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    यज़ीद की तौबा की सच्चाई

    यज़ीद की तौबा की सच्चाई
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    सवाल 12. क्या यज़ीद नें तौबा की और क्या वास्तव में ऐसे आदमी की तौबा क़ुबूल हो सकती है?
    इस सवाल सा जवाब इतिहासिक और एतेक़ादी (आस्था व विश्वास से सम्बंधित) दो हिस्सों से सम्बंधित है और सवाल का दूसरा हिस्सा निर्भर है कुछ सवालों के जवाब पर जैसे यह कि क्या ऐसे आदमी के लिये जो ऐसे बड़े अत्याचारों को अंजाम दे चुका हो चुका है, तौबा (पश्चात्ताप) करने का अवसर मिलने की सम्भावना है?

    उसकी तौबा वास्तविक थी या दिखावे की? वह आयतें व रिवायतें जो किसी न किसी तरह सभी की तौबा क़बूल किये जाने को साबित करती हैं, उनमें एक्सेप्शन की गुंजाइश है या नहीं? लेकिन यह सारे सवाल उस समय सामनें आएंगे जब इतिहासिक हिसाब से साबित हो जाये कि यज़ीद अपने अत्याचारों से शर्मिंदा हुआ और किसी तरह उनकी क्षतिपूर्ति के द्वारा अल्लाह की बारगाह से माफ़ी मांगी, जैसा कि अगर इस इतिहासिक सवाल का जवाब नकारात्मक रहा तो फिर सवाल के दूसरे हिस्से की बारी ही नहीं आएगी।
    पूरे इस्लामी इतिहास में हालांकि इतिहासकारों, हदीस के एक्सपर्ट और दूसरे इस्लामी बुद्धीजीवियों के इजमाअ (सहमति) के क़रीब की बहुसंख़्या ने यज़ीद को एक ज़ालिम इंसान की हैसियत से जाना और उसे उसके अत्याचारों ख़ास कर आशूरा की घटना को वुजूद में लाने के कारण ग़ल्ती पर जाना है, लेकिन नहीं के बीच ग़ज़ाली जैसे लोग भी मौजूद हैं जो अहयाउल उलूम में यज़ीद पर लानत करने से इस वजह से मना करने की बात करते हैं क्योंकि उसने तौबा कर ली थी।
    ग़ज़ाली की यह बात (उनकी महान कैरेक्टर के बावुजूद) इस्लामी दुनिया में लोकप्रियता नहीं पा सकी और उसी ज़माने में इब्ने जौज़ी (देहांत 597 हिजरी) जैसे उनके समय के बुज़ुर्गों नें इस ख़्याल का सख़्ती से मुक़ाबला किया यहाँ तक कि

    ” الرد علی المتعصب العنید”

    के नाम से एक पूरी किताब लिख डाली।
    लेकिन इतिहास में कभी कभी इसी बात की तकरार कुछ ओरियंटालिस्ट जैसे मक़ालातो दाएरतिल मआरिफ़िल इस्लाम (इस्लामी इंसाईक्लोपीडिया) में लांस यहूदी आदि की तरफ़ से देखनें में आते हैं और आज कल भी कुछ इस्लामी हल्क़ों में यही बात और इसी तरह के संदेह दूसरे ढ़ंग से बयान किये जाते हैं जो सब मिलकर इस संदेह से सम्बंधित इतिहासिक बहस की अहमियत को उजागर करते हैं, महत्वपूर्ण बातें जो इतिहासिक नज़र से यज़ीद की तौबा के लिये बयान की जाती हैं वह निम्नलिखित हैं:
    1- इब्ने क़तीबा नें अपनी किताब अल-इमामाः वस्सियासः ”الامامة و السیاسة ”

    में लिखा है कि यज़ीद के दरबार में कुछ घटनाएं घटित होने के बाद ऐसा हुआ कि

    ”فبکی یزید حتی کادت نفسہ تغیض ”

    यज़ीद इतना रोया कि क़रीब था कि उसकी आत्मा उसके जिस्म से निकल जाती।

    2- यज़ीद के महल में शहीदों के सरों व कर्बला के बंदियों के दाख़िल होने के बाद उस पर एक अजीब हालत तारी हुई और न भयानक अत्याचारों को इब्ने ज़ियाद पर लादते हुए उसने कहा:

    ” لعن اللہ بن مرجانة لقد بغضنی الی المسلمین و شارع لی فی قلوبھم البغضاء ”

    अल्लाह मरजाना के बेटे (अब्दुल्लाह इब्ने ज़ियाद) पर लानत करे कि उसनें मुझे मुसलमानों के नज़दीक घृणित बना दिया और उनके दिलों में मेरी दुश्मनी के बीज बो दिये।
    यज़ीद के हवाले से मशहूर दूसरी बात में वह ख़ुद को इमाम की मुख़ालेफ़तों के मुक़ाबले में एक ऐसा संयमी आदमी बताता है जो पैग़म्बरे अकरम स.अ. से सम्बंध रखने की वजह से इमाम अ. के क़त्ल से राज़ी नहीं था और उस काम को सीधे इब्ने ज़ियाद से जोड़ता है।
    3- कर्बला वालों को मदीने की तरफ़ रवाना करते समय यज़ीद, इमाम सज्जाद अ. को सम्बोधित करते हुए कहता है:
    ”لعن اللہ بن مرجانة اما و اللہ لو ان صاحبہ ما سالنی خصلة ابدا الا اعطیتہ ایاما ولد فعت الحتف عنہ بکل ما استطعت و لوبھلاک بعض ولدی”
    यानी ख़ुदा, इब्ने मरजाना पर लानत करे ख़ुदा की क़सम! अगर मैं हुसैन अ. के मुक़ाबले में होता तो उनकी हर इच्छा को पूरा करता और हर सम्भव तरीक़े से मौत को उनसे दूर करता चाहे मुझे इसके लिये अपने किसी बेटे की जान गंवानी पड़ती।
    अगर हम इन सारी बातों को मान लें और उनके स्रोतों में बहेस व रिसर्च करने को सही न जानें फिर भी कुछ बातें उनसे हाथ आ सकती हैं:
    अ. कर्बला की घटना का असली अपराधी इब्ने ज़ियाद था और यज़ीद नें इमाम हुसैन अ. को क़त्ल करने यहाँ तक कि उनके साथ सख़्ती से पेश आने के लिये कोई हुक्म नहीं दिया था।
    ब. यज़ीद, इब्ने ज़ियाद के इस काम से नाराज़ होकर उस पर लानत करता है।
    स. यज़ीद, इमाम के क़त्ल पर सख़्त अफ़सोस प्रकट करता है।
    पहली बात के सम्बंध में सौभाग्य से मौजूदा इतिहासिक स्रोत यज़ीद के दावों को बख़ूबी झूठा साबित करते हैं क्योंकि इतिहासिक बयानो, रिवायतों में यह मिलता है कि यज़ीद नें हुकूमत पर विराजमान होते ही अपने बाप की वसीयतों के विपरीत, अपने पहले ख़त में मदीना के गवर्नर वलीद इब्ने अतबा को लिखा:
    ”…اذا اتاک کتابی ھذا فاضر الحسین بن علی و عبد اللہ بن الزبیر فخذہ ما بالبیعة لی فان امتنعا فاضرب اعناقھما و ابعث لی بروسھما”
    यानी जब मेरा लेटर तुम्हे मिले तो हुसैन इब्ने अली (अ.) और अब्दुल्लाह इब्ने ज़ुबैर को बुलाओ और दोनों से मेरे लिये बैयत लो और अगर बैयत न करें तो दोनों की गरदन काट कर उनके सर मेरे पास भेज दो।
    इसी तरह कुछ ने बयान किया है कि यज़ीद नें इमाम के मक्के में कुछ लोगों को गुप्त रूप से हज के लिये भेज रखा था ताकि हज के दौरान काबे के क़रीब वह इमाम को क़त्ल कर डालें।
    जैसा कि इब्ने अब्बास नें भी यज़ीद के नाम लिखे गए अपने ख़त में इस बात की तरफ़ इशारा किया है। इसी तरह इतिहास की किताबों में आया है कि जिस समय इमाम अ. इराक़ की तरफ़ रवाना हुए तो यज़ीद नें इब्ने ज़ियाद को ख़त लिखा और उसे हुक्म दिया कि इमाम के प्रति पूरी सख़्ती से पेश आये। बाद के दिनों में इब्ने ज़ियाद नें भी स्वीकार किया कि मुझे इमाम हुसैन अ. के क़त्ल से सम्बंधित यज़ीद का आदेश मिला था।
    अब्दुल्लाह बिन अब्बास भी यज़ीद के नाम एक ख़त में साफ़ साफ़ उसे इमाम हुसैन अ. और बनी अब्दुल मुत्तलिब के जवानों का क़ातिल बताया हैः

    ”انت قتلت الحسین بن علی ولا تحسبن لا ابا لک نسیت قتلک حسینا و فتیان بنی عبد المطلب)

    यानी तूने ही हुसैन इब्ने अली अ. को क़त्ल किया है और तुम कदापि यह न सोचो कि तुम्हारा बुरा हो कि मैं हुसैन अ. व बनी अब्दुल मुत्तलिब के जवानों के क़त्ल को भूल गया हूँ।
    यह बात उस समय इतनी स्पष्ट थी कि बाद में उसके बेटे मुआविया इब्ने यज़ीद नें भी दमिश्क की जामा मस्जिद के मिम्बर से अपने बाप की इस तरह निंदा की कि,

    ”…و قد قتل عترة الرسول و…”۔()

    सारांश यह कि यज़ीद के आदेश से इमाम हुसैन अ. का क़त्ल अंजाम पाने के सिलसिले में इतिहासिक प्रमाण इतने अधिक हैं कि इन्साफ़ के साथ समीक्षा करने वाले के लिये इन्कार की कोई गुंजाइश नहीं रह जाती है।

    दूसरी बात यानी (इब्ने ज़ियाद के अत्याचारों से यज़ीद का नाराज़ होना) इसके बारे में यह कहना ज़रूरी है कि इतिहासिक सुबूत व प्रमाण तो बताते हैं कि इमाम हुसैन अ. की शहादत की ख़बर सुनकर शुरू में यज़ीद ख़ुश हुआ और इब्ने ज़ियाद की हिम्मत बढ़ाई। सिब्ते इब्ने जौज़ी नें यज़ीद की तरफ़ से इब्ने ज़ियाद के बहुत ज़्यादा प्रोत्साहन (हौसला अफ़ज़ाई) के बारे में लिखा है कि यज़ीद नें इसके लिये क़ीमती गिफ़्ट भेजे, उसके साथ रातों में शराब की महफ़िलें सजाईं और उसके साथ अपनें घर के एक मिम्बप जैसा व्यवहार किया।
    इब्ने जौज़ी नें यज़ीद की कुछ पंक्तियां बयान की हैं जो साफ़ तौर पर बयान करती हैं कि इमाम अ. के क़त्ल के हवाले से वह इब्ने ज़ियाद से राज़ी और उसका आभारी था।
    इसी तरह इतिहास हमें बताता है कि यज़ीद नें इराक़ से इब्ने ज़ियाद को बर्ख़ास्त करने से सम्बंधित कोई क़दम नहीं उठाया बल्कि इब्ने ज़ुबैर के आंदोलन के सामने आने के बाद उसने इब्ने ज़ियाद को उसके विरूद्ध जंग करने का हुक्म दिया इसी आधार पर इब्ने ज़ियाद से उसकी नाराज़गी को एक ज़ाहिरी अमल समझना चाहिये जो हज़रत ज़ैनब स. अ. और इमाम सज्जाद अ. के ख़ुत्बों के नतीजे में हालात बदल जाने की वजह से अंजाम पाया कि उन अत्याचारों से जो नफ़रत व घृणा लोगों की उसे नसीब हुई किसी तरह उसे दूर कर सके।
    रही तीसरी बात (यानी इमाम के क़त्ल पर यज़ीद का अफ़सोस करना) तो यह भी इतिहासिक प्रमाणों के ख़िलाफ़ है क्योंकि इतिहास तो यह कहता है कि दमिश्क और यज़ीद के दरबार में जिस समय कर्बला के बंदी और शहीदों के सर लाए गये तो उसने ख़ुशी ज़ाहिर की और छड़ी से इमाम के मुबारक दातों का अपमान किया इसी तरह उसनें कुछ पंक्तिया पढ़ीं जो बनी उमय्या के बनी हाशिम से जंगे बद्र के इन्तेक़ाम लेने की भावना को दर्शाती हैं क्योंकि उस जंग में उसके नाना अतबा, उसके मामू वलीद और दूसरे क़ुरैश के जाने माने लोग, पैग़म्बर स. के दोस्त के हाथों क़त्ल हुए थे।
    उन्हीं पंक्तियों में उसनें बेसिक तौर पर पैग़म्बर स. की नुबूव्वत को झुठलाते हुए उसे हुकूमत तक पहुँचने का बहाना बताया है:

    لعبت ہاشم بالملک فلا خبر جاء و لا وحی نزل(٣)

    बनी हाशिम नें हुकूमत का खेल खेला और आसमान से न कोई ख़बर आई और न कोई वही नाज़िल हुई।
    हाँ! जैसा कि इशारा किया गया उसने उस समय अफ़सोस प्रकट किया जब हालात को ख़राब पाया और देखा कि ज़्यादा ख़ुशी का इज़हार लोगों के ग़ुस्से को भड़का सकता है।
    इस बहस के अंत में दो बातों का बयान करना ज़रूरी है:
    1- जैसा कि यज़ीद की बातों से ज़ाहिर होता है उसका अफ़सोस करना, केवल एक सियासी अफ़सोस प्रकट करना था और उसमे कोई ऐसी बात दिखाई नहीं देती जो अल्लाह की बारगाह में यज़ीद के तौबा व माफ़ी मांगने को बयान करता हो इसलिए इस काम की भी अपने सियासी हल्क़े में समीक्षा किये जाने की ज़रूरत है और तौबा के मसले से जोड़ने की ज़रूरत नहीं है ताकि तौबा की सूरत में उस पर लअनत भेजने के जाएज़ होने की बहेस सामने आए।
    2- अगर हम मान लें कि यज़ीद नें वास्तव में तौबा की है तो बाद में उसके कामों में तौबा के लक्षण भी दिखाई देने चाहियें, जबकि इतिहास उसके उल्टा बताता है, इस लिये कि यज़ीद नें आशूरा की घटना के बाद अपनी ज़िल्लत व अपमान से भरी हुकूमत के दो साल बाक़ी रहते दो बड़े ज़ुल्म किये।
    एक तो मदीने वालों का क़त्ले आम व नरसंहार करना, तीन दिन के लिये अपने सिपाहियों के लिए मदीने की ज़मीन पर कुछ भी करने की खुली छूट देना और इस शहर में रहने वाले बहुत से पैग़म्बरे अकरम स. के सहाबियों के क़त्ल जो इतिहास में हर्रा की घटना के नाम से मशहूर है।
    दूसरे मक्के पर हमले का हुक्म देना कि उसके सिपाहियों नें इस शहर पर मिन्जनीक़ (तोप) से हमला किया और ख़ानए काबा का अपमान किया और उसे मिन्जनीक़ से फेंके गए आग के शोलों से जला डाला।
    इस आधार पर इतिहासिक नज़र से यह बात तय है कि न केवल यह कोई ऐसे लक्षण नहीं मिलते जो यज़ीद की तौबा पर दलालत करें बल्कि आसार, लक्षण व निशानियां, बयान करती हैं कि उसने तौबा नहीं की इसलिए उस पर लानत भेजने का परमिट तमाम मुसलमानों के नज़दीक अपनी जगह पर क़ाएम है।