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    रमज़ानुल मुबारक – 2013 – (10)

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    पवित्र रमज़ान के मूल्यवान समय में आशा करते हैं कि रोज़े की सही पहचान प्राप्त कर अपने शरीर व आत्मा को उन चीज़ों से दूर रखेंगे जिसे ईश्वर ने हराम अर्थात वर्जित घोषित किया है और इस प्रकार अपने अंतर्मन को स्वच्छ बनाएंगे। इस बात में शक नहीं कि वर्जित चीज़ों से सही ढंग से दूर रहने से मनुष्य की आत्मा से बुराइयां दूर हो जाती हैं और उसमें बड़ा परिवर्तन आता है। आज पंद्रह रमज़ान है। आज के दिन की शोभा पैग़म्बरे इस्लाम के नाति इमाम हसन अलैहिस्सलाम के जन्म दिवस से बढ़ गयी है। आप सबको इमाम हसन अलैहिस्सलाम के शुभ जन्म दिवस की हार्दिक बधाई के साथ कार्यक्रम का आरंभ इमाम हसन अलैहिस्सलाम के एक कथन से कर रहे हैः जिसके मन में ईश्वर की प्रसन्नता के सिवा कुछ और न हो, वह जब ईश्वर को पुकारेगा तो मैं उसकी दुआ की स्वीकारोक्ति की गैरंटी लेता हूं।

    कार्यक्रम के इस भाग में इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम की मकारेमुल एख़लाक़ नामक दुआ का एक टुकड़ा पेश कर रहे हैं। इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम ईश्वर से प्रार्थना करते हुए कहते हैः हे प्रभु! जिसने मेरी बुराई की है और मुझे बुरे शब्दों से याद किया है मुझे उसके रवैये के विपरीत व्यवहार करने में सफलता प्रदान कर और उसे मैं भले शब्द से याद करूं।

    इस्लाम के आदेशों में से एक मुसलमानों को आपस में मित्रता व भाईचारे के साथ रहने का आदेश भी है। इसलिए इस्लाम ने आपस में मनमुटाव व जुदाई का कारण बनने वाले सभी तत्वों व कारकों को वर्जित घोषित करते हुए अपने अनुयाइयों को इससे रोका है। दूसरों की बुराई करना भी इन्हीं कारकों में है। पैग़म्बरे इस्लाम ने पूछाः क्या तुम जानते हो कि ग़ीबत किसे कहते हैं। लोगों ने कहा कि ईश्वर और उसके दूत बेहतर जानते है। पैग़म्बरे इस्लाम ने कहाः ग़ीबत कहते हैं अपने भाई को बुरे शब्दों से याद करना। लोगों ने पूछाः यदि उसमें वह बुराई हो तब भी? पैग़म्बरे इस्लाम ने कहाः यदि कोई बुरी बात कहो जो उसमें मौजूद है इसे ग़ीबत कहते हैं और यदि उसे किसी ऐसी बुरी बात से याद करो जो उसमें नहीं है तो इस प्रकार तुमने उस पर आरोप लगाया और उससे झूठी बात जोड़ी।

    ग़ीबत के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण बिन्दु यह भी है कि ग़ीबत केवल ज़बान से नहीं की जाती बल्कि हाथ, पैर, आंख, और भौं सहित दूसरे किसी भी इशारे से भी ग़ीबत हो सकती है। इस संदर्भ में पैग़म्बरे इस्लाम की पत्नी हज़रत आयशा के हवाले से इस्लामी इतिहास में एक घटना मिलती है। हज़रत आयशा कहती हैं कि एक दिन हमारे पास एक महिला आयी। जिस समय वह जाने के लिए मुड़ी तो मैंने हाथ से इशारा किया कि वह छोटे क़द की है। पैग़म्बरे इस्लाम ने कहाः तुमने अपने इस इशारे से ग़ीबत की है।

    ग़ीबत अर्थात दूसरों की बुराई करने का एक हानिकारक परिणाम यह है कि बुराई करने वाले की उपासनाएं, ईश्वर स्वीकार नहीं करता मगर इस शर्त के साथ कि जिसकी बुराई की गयी है वह बुराई करने वाले को क्षमा कर दे। इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम नैतिक शास्त्र एवं सद्गुणों के शिक्षक हैं। चूंकि उनका उद्देश्य लोगों का प्रशिक्षण करना है इसलिए वह अपनी नैतिक महानता के कारण स्वंय का यह कर्तव्य समझते हैं कि जिसने उन्हें बुरा कहा है उसके साथ उदार व्यवहार अपनाएं। इसलिए यदि बुराई करने वाला इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम के पास आकर क्षमा मांगे तो वह उसे जताए बिना तुरंत क्षमा कर देंगे किन्तु यदि बुराई करने वाला क्षमा न मांगे तो इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम अपने मानवीय एवं नैतिक कर्तव्य के अनुसार उस व्यक्ति को बुरा कहने के बजाए ईश्वर से प्रार्थना करते हैः हे पालनहार! जिसने मुझे बुरा कहा है और मुझे बुरे शब्दों से याद किया है मुझे उसके इस रवैये के विपरीत व्यवहार अपनाने में सफलता प्रदान कर और उसे मैं भले शब्दों से याद करूं। नैतिकता के उच्च चरण पर पहुंचे हुए लोग सद्गुणों को अपनी परिपूर्णतः तक पहुंचने का आधार मानते हैं और इस मार्ग में लोगों से प्रशंसा या किसी बदले की आशा नहीं रखते बल्कि ऐसे लोग मन ही मन प्रसन्न रहते हैं कि उन्होंने अपने मानवीय कर्तव्य का निर्वाह किया और दूसरे यह कि उन्हें उस पवित्र कर्तव्य को अंजाम देने का सुअवसर प्राप्त हुआ है।

     

    इस भाग में एक रोचक कहानी आपकी सेवा मे प्रस्तुत कर रहे हैं। एक दिन इस्लामी जगत के एक भाग के शासक ने अपने हरकारों से कहाः मैं ऐसे व्यक्ति से मिलना चाहता हूं जिसने पैग़म्बरे इस्लाम को देखा और उनसे कोई कथन सुना हो ताकि वह पैग़म्बरे इस्लाम से बिना किसी माध्यम के कोई कथन मुझे सुनाए। चूंकि पैग़म्बरे इस्लाम के स्वर्गवास को बहुत समय बीत चुका था इसलिए इस बात की संभावना बहुत क्षीण थी कि ऐसा कोई व्यक्ति जीवित बचा हो जिसने पैग़म्बरे इस्लाम को स्वयं देखा हो। बहरहाल यदि कोई मिल भी जाता तो वह बूढ़ा ही होता। शासक के हरकारे ऐसे व्यक्ति की तलाश में निकल पड़े। अंततः उन्हें एक बहुत ही वृद्ध व्यक्ति मिल गया। उसे टोकरी में रख कर बहुत ही सावधानी के साथ शासक के दरबार में पहुंचे। शासक बहुत प्रसन्न था कि पैग़म्बरे इस्लाम का दर्शन करने और उनका कथन स्वंय सुनने वाले व्यक्ति से भेंट करने की उसकी इच्छा पूरी होने जा रही है। शासक ने उस बूढ़े व्यक्ति से पूछाः हे वृद्ध व्यक्ति क्या तुमने पैग़म्बरे इस्लाम को देखा है? वृद्ध व्यक्ति ने कहाः जी हां। शासक ने कहाः किस समय उन्हें देखा था। बूढ़े व्यक्ति ने जवाब दियाः मैं बच्चा था कि एक दिन मेरे पिता मेरा हाथ पकड़ कर पैग़म्बरे इस्लाम की सेवा में ले गए किन्तु उस दिन के बाद मैं दोबारा पैग़म्बरे इस्लाम की सेवा में न पहुंच सका यहां तक कि पैग़म्बरे इस्लाम का स्वर्गवास हो गया। शासक ने कहाः अच्छा यह बताओ कि उस दिन पैग़म्बरे इस्लाम से कोई बात सुनी थी या नहीं? बूढ़े आदमी ने कहाः हां उस दिन पैग़म्बरे इस्लाम की यह कहते सुना था कि आदम की संतान बूढ़ी हो जाती है और जितना अधिक बूढ़ी होती जाती उतनी ही उसमें दो विशेषताएं प्रबल होती जाती हैं एक लालच और दूसरे लंबी इच्छाएं। शासक बहुत प्रसन्न हुआ कि उसने पैग़म्बरे इस्लाम की ज़बान से निकली हुयी बात को केवल एक माध्यम से सुना है इसलिए उसने बूढ़े आदमी को सोने के सिक्कों का एक थैला उपहार में देने का आदेश दिया और उस बूढ़े व्यक्ति को बाहर ले गए। जैसे ही उस बूढ़े आदमी को बाहर ले गए उसने अपनी कमज़ोर आवाज़ में कहाः मुझे शासक के पास ले चलो कि उससे मुझे कुछ काम है। नौकरों ने कहाः अब कुछ नहीं हो सकता। बूढ़े व्यक्ति ने कहाः मेरे पास शासक से एक प्रश्न पूछने के सिवा कोई और चारा नहीं है और उसके बाद चला जाउंगा। टोकरी उठाने वाला व्यक्ति पुनः बूढ़े आदमी को शासक के दरबार में लाया। बूढ़े आदमी ने शासक से पूछाः एक प्रश्न है आपसे। यह बताइये कि यह जो आपने आज मुझे दान किया है क्या यह केवल इस वर्ष के लिए है या हर वर्ष इसी तरह मुझे दान करते रहेंगे। शासक ने हंसते हुए कहाः पैग़म्बरे इस्लाम ने सही कहा कि आदम की संतान जितना बूढ़ी होती जाती है उसमें लालच और लंबी इच्छाएं जवान होती जाती है।

     

    इस भाग में हज़रत अली द्वारा अपने सुपुत्र को की गयी वसीयत के एक भाग का उल्लेख करने जा रहे हैं। हज़रत अली अलैहिस्सलाम अपने बेटे इमाम हसन अलैहिस्सलाम को संबोधित करते हुए कहते हैः ईश्वर की कृपा के ख़ज़ाने से वह चीज़े पा सकते हो जो उसके सिवा कोई और नहीं दे सकता जैसे लंबी उम्र, स्वास्थय और रोज़ी में वृद्धि। ईश्वर ने तुम्हें दुआ की अनुमति देकर अपने ख़ज़ाने की चाभी तुम्हारे हाथ में दे दी है तो जब जी चाहे दुआ के द्वारा ईश्वर की अनुकंपाओं के द्वार को खोल लो और उसकी कृपा की वर्षा करवा लो।

    हज़रत अली अलैहिस्सलाम इस स्थान पर यह कह रहे हैं कि ईश्वर की कृपा के ख़ज़ाने में ऐसे उपहार हैं जो कोई और नहीं दे सकता। और वह तीन उपहारों की ओर संकेत करते हैं। पहले लंबी उम्र जिसमें आदमी अधिक आत्मनिर्माण और भलाईयां कर सकता है। दूसरे स्वास्थय जो बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके बिना लंबी उम्र का दुख और पीड़ा तथा कभी ईश्वर से दूर होने के सिवा कोई और परिणाम नहीं निकलेगा। तीसरे रोज़ी में वृद्धि। क्योंकि आदमी वित्तीय संभावनाओं के बिना बहुत सी भलाइयां नहीं कर सकता। जैसे संबंधियों से अच्छे व्यवहार, वंचितों की सहायता, जन सेवा और इस्लामी शिक्षाओं का प्रसार इत्यादि।

    हज़रत अली अलैहिस्सलाम ईश्वरीय कृपा के इन ख़ज़ानों के उल्लेख के साथ आगे कहते हैः ईश्वर ने अपने ख़ज़ाने की कुंजियों को जिस बात की अनुमति देकर तुम्हारे हवाले की है वह दुआ व प्रार्थना है।

    इस व्याख्या से स्पष्ट हो जाता है कि ईश्वर से प्रार्थना उसके अथाह ख़ज़ाने से लाभ उठाने एवं अपनी इच्छाओं की प्राप्ति में गहरा प्रभाव रखती है। तो यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि जब कोई ज़रूरत हो तो दुआ के माध्यम से ईश्वर की अनुकंपा के द्वार खुलवाए जा सकते हैं तथा उसकी कृपा की वर्षा करवायी जा सकती है।

    स्पष्ट सी बात है कि ईश्वर के ख़ज़ाने कुछ और नहीं बल्कि भौतिक व आत्मिक अनुकंपाएं हैं। हज़रत अली अलैहिस्सलाम ईश्वर की अनुकंपा को कृपा एवं जीवन प्रदान करने वाली वर्षा से उपमा देते हैं कि मनुष्य दुआ द्वारा उसे ईश्वर की कृपा के आसमान से ज़मीन पर उतरवा सकता है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम का एक स्वर्ण कथन हैः दुआएं सफलता और मुक्ति के तालों को खोलने की कुंजियां हैं और सबसे अच्छी दुआ वह दुआ है जो ईश्वर से भयभीत एवं पवित्र मन से निकले।  http://hindi.irib.ir/