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    रमज़ानुल मुबारक – 2013 – (11)

    रमज़ानुल मुबारक – 2013 – (11)
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    ईश्वर से आपकी उपासनाओं की स्वीकारोक्ति की कामना के साथ कार्यक्रम को एक बार फिर इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम की प्रसिद्ध दुआ मकारेमुल अख़लाक़ के एक टुकड़े से आरंभ कर रहे हैं। इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम इस दुआ में एक स्थान पर कहते हैः हे पालनहार! मुझे तेरी उपासना में आलस्य से ग्रस्त मत कर और तेरे सीधे मार्ग पर चलने में मुझे अंधा होने से बचा।

     

    इस दुआ के पहले वाक्य में इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम ईश्वर से प्रार्थना कर रहे हैं कि उन्हें आलस्य में ग्रस्त न करें। आलस्य का अर्थ यह है कि मनुष्य किसी काम को अंजाम देने में सुस्ती करे। जबकि किसी काम को ख़ुशी से अंजाम देना अच्छी विशेषता है इसलिए आलस्य को बुरा माना जाता है।

     

    मनुष्य द्वारा अंजाम दिए जाने वाले सभी काम चाहे वह सांसारिक उद्देश्य के लिए हों या परलोक के सौभाग्य के लिए हो यदि वह यह चाहता है कि काम का अंजाम सही हो तो उसे ख़ुशी से करना चाहिए न कि आलस्य से। संसार के बड़े बड़े वैज्ञानिक इसलिए आश्चर्यचकित करने वाले आविषकार कर सके क्योंकि वे अपना काम बड़े शौक़ व उत्साह से करते और काम के समय इतना लीन हो जाते थे कि उन्हें आस पास की कोई ख़बर नहीं होती थी कि आस पास क्या हो रहा है।

     

    ईश्वर पर आस्था के संदर्भ में यह बिन्दु भी महत्वपूर्ण है कि ईश्वर पर लोगों की आस्था का स्तर भिन्न होता है इसलिए परलोक संबंधी उनके कर्म भी भिन्न भिन्न होते हैं। ईश्वर के प्रिय बंदों को उसकी उपासना में मज़ा आता है और वे पूरी तनमयता से उसकी उपासना करते हैं। इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम ईश्वर से प्रार्थना कर रहे हैं कि यह आत्मिक स्थिति एंव उपासना में मज़ा वृद्धावस्था में भी बाक़ी रहे। अलबत्ता ईश्वर के बंदों का ऐसा भी समूह है कि जो उस पर और प्रलय के दिन पर आस्था रखते हैं कि किन्तु सांसारिक मामलों में इतना लीन होते हैं कि रूचि के साथ उपासना नहीं करते और आत्मिक आनंद हासिल नहीं कर पाते। इस प्रकार के लोग आत्मिक दृष्टि से बीमार हैं और जब तक अपना उपचार नहीं करवा लेते ईश्वर की उपासना का आनंद हासिल नहीं कर सकते। इस समूह के बारे में हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम कहते हैः मैं आप लोगों से सच कह रहा हूः जिस प्रकार मरीज़, स्वादिष्ट व्यंजन देखता रहता है और तीव्र पीड़ा के कारण उसका मज़ा नहीं ले पाता इसी प्रकार सांसारिक मोहमाया में पड़े हुए लोग भी पैसे के लोभ के कारण उपासना का आनंद प्राप्त नहीं कर पाते।

     

    इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम अपनी दुआ में ईश्वर से एक और चीज़ की प्रार्थना करते हुए कहते हैः हे पालनहार! सीधा मार्ग चलने में मुझे अंधेपन से सुरक्षित रख। हम सब यह बात जानते हैं कि सत्य का मार्ग चलने में दिल की आंख और बुद्धि द्वारा मार्गदर्शन की ज़रूरत होती है। जिसके पास आत्मज्ञान और सही समझ है वह सत्य के मार्ग पर सही ढंग से चल सकता है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम आत्मज्ञानियों के लिए सत्य के मार्ग को पहचानने और उस पर चलने तथा इस मार्ग में मौजूद गड्ढों में गिरने से बचने के संबंध में कहते हैः परीज्ञानी वह है जो किसी बात को सुनता है तो उस पर गहन विचार करता है कि क्या यह बात उसके हित में है। वह सीधे मार्ग पर चलता है और मार्ग में मौजूद गड्ढों की ओर से सावधान रहता है ताकि उसमें गिरने न पाए।

     

    एक व्यक्ति सदैव ईश्वर की उपासना करता था। एक दिन शैतान उसके सामने प्रकट हुआ और उसने उसे बहकाया यहां तक कि उसने उपासना करनी छोड़ दी। शैतान ने उस व्यक्ति को बहकायाः हे व्यक्ति यह जो तुम सुबह के समय अल्लाहु अल्लाहु कहते हो। एक बार भी तुम्हें इस पुकारने का जवाब नहीं मिला? यदि तुम किसी भी घर के दरवाज़े पर जाकर आवाज़ देते तो कम से कम एक बार तो कोई तुम्हें जवाब ज़रूर देता। इस व्यक्ति को शैतान की बात सही लगी। उसने अल्लाहु अल्लाहु कहना छोड़ दिया यहां तक कि एक दिन स्वप्न में उसने एक वाणी सुनी जो उससे कह रही थीः तुमने ईश्वर की वंदना क्यो छोड़ दी?

     

    उस व्यक्ति ने कहाः मैं इतनी वंदना करता हूं किन्तु एक बार भी मेरी प्रार्थना का जवाब नहीं दिया गया। उस वाणी ने उससे कहाः मुझे ईश्वर ने तुम्हारा जवाब देने के लिए नियुक्त किया है। तुम्हारा अल्लाहु अल्लाहु कहना ही हमारा जवाब है। तुम नहीं जानते कि हमने तुम्हारे मन में उपासना की जो रूचि पैदा की है यह स्वयं ईश्वर की कृपा और उसकी ओर से जवाब है।

    यह कहानी हज़रत अली अलैहिस्सलाम की प्रसिद्ध दुआ दुआए कुमैल के एक टुकड़े की ओर ध्यान ले जाती है जिसमें हज़रत अली अलैहिस्सलाम कहते हैं कि हे पालनहार! उन पापों को क्षमा कर दे जो दुआ की स्वीकारोक्ति में रुकावट बनते हैं। हज़रत अली अलैहिस्सलाम का तात्पर्य यह है कि मनुष्य में प्रार्थना में रूचि और आशा, पाप करने के कारण चली जाती है और वह दुआ करना छोड़ देता है जबकि दुआ व प्रार्थना के क्षण उसके लिए लाभदायक हैं। यह जो कहा जाता है कि दुआ मनुष्य के लिए उद्देश्य भी है और उसकी इच्छाओं की पूर्ति का साधन भी है तो इसका अर्थ यह है कि यदि दुआ स्वीकार न भी हो तब भी वह एक अच्छी चीज़ है। आशा करते हैं कि इस पवित्र महीने में हमें अधिक से अधिक प्रार्थना व वंदना का अवसर प्राप्त होगा।

     

    इस भाग में हज़रत अली अलैहिस्सलाम द्वारा अपने बेटे इमाम हसन को पत्र द्वारा की गयी वसीयत के एक भाग का उल्लेख कर रहे हैं। हज़रत अली अलैहिस्सलाम कहते हैः यह बात निश्चित रूप से याद रखो कि अपनी सभी इच्छाओं को प्राप्त नहीं कर सकते और यह भी याद रहे कि जितनी आयु लिख दी गयी है उससे अधिक नहीं जिओगे। तुम उसी मार्ग पर हो जिस पर तुमसे पहले वाले थे। अब जबकि ऐसा है तो दुनिया की प्राप्ति में अति न करो और काम और रोज़ी की तलाश में मध्यमार्गी बनो क्योंकि ऐसा बहुत देखा गया है कि दुनिया के मार्ग में बहुत अधिक प्रयास का परिणाम विनाश के रूप में सामने आया है। यह ज़रूरी नहीं कि रोज़ी की तलाश में लगा रहने वाला कामयाब ही हो और इसकी तलाश में मध्यमार्ग अपनाने वाला वंचित रहे।

     

    हज़रत अली अलैहिस्सलाम अपनी वसीयत के इस भाग में कुछ महत्वपूर्ण बिन्दुओं की ओर इशारा कर रहे हैं कि इसमें से हर एक आत्मनिर्माण करने वाली नसीहत है। नसीहत से पूर्व एक संक्षिप्त सी पृष्ठिभूमि में कहते हैः निश्चित रूप से जान लो कि अपनी सभी इच्छाओं को पूरी नहीं कर सकते और जितनी उम्र लिख दी गयी है उससे अधिक नहीं जिओगे। उसके बाद यह परिणाम पेश करते हैः अब जबकि ऐसा है तो दुनिया की प्राप्ति में अति से काम मत लो और रोज़ी की तलाश में मध्यमार्ग अपनाओ। स्पष्ट है कि इस दुनिया में कोई भी व्यक्ति अपनी सारी इच्छाओं को पूरी नहीं कर सकता इसलिए रोज़ी की तलाश में क्यों इतना लोभी बनें?

     

    सांसारिक मामलों में अति से बचना और मध्यमार्ग अपनाने पर ज़ोर दोनों ही एक वास्तविकता की ओर इशारा है और वह अधिक रोज़ी प्राप्त करने में लोभ से बचना है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम अपनी बात के पक्ष में तर्क पेश करते हुए कहते हैः क्योंकि दुनिया की प्राप्ति के मार्ग में बहुत अधिक प्रयास का नतीजा माल के नष्ट होने के रूप में सामने आया है। अर्थात हर प्रयास करने वाला अपनी दृष्टिगत रोज़ी तक नहीं पहुंचा है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम की बात इस बात की ओर इशारा है कि सदैव अधिक प्रयास के नतीजे में अधिक रोज़ी नहीं मिला करती और मध्यमार्ग अपनाने में रोज़ी सदैव कम नहीं होती बल्कि ईश्वर की कृपा इस बात में निहित है कि उस पर भरोसा किया जाए और लोभ व लालच से बचा जाए और रोज़ी के लिए मध्य मार्ग अपनाया जाए ताकि जीवन अधिक शांतिपूर्ण व सुखदायी हो और साथ ही दूसरों को अपनी रोज़ी हासिल करने के लिए प्रयास का अवसर मिले और लालची उनके लिए मार्ग न बंद करें।

     

    एक और महत्वपूर्ण बिन्दु यह है कि दुनिया के व्यापार में मुख्य पूंजि मनुष्य की आयु है। इस बिन्दु पर भी ध्यान देना चाहिए कि जिस व्यक्ति ने दुनिया प्राप्त करने में अपनी आयु गुज़ार दी है यदि उसे धन मिल गया है तो उसने क्या लाभ हासिल किया?  और यदि न मिल सकता तो उसे क्या हानि हुयी है? हज़रत अली अलैहिस्सलाम की इस बात में एक रोचक बिन्दु यह है कि इसमें रोज़ी और प्रयास के बीच संबंध को पूरी तरह नकारा नहीं गया है किन्तु रोज़ी की प्राप्ति एवं मात्रा को केवल प्रयास पर निर्भर नहीं माना है। और अधिक स्पष्ट शब्दों में मनुष्य का अधिक या कम प्रयास रोज़ी की अधिक या कम मात्रा में प्राप्ति का एक कारक हो सकता है किन्तु इसके साथ ही रोज़ी की प्राप्ति में दूसरे कारक भी भूमिका निभाते हैं। रोज़ी में वृद्धि या कमी ईश्वर की ओर से संभवतः परीक्षा भी हो सकती है। रोज़ी संभव है कभी अच्छे कर्म या दुआ से बढ़ जाए और कभी पाप या बुरे कर्म के कारण कम हो जाए। अधिक धन संपत्ति सदैव समस्या का निदान नहीं होता बल्कि संभव है कि अधिक धन संपत्ति किसी व्यक्ति को सही मार्ग से हटा दे और किसी दूसरे व्यक्ति को सही मार्ग पर पहुंचा दे। http://hindi.irib.ir/