनें।

    إِنَّهُ كَانَ فَرِيقٌ مِنْ عِبَادِي يَقُولُونَ رَبَّنَا آَمَنَّا فَاغْفِرْ لَنَا وَارْحَمْنَا وَأَنْتَ خَيْرُ الرَّاحِمِينَ (109) فَاتَّخَذْتُمُوهُمْ سِخْرِيًّا حَتَّى أَنْسَوْكُمْ ذِكْرِي وَكُنْتُمْ مِنْهُمْ تَضْحَكُونَ (110) إِنِّي جَزَيْتُهُمُ الْيَوْمَ بِمَا صَبَرُوا أَنَّهُمْ هُمُ الْفَائِزُونَ (111)
    (क्या तुम भूल गए कि) मेरेबन्दों का एक गुट कहता था कि हे हमारे पालनहार! हम ईमान ले आए हैं तो तू हमें क्षमा कर दे और हम पर दया कर और तू सबसे अच्छा दया करने वाला है। (23:109) तो तुमने उनका परिहास किया यहाँ तक कि उन्होंने तुम्हारे मन से मेरी याद भी भुला दी और तुम उन पर हँसते रहे। (23:110) निसंदेह आज मैंने उन्हें उनके धैर्य का यह बदला प्रदान किया कि वही सफल होने वाले हैं। (23:111)

    पिछली आयतों में अपराधियों को ईश्वर की दया से दूर भगाए जाने का उल्लेख करने के पश्चात ये आयतें इस दंड का कारण बयान करते हुए कहती हैं कि वे न केवल यह कि अपने बुरे कर्मों पर पछताते नहीं थे और उन्हें छोड़ते नहीं थे बल्कि ईमान वालों का, जो तौबा व प्रायश्चित करते थे, परिहास किया करते थे और उन्हें अपमानित करने के लिए उन पर हंसा करते थे।

    मानो वे स्वयं को बहुत चतुर व ईमान वालों को मूर्ख समझते थे कि जो ग़लती या पाप करते ही नरक के भय से ईश्वर की शरण चाहते थे और उससे तौबा व प्रायश्चित करते थे किंतु वे जिन लोगों का परिहास किया करते थे वही आज स्वर्ग में पूर्ण ऐश्वर्य एवं सुख में हैं तथा मज़ाक़ उड़ाने वाले नरक की आग में फंसे हुए हैं तथा उससे बचने का उनके पास कोई मार्ग नहीं है।

    इन आयतों से हमने सीखा कि ईमान के लिए पापों का प्रायश्चित और ईश्वर से क्षमा मांगना आवश्यक है क्योंकि ईमान वाला व्यक्ति सदैव स्वयं को ईश्वर के समक्ष दोषी समझता है।
    ईमान वालों का परिहास, मनुष्य के मन से ईश्वर की याद को मिटा देता है और उसे नरक की ओर बढ़ा देता है।
    प्रलय में कल्याण व सफलता, धैर्य व संयम की छाया में ही प्राप्त होगी।http://hindi.irib.ir/
    क़ुरआन ईश्वरीय चमत्कार-604
    आइये पहले सूरए मोमिनून की आयत क्रमांक 105 और 106 की तिलावत सुनें।

    أَلَمْ تَكُنْ آَيَاتِي تُتْلَى عَلَيْكُمْ فَكُنْتُمْ بِهَا تُكَذِّبُونَ (105) قَالُوا رَبَّنَا غَلَبَتْ عَلَيْنَا شِقْوَتُنَا وَكُنَّا قَوْمًا ضَالِّينَ (106)
    (उनसे कहा जाएगा) क्या तुम्हें मेरी आयातें सुनाई नहीं जाती थीं? तो तुम उन्हें झुठलाते थे? (23:105) वे कहेंगे, हे हमारे पालनहार! हमारा दुर्भाग्य हम पर छा गया था और हम भटके हुए लोग थे। (23:106)

    इससे पहले क़ुरआने मजीद ने प्रलय में लोगों को मिलने वाले दंड व पारितोषिक की कसौटी, संसार में उनके अच्छे व बुरे कर्मों को बताया था और नरक वासियों को मिलने वाले कड़े दंड की ओर संकेत किया था। इन आयतों में ईश्वर नरक वालों को संबोधित करते हुए कहता है कि क्या मैंने अपने पैग़म्बरों के माध्यम से तुम्हारे लिए स्पष्ट आयतें और तर्क नहीं भेजे और तुम्हारे मार्गदर्शन के साधन उपलब्ध नहीं कराए? तो फिर तुमने सत्य स्वीकार करने के बजाए उसका विरोध करते हुए कुफ़्र क्यों अपनाया?

    ईश्वर के इस प्रश्न पर काफ़िरों का उत्तर यह होगा कि आंतरिक इच्छाएं हम पर इतनी अधिक छा गईं कि कोई भी सत्य बात हमारे दिल में नहीं उतरती थी और हम पथभ्रष्ट होते चले गए। स्पष्ट है कि यह उत्तर, संसार में उनके पापों का औचित्य दर्शाने के लिए है क्योंकि उनके ग़लत कर्मों के चलते ही उनके दिल सत्य की ओर से विमुख हो गए थे अन्यथा जन्म के समय से ही आंतरिक इच्छाएं उन पर हावी नहीं थीं।

    इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर की ओर से दंड और कोप, पैग़म्बरों और आसमानी किताबों द्वारा लोगों के समक्ष सभी तर्क प्रस्तुत कर दिए जाने के बाद आते हैं।
    प्रलय में अपराधी अपनी ग़लतियों को स्वीकार करेंगे किंतु उस समय अपने पापों की स्वीकारोक्ति का कोई लाभ नहीं होगा।
    आइये अब सूरए मोमिनून की आयत क्रमांक 107 और 108 की तिलावत सुनें।

    رَبَّنَا أَخْرِجْنَا مِنْهَا فَإِنْ عُدْنَا فَإِنَّا ظَالِمُونَ (107) قَالَ اخْسَئُوا فِيهَا وَلَا تُكَلِّمُونِ (108)
    हे हमारे पालनहार! हमें यहाँ से निकाल ले! तो यदि हम पुनः (कुफ़्र व पाप की ओर) लौट गए तो निश्चय ही हम अत्याचारी होंगे। (23:107) (ईश्वर उत्तर में) कहेगा, अपमान के साथ इसी (नरक) में पड़े रहो और मुझसे बात न करो। (23:108)

    काफ़िर और अपराधी अपने पापों की स्वीकारोक्ति के बाद ईश्वर से कहेंगे कि वह उन्हें नरक से बाहर निकाल ले और इससे भी बढ़ कर यह कि उन्हें संसार में लौटा दे ताकि वे अपने अतीत की क्षतिपूर्ति कर सकें। जबकि उनकी यह इच्छा पूरी हो ही नहीं सकती क्योंकि प्रलय से संसार में वापसी का कोई मार्ग ही नहीं है और मूल रूप से प्रलय कर्म का नहीं बल्कि बदले का स्थान है।

    यहीं पर ईश्वर उन्हें अपने पास से दूर भगा देगा और जिस प्रकार कुत्ते को दुत्कारा जाता है उसी प्रकार उनसे कहेगा कि दूर हो जाओ कि तुम मुझसे बात करने के योग्य ही नहीं हो, तुम्हारा ठिकाना नरक है और आग में जलना ही तुम्हारे लिए सबसे उपयुक्त दंड है।
    इन आयतों से हमने सीखा कि जब तक हम इस संसार में हैं और अवसर बाक़ी है, हमें इस प्रकार कर्म करना चाहिए कि प्रलय में हमें खेद, ग्लानि और पश्चाताप न हो।
    घमंड, कुफ़्र और ढिटाई जैसी बातें मनुष्य का मूल्य, पशुओं के स्तर तक नीचे ले आती हैं और प्रवृत्ति में यह परिवर्तन, प्रलय में साक्षात होगा।
    आइये अब सूरए मोमिनून की आयत क्रमांक 109, 110 और 111 की तिलावत सुनें।

    إِنَّهُ كَانَ فَرِيقٌ مِنْ عِبَادِي يَقُولُونَ رَبَّنَا آَمَنَّا فَاغْفِرْ لَنَا وَارْحَمْنَا وَأَنْتَ خَيْرُ الرَّاحِمِينَ (109) فَاتَّخَذْتُمُوهُمْ سِخْرِيًّا حَتَّى أَنْسَوْكُمْ ذِكْرِي وَكُنْتُمْ مِنْهُمْ تَضْحَكُونَ (110) إِنِّي جَزَيْتُهُمُ الْيَوْمَ بِمَا صَبَرُوا أَنَّهُمْ هُمُ الْفَائِزُونَ (111)
    (क्या तुम भूल गए कि) मेरेबन्दों का एक गुट कहता था कि हे हमारे पालनहार! हम ईमान ले आए हैं तो तू हमें क्षमा कर दे और हम पर दया कर और तू सबसे अच्छा दया करने वाला है। (23:109) तो तुमने उनका परिहास किया यहाँ तक कि उन्होंने तुम्हारे मन से मेरी याद भी भुला दी और तुम उन पर हँसते रहे। (23:110) निसंदेह आज मैंने उन्हें उनके धैर्य का यह बदला प्रदान किया कि वही सफल होने वाले हैं। (23:111)

    पिछली आयतों में अपराधियों को ईश्वर की दया से दूर भगाए जाने का उल्लेख करने के पश्चात ये आयतें इस दंड का कारण बयान करते हुए कहती हैं कि वे न केवल यह कि अपने बुरे कर्मों पर पछताते नहीं थे और उन्हें छोड़ते नहीं थे बल्कि ईमान वालों का, जो तौबा व प्रायश्चित करते थे, परिहास किया करते थे और उन्हें अपमानित करने के लिए उन पर हंसा करते थे।

    मानो वे स्वयं को बहुत चतुर व ईमान वालों को मूर्ख समझते थे कि जो ग़लती या पाप करते ही नरक के भय से ईश्वर की शरण चाहते थे और उससे तौबा व प्रायश्चित करते थे किंतु वे जिन लोगों का परिहास किया करते थे वही आज स्वर्ग में पूर्ण ऐश्वर्य एवं सुख में हैं तथा मज़ाक़ उड़ाने वाले नरक की आग में फंसे हुए हैं तथा उससे बचने का उनके पास कोई मार्ग नहीं है।

    इन आयतों से हमने सीखा कि ईमान के लिए पापों का प्रायश्चित और ईश्वर से क्षमा मांगना आवश्यक है क्योंकि ईमान वाला व्यक्ति सदैव स्वयं को ईश्वर के समक्ष दोषी समझता है।
    ईमान वालों का परिहास, मनुष्य के मन से ईश्वर की याद को मिटा देता है और उसे नरक की ओर बढ़ा देता है।
    प्रलय में कल्याण व सफलता, धैर्य व संयम की छाया में ही प्राप्त होगी।http://hindi.irib.ir/
    क़ुरआन ईश्वरीय चमत्कार-604
    आइये पहले सूरए मोमिनून की आयत क्रमांक 105 और 106 की तिलावत सुनें।

    أَلَمْ تَكُنْ آَيَاتِي تُتْلَى عَلَيْكُمْ فَكُنْتُمْ بِهَا تُكَذِّبُونَ (105) قَالُوا رَبَّنَا غَلَبَتْ عَلَيْنَا شِقْوَتُنَا وَكُنَّا قَوْمًا ضَالِّينَ (106)
    (उनसे कहा जाएगा) क्या तुम्हें मेरी आयातें सुनाई नहीं जाती थीं? तो तुम उन्हें झुठलाते थे? (23:105) वे कहेंगे, हे हमारे पालनहार! हमारा दुर्भाग्य हम पर छा गया था और हम भटके हुए लोग थे। (23:106)

    इससे पहले क़ुरआने मजीद ने प्रलय में लोगों को मिलने वाले दंड व पारितोषिक की कसौटी, संसार में उनके अच्छे व बुरे कर्मों को बताया था और नरक वासियों को मिलने वाले कड़े दंड की ओर संकेत किया था। इन आयतों में ईश्वर नरक वालों को संबोधित करते हुए कहता है कि क्या मैंने अपने पैग़म्बरों के माध्यम से तुम्हारे लिए स्पष्ट आयतें और तर्क नहीं भेजे और तुम्हारे मार्गदर्शन के साधन उपलब्ध नहीं कराए? तो फिर तुमने सत्य स्वीकार करने के बजाए उसका विरोध करते हुए कुफ़्र क्यों अपनाया?

    ईश्वर के इस प्रश्न पर काफ़िरों का उत्तर यह होगा कि आंतरिक इच्छाएं हम पर इतनी अधिक छा गईं कि कोई भी सत्य बात हमारे दिल में नहीं उतरती थी और हम पथभ्रष्ट होते चले गए। स्पष्ट है कि यह उत्तर, संसार में उनके पापों का औचित्य दर्शाने के लिए है क्योंकि उनके ग़लत कर्मों के चलते ही उनके दिल सत्य की ओर से विमुख हो गए थे अन्यथा जन्म के समय से ही आंतरिक इच्छाएं उन पर हावी नहीं थीं।

    इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर की ओर से दंड और कोप, पैग़म्बरों और आसमानी किताबों द्वारा लोगों के समक्ष सभी तर्क प्रस्तुत कर दिए जाने के बाद आते हैं।
    प्रलय में अपराधी अपनी ग़लतियों को स्वीकार करेंगे किंतु उस समय अपने पापों की स्वीकारोक्ति का कोई लाभ नहीं होगा।
    आइये अब सूरए मोमिनून की आयत क्रमांक 107 और 108 की तिलावत सुनें।

    رَبَّنَا أَخْرِجْنَا مِنْهَا فَإِنْ عُدْنَا فَإِنَّا ظَالِمُونَ (107) قَالَ اخْسَئُوا فِيهَا وَلَا تُكَلِّمُونِ (108)
    हे हमारे पालनहार! हमें यहाँ से निकाल ले! तो यदि हम पुनः (कुफ़्र व पाप की ओर) लौट गए तो निश्चय ही हम अत्याचारी होंगे। (23:107) (ईश्वर उत्तर में) कहेगा, अपमान के साथ इसी (नरक) में पड़े रहो और मुझसे बात न करो। (23:108)

    काफ़िर और अपराधी अपने पापों की स्वीकारोक्ति के बाद ईश्वर से कहेंगे कि वह उन्हें नरक से बाहर निकाल ले और इससे भी बढ़ कर यह कि उन्हें संसार में लौटा दे ताकि वे अपने अतीत की क्षतिपूर्ति कर सकें। जबकि उनकी यह इच्छा पूरी हो ही नहीं सकती क्योंकि प्रलय से संसार में वापसी का कोई मार्ग ही नहीं है और मूल रूप से प्रलय कर्म का नहीं बल्कि बदले का स्थान है।

    यहीं पर ईश्वर उन्हें अपने पास से दूर भगा देगा और जिस प्रकार कुत्ते को दुत्कारा जाता है उसी प्रकार उनसे कहेगा कि दूर हो जाओ कि तुम मुझसे बात करने के योग्य ही नहीं हो, तुम्हारा ठिकाना नरक है और आग में जलना ही तुम्हारे लिए सबसे उपयुक्त दंड है।
    इन आयतों से हमने सीखा कि जब तक हम इस संसार में हैं और अवसर बाक़ी है, हमें इस प्रकार कर्म करना चाहिए कि प्रलय में हमें खेद, ग्लानि और पश्चाताप न हो।
    घमंड, कुफ़्र और ढिटाई जैसी बातें मनुष्य का मूल्य, पशुओं के स्तर तक नीचे ले आती हैं और प्रवृत्ति में यह परिवर्तन, प्रलय में साक्षात होगा।
    आइये अब सूरए मोमिनून की आयत क्रमांक 109, 110 और 111 की तिलावत सुनें।

    إِنَّهُ كَانَ فَرِيقٌ مِنْ عِبَادِي يَقُولُونَ رَبَّنَا آَمَنَّا فَاغْفِرْ لَنَا وَارْحَمْنَا وَأَنْتَ خَيْرُ الرَّاحِمِينَ (109) فَاتَّخَذْتُمُوهُمْ سِخْرِيًّا حَتَّى أَنْسَوْكُمْ ذِكْرِي وَكُنْتُمْ مِنْهُمْ تَضْحَكُونَ (110) إِنِّي جَزَيْتُهُمُ الْيَوْمَ بِمَا صَبَرُوا أَنَّهُمْ هُمُ الْفَائِزُونَ (111)
    (क्या तुम भूल गए कि) मेरेबन्दों का एक गुट कहता था कि हे हमारे पालनहार! हम ईमान ले आए हैं तो तू हमें क्षमा कर दे और हम पर दया कर और तू सबसे अच्छा दया करने वाला है। (23:109) तो तुमने उनका परिहास किया यहाँ तक कि उन्होंने तुम्हारे मन से मेरी याद भी भुला दी और तुम उन पर हँसते रहे। (23:110) निसंदेह आज मैंने उन्हें उनके धैर्य का यह बदला प्रदान किया कि वही सफल होने वाले हैं। (23:111)

    पिछली आयतों में अपराधियों को ईश्वर की दया से दूर भगाए जाने का उल्लेख करने के पश्चात ये आयतें इस दंड का कारण बयान करते हुए कहती हैं कि वे न केवल यह कि अपने बुरे कर्मों पर पछताते नहीं थे और उन्हें छोड़ते नहीं थे बल्कि ईमान वालों का, जो तौबा व प्रायश्चित करते थे, परिहास किया करते थे और उन्हें अपमानित करने के लिए उन पर हंसा करते थे।

    मानो वे स्वयं को बहुत चतुर व ईमान वालों को मूर्ख समझते थे कि जो ग़लती या पाप करते ही नरक के भय से ईश्वर की शरण चाहते थे और उससे तौबा व प्रायश्चित करते थे किंतु वे जिन लोगों का परिहास किया करते थे वही आज स्वर्ग में पूर्ण ऐश्वर्य एवं सुख में हैं तथा मज़ाक़ उड़ाने वाले नरक की आग में फंसे हुए हैं तथा उससे बचने का उनके पास कोई मार्ग नहीं है।

    इन आयतों से हमने सीखा कि ईमान के लिए पापों का प्रायश्चित और ईश्वर से क्षमा मांगना आवश्यक है क्योंकि ईमान वाला व्यक्ति सदैव स्वयं को ईश्वर के समक्ष दोषी समझता है।
    ईमान वालों का परिहास, मनुष्य के मन से ईश्वर की याद को मिटा देता है और उसे नरक की ओर बढ़ा देता है।
    प्रलय में कल्याण व सफलता, धैर्य व संयम की छाया में ही प्राप्त होगी।

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