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    रचयिता ही पालनहार : 1

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    यह सिद्ध होने के बाद कि आत्मभू अस्तित्व, सभी अन्य अस्तित्वों का मूल कारक है और इस बात के दृष्टिगत के पूरी सृष्टि को उसकी आवश्यकता है

    स्वयंभू अस्तित्व अर्थात ईश्वर का रचयिता और उसके अतिरिक्त हर वस्तु का उसकी रचना होना सिद्ध होता है।

    रचना के भी दो अर्थ हैं मनुष्य द्वारा अस्तित्व में आने वाली रचनाओं के लिए आवश्यक है कि पहले से भी कुछ पदार्थ और वस्तुएं मौजूद हों और यदि कोई ऐसी वस्तु बनाई गयी है

    जिसका कोई रूप उसकी उत्पत्ति से पूर्व मौजूद नहीं था तो उसे अविष्कार कहा जा सकता है किंतु यह सब मनुष्य द्वारा की गयी रचनाओं के लिए है।

    ईश्वर द्वारा किसी वस्तु को बनाना, साधारण मनुष्य द्वारा किसी वस्तु को बनाने की भांति नहीं है।

    क्योंकि मनुष्य को किसी वस्तु की रचना के लिए सक्रियता व हाथ पैर हिलाने की आवश्यकता होती है और शरीर के अंगों को प्रयोग करने के बाद जो प्रक्रिया होती है

    उसी को काम कहा जाता है और उस काम के बाद सामने आने वाली दशा को काम का परिणाम कहा जाता है।

    किंतु ईश्वर के लिए किसी काम को करने के लिए यह सारी भूमिकाएं आवश्यक नहीं होतीं क्योंकि ईश्वर गतिशीलता और अन्य भौतिक विशेषताओं से परे है

    इसी लिए उसका रचयिता होना उस अर्थ में नही है जो हम किसी रचनाकार मनुष्य के बारे में सोचते हैं। बल्कि वह ऐसा रचनाकार है

    जिसे रचना के लिए पहले से किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं है। वह शून्य से सब कुछ बना सकता है जैसा कि उसने इस समूचे ब्रह्मांड की रचना की जबकि इससे पूर्व कुछ भी नहीं था।

    ईश्वर का एक अन्य गुण पालनहार होना है। इस संदर्भ में यह स्पष्ट है कि रचनाओं को केवल अपने अस्तित्व के लिए ही

    ईश्वर की आवश्यकता नहीं है बल्कि रचनाओं के हर कण को ईश्वर की आवश्यकता हर क्षण रहती है।

    रचनाओं को अपना अस्तित्व बचाए रखने और जारी रखने के लिए पालनहार ईश्वर की आवश्यकता होती है।

    अर्थात ऐसा नहीं है कि ईश्वर ने अपनी रचनाओं को एक बार अस्तित्व देकर छोड़ दिया है, ऐसा नहीं है बल्कि सृष्टि की समस्त रचनाओं में किसी भी प्रकार की स्वाधीनता नहीं पाई जाती बल्कि

    पालनहार ईश्वर उनकी रचना के बाद उन्हें जिस दशा में चाहता है रखता है जिस प्रकार चाहता है उनमें परिवर्तित करता है और उन्हें प्रयोग करता है।