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    रमज़ानुल मुबारक – 2013 – (1)

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    ईश्वर के आभारी हैं कि उसने एक बार फिर हमें अपनी आत्मा को पवित्र रमज़ान के मनमोहक वातावरण में पाक करने का अवसर दिया। रमज़ान के सदैव की भांति एक बार फिर बड़े वैभव के साथ दस्तक दी है ताकि ईश्वर की कृपा का पात्र बन सकें। रमज़ान हमारे दिन और रात को ईश्वर की अराधना से सुशोभित करने आया है। क्या हमें इस अनुपम अवसर की आवश्यकता नहीं है कि हम ईश्वर से प्रार्थना करें। इस पवित्र महीने का स्वागत कीजिए जो पापी मन के लिए मरहम के समान है। प्रायश्चित द्वारा ईश्वर की अथाह कृपा पाने का श्रेष्ठ अवसर आ पहुंचा है। हे प्रभु! तेरा आभार प्रकट करते हैं कि तूने एक बार फिर हमें रमज़ान का अवसर दिया। हे ईश्वर की कृप के महीने तुझ पर सलाम हो। सलाम हो तुझ पर हे ईश्वर के महीने कि तेरी सदैव प्रतीक्षा रहती है। पवित्र  रमज़ान के आगमन की आप सबको बधाई हो। इस बार भी हम आत्मोत्थान शीर्षक के अंतर्गत रमज़ान के विशेष कार्यक्रम पेश करेंगे। आत्मोत्थान की आज की कड़ी में इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम की मकारेमुल एख़लाक़ नामक प्रसिद्ध दुआ, इस्लामी इतिहास से एक कहानी और हज़रत अली अलैहिस्सलाम की अपने बेटे इमाम हसन अलैहिस्सलाम को वसीयत पर चर्चा करेंगे।

    मकारिमुल एख़लाक़ नामक दुआ इमाम ज़ैनुल आबेदीन की प्रसिद्ध प्रार्थनाओं का संकलन है। यह प्रार्थना शुद्ध नैतिक व धार्मिक विषय-वस्तु से भरी पड़ी है। चूंकि कर्बला की हृदयविदारक त्रासदी के बाद इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम को सीमित्ताओं एवं समाज में फैले ग़लत विचारों का समाना था, इसलिए उन्होंने इस्लामी सिद्धांतों को बयान करने का बेहतरीन मार्ग प्रार्थना को चुना। हालांकि इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम की दुआएं वंदना से भरी हुयी हैं और उसकी सभी विषय-वस्तु अपने ईश्वर से मनुष्य की प्रार्थना है किन्तु इन दुआओं पर चिन्तन करने से स्पष्ट हो जाता है कि इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम की दुआ, व्यक्तिगत प्रार्थना नहीं है कि जब मनुष्य जीवन की समस्याओं से घिरने की स्थिति में एकान्त में ईश्वर को याद करता है। बल्कि इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम की दुआओं में जो अर्थ निहित हैं उनके द्वारा इस्लाम के राजनैतिक एवं सामाजिक सिद्धांतों को भी समझा जा सकता है।

    मकारिमुल एख़लाक़ के तीस भाग हैं और हर भाग पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पवित्र परिजनों पर ईश्वर से कृपा करने की प्रार्थना से आरंभ होता है और उसमें ईश्वर से जिन चीज़ों के लिए दुआ की गयी है वे सब नैतिक अच्छाइयों की ओर ले जाने वाली हैं। ईश्वर से पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पवित्र परिजनों पर कृपा करने की प्रार्थना को संक्षेप में दुरूद कहते हैं।  इस प्रकार हम देखते हैं कि इमाम ज़ैनुल आबेदील अलैहिस्सलाम ने पहला वाक्य पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पवित्र परिजनो पर दुरुद से आरंभ करते हैं। हम भी अपना कार्यक्रम उन पर दुरूद से आरंभ करते हैं। पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पवित्र परिजनों पर दुरूद के लिए हम कहते हैः अल्लाहुम्मा सल्ले अला मुहम्मदिवं व आले मुहम्मद।

    हर दुआ से पहले पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पवित्र परिजनों पर दुरूद इसलिए भेजते हैं ताकि ईश्वर हमारी दुआ पूरी कर दे। दुआ के संदर्भ में इस बिन्दु का उल्लेख भी आवश्यक है कि कभी विभिन्न कारणों से ईश्वर हमारी दुआ को स्वीकार नहीं करता क्योंकि हमारी दुआ ईश्वर के निश्चित फ़ैसले एवं सृष्टि की सर्वेश्रेष्ठ व्यवस्था के विरुद्ध होती है। उदाहरण स्वरूप यदि कोई यह दुआ करे कि ईश्वर! मुझे सदैव जीवित रख और मैं कभी न मरूं। यह दुआ स्वीकार नहीं की जाएगी क्योंकि हर व्यक्ति को मृत्यु आनी है। या कोई व्यक्ति यह दुआ करे कि ईश्वर मुझे सदैव जवान रख और कभी वृद्ध न हूं। यह दुआ भी स्वीकार नहीं की जाएगी क्योंकि ईश्वर का यह फ़ैसला है कि मनुष्य बच्चे से किशोर, किशोरावस्था से युवावस्था, फिर प्रौढ़ और फिर वृद्ध हो यहां तक कि ऐसी अवस्था में पहुंच जाता है कि सभी शक्ति समाप्त हो जाती है और जो कुछ उसे ज्ञान होता है उसे भी भूल जाता है।

    कभी कभी लोग अज्ञानता के कारण ऐसी दुआएं करते हैं जो सृष्टि के क़ानून की दृष्टि से पूरी नहीं हो सकती और ऐसे लोगों को पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों ने सचेत किया है कि उनकी इस प्रकार की चेतावनी पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पवित्र परिजनों के कथनों पर आधारित किताबों में मिलता है। इसलिए सृष्टि की नियमों के विरुद्ध ऐसी दुआएं स्वीकार नहीं की जातीं। सब दुआओं में एक दुआ ऐसी है जो सदैव स्वीकार की जाती है और वह पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पवित्र परिजनों पर दुरूद भेजेन की दुआ है और दुरूद यूं भेजते हैः अल्ला हुम्मा सल्ले अला मोहम्मदिंव व आले मोहम्मद। इसीलिए यह कहा गया है कि यदि तुम अपनी दुआओं की स्वीकारोक्ति चाहते हो तो पहले पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पवित्र परिजनों पर दुरूद भेजो और फिर अपनी दुआ मांगो। इस संदर्भ में इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम कहते हैः जब भी तुममे से कोई ईश्वर से दुआ मांगे तो वह पहले पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पवित्र परिजन पर दुरूद अवश्य भेजे क्योंकि पैग़म्बरे इस्लामी और उनके पवित्र परिजन पर दुरूद को ईश्वर स्वीकार करता हे और ईश्वर ऐसा नहीं करेगा कि किसी दुआ के कि जो कई भागों पर आधारित हो, दुरूद स्वीकार कर ले और बाक़ी भाग को रद्द कर दे।

    एक दिन पैग़म्बरे इस्लाम ने अपने साथियों से पूछाः तुममे से कौन है जो हर दिन रोज़ा रखता है? पैग़म्बरे इस्लाम के एक निकटवर्ती  साथी हज़रत सलमान ने कहाः हे ईश्वरीय दूत हम रखते हैं। पैग़म्बरे इस्लाम ने पूछाः तुममे से कौन रात भर जागकर उपासना करता है? इस बार भी हज़रत सलमान ने कहाः हे ईश्वरीय दूत हम। पैग़म्बरे इस्लाम ने फिर पूछाः तुममे से कौन है जो 24 घंटों में पूरा क़ुरआन पढ़ता है?

    इस बार भी हज़रत सलमान ने सकारात्म उत्तर दिया। इसी बीच पैग़म्बरे इस्लाम के एक अनुयायी हज़रत सलमान के दावे पर क्रोधित हो गए और उन्होंने कहाः हे ईश्वरीय दूत! सलमान का संबंध पार्स से है और वह हम क़ुरैश क़बीले पर अपनी वरीयता साबित करना चाहते हैं। मैंने अकसर दिनों में उन्हें खाना खाते और रातों को सोते हुए देखा है तो किस प्रकार वह हर दिन पूरा क़ुरआन पढ़ते हैं जबकि अधिकांश दिनों में मैं उन्हें मौन धारण की अवस्था में देखता हूं। पैग़म्बरे इस्लाम ने कहाः हे व्यक्ति थोड़ा धैर्य रखो! तुम ख़ुद ही यह बात उनसे पूछो कि वह तुम्हारे लिए व्याख्या करें। उस व्यक्ति ने हज़रत सलमान से उत्तर पूछा। हज़रत सलमान ने कहाः जैसा तुम समझ रहे हो वैसा नहीं है। मैं हर महीने के पहल, मध्य और आख़री दिन रोज़ा रखता हूं और ईश्वर भी कहता है कि जो कोई एक भलाई करे उसे दस गुना बदला दिया जाएगा। मैं हर महीने इस प्रकार रोज़ा रखता हूं और सदैव रोज़ा रखने वाले का पुन्य प्राप्त करता हूं।

    हमने ईश्वरीय दूत को यह कहते हुए सुना हैः जो कोई पाक अर्थात वज़ू, तयम्मुम या ग़ुस्ल करके सोए तो वह उस व्यक्ति की भांति है जो पूरी रात जाग कर उपासना में बिताए और मैं हर रात पाक होकर सोता हूं।

    इसी प्रकार हमने पैग़म्बरे इस्लाम को हज़रत अली अलैहिस्सलाम से यह कहते हुए सुना कि जो कोई पवित्र क़ुरआन के तौहीद सूरे को एक बार पढ़े तो उसने एक तिहाई क़ुरआन पढ़ा और जो कोई दो बार पढ़े तो उसने दो तिहाई क़ुरआन को पढ़ा और जो कोई तीन बार पढ़े तो उसने पूरा क़ुरआन पढ़ा। फिर हज़रत सलमान ने कहाः मैं हर दिन तौहीद सूरे को तीन बार पढ़ता हूं। इस प्रकार हर दिन पूरा क़ुरआन पढ़ता हूं।

    हज़रत अली अलैहिस्सलाम  की अपने बड़े बेटे हज़रत इमाम हसन अलैहिस्सलाम को वसीयत उनकी प्रसिद्ध वसीयतों में है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने यह वसीयत सिफ़्फ़ीन नामक युद्ध से लौटते समय इमाम हसन के लिए लिखी थी कि उनकी इस वसीयत को शीया और सुन्नी समुदाय दोनों ही महत्व देते हैं। हज़रत अली अलैहिस्सलाम की यह वसीयत केवल उनके बेटे के लिए नहीं है बल्कि उन्होंने यह वसीयत सत्य के सभी खोजियों से की है। नहजुल बलाग़ा में पत्र वाले खंड में इक्तीसवां पत्र इसी वसीयत पर आधारित है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम अपनी वसीयत में सबसे पहले ईश्वर से डरने की अनुशंसा करते हुए कहते हैः मैं तुमसे ईश्वर को महत्व देने और उसके आदेशों  प्रति कटिबद्ध रहने की वसीयत करता हूं। अपने मन में उसकी याद को बसाना और उसकी रस्सी को थामे रहना।

    हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने सबसे अधिक ईश्वर से डरने पर बल दिया है। मनुष्य को विशेष रूप से युवावस्था में ईश्वर से भय का महत्व उस समय पता चलेगा जब वह इस काल भावनाओं और इच्छाओं को दृष्टिगत रखे। इस काल में ईश्वर से भय उस मज़बूत क़िले की भांति होता है जो उसे बर्बाद होने से बचाता है और शैतान के विषैले तीरों से सुरक्षित रखता है। जैसा कि आप जानते हैं कि मनुष्य सदैव दोराहे पर होता है और वह दो ऐसे बिन्दुओं की ओर खिंचता है जो एक दूसरे के विरुद्ध होते हैं। एक ओर अंतरात्मा उसे भलाई की ओर बुलाती है तो दूसरी ओर भावनाएं और शैतानी उकसावे उसे तुच्छ इच्छाओं को तृप्त करने के लिए प्रेरित करते हैं। बुद्धि और इच्छा तथा भ्रष्टाचार और पवित्रता के बीच इस द्वंद्व से केवल वही लोग बचकर निकल सकते हैं जो ईश्वर से डरते हैं और युवावस्था से इच्छाओं से संघर्ष और आत्मनिर्माण करते हैं।

    हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम ईश्वर से भय की छत्रछाया में दृढ़ संकल्प द्वार कड़े इम्तेहान में सफल होकर सम्मान की पराकाष्ठा पर पहुंचे। ईश्वर से भय और उसके आदेशों का पालन लोक-परलोक के सभी सौभाग्य की प्राप्ति की दो कुन्जियां हैं जिसके बारे में हज़रत अली ने अपने बेटे को वसीयत की है। ईश्वर करे हम पवित्र रमज़ान के महीने में अपनी आत्मा को ईश्वर से भय से सुशोभित करे।