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    रमज़ानुल मुबारक – 2013 – (12)

    रमज़ानुल मुबारक – 2013 – (12)
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    इस साल पवित्र रमज़ान गर्मियों में पड़ा है।  विश्व के बहुत से देशों में लोग भीषण गर्मी में रोज़े रख रहे हैं।  निश्चित रूप से इस गर्मी में रोज़े का सवाब अर्थात पुण्य भी अधिक है।  इस बारे में पैग़म्बरे इस्लाम (स) का कथन है कि गर्मी के दिनों में रोज़े रखना, ईश्वर के मार्ग में संघर्ष करने के समान है।  हमारी ईश्वर से प्रार्थना है कि वह अपने इस पवित्र महीने में हमे अपने से अधिक निकटता का अवसर प्रदान करे।

     

    आइए मकारिमुल अख़लाक़ नामक दुआ का अगला वाक्य सुनते हैं।  इसमें इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम ईश्वर से इस प्रकार से प्रार्थना करते हैं- हे ईश्वर! तू मुझको एसा बना दे कि समस्याओं के समय मैं केवल तेरी ही शरण में जाऊं और आवश्यकता के समय केवल तुझसे सहायता मांगूं और कुछ न होने के समय तेरी शरण में पहुंचूं।

    जैसाकि आप जानते हैं जिस संसार में आप जीवन व्यतीत कर रहे हैं वह साधन और माध्यम का स्थल है और किसी भी प्रकार के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सर्वप्रथम उसके कारणों और माध्यमों को उपलब्ध कराया जाना चाहिए।  इस बात को समस्त धर्मावलंबी स्वीकार करते हैं। यहां पर अंतर केवल इतना सा है कि भौतिकवादी विचारधारा के स्वामी, सृष्टि और उसमें पाई जाने वाली चीज़ों को एक घटना का परिणाम मानते हैं और हर कारण को वे किसी पर निर्भर नहीं मानते हैं किंतु धर्म का अनुसरण करने वाले, समस्त सृष्टि को और उसमे जो कुछ भी है उसको ईश्वर का बनाया हुआ मानते हैं।  उनका यह भी मानना है कि हर कार्य ईश्वर की इच्छा से ही होता है।  यही कारण है कि इस्लाम में केवल ईश्वर से सहायता मांगने को ही वैध बताया गया है।  पवित्र क़ुरआन के सूरए हम्द की पांचवी आयत में हम पढ़ते हैं कि हे ईश्वर! हम केवल तेरी उपासना करते हैं और केवल तुझसे ही सहायता चाहते हैं।

    दुआ के इस भाग में इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम ईश्वर से कहते हैं कि आवश्यकता के समय मैं केवल तुझसे सहायता चाहता हूं क्योंकि ईश्वर ही बड़ी से बड़ी आवश्यकता की पूर्ति करने वाला है।  इमाम ज़ैनुल आबेदीन के कथन की गहराई को समझने के लिए हम इस्लाम के उदय के काल से संबन्धित एक घटना की ओर संकेत करते हैं।  पैग़म्बरे इस्लाम (स) के मक्का से मदीने पलायन के पांचवें वर्ष, इस्लाम को सदा से लिए समाप्त करने के उद्देश्य से अनेकेश्वरवादियों के कई गुट एकजुट हो गए और उन्होंने मुसलमानों के विरुद्ध “अहज़ाब” नामक युद्ध की तैयारी आरंभ की।  शस्त्रों और सैनिकों की संख्या की दृष्टि से वे मुसलमानों की तुलना में बहुत अधिक थे।  इस असमानता के दृष्टिगत मुसलमानों पर अनेकेश्वरवादियों की विजय सुनिश्चित थी।  एसी संवेदनशील स्थिति में पैग़म्बरे इस्लाम ने ईश्वर से सहायता के लिए दुआ की।  ईश्वर की ओर से जिब्रईल उनके पास आए और उन्होंने कहाः ईश्वर कहता है कि उसने तुम्हारी दुआ को सुना, तुम्हारी प्रार्थना को स्वीकार किया, और शत्रु की ओर से तुम्हें जो चिंता लगी हुई थी उसे तुमसे दूर कर दिया।  पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने पूरी स्थिति को समझने और यह जानने के लिए कि ईश्वर की सहायता किस प्रकार से होगी अपने एक साथी “होज़ैफ़ा” को यह कार्य सौंपा कि वे अनेकेश्वरवादियों के पड़ाव स्थल पर जाकर उनकी स्थिति के बारे में सूचना लाएं।

     

    अनेकेश्वरवादी, मदीने से बाहर एक बड़े मरूस्थल में मौजूद थे।  उन्होंने वहां पर अपने तंबू लगा रखे थे।  उन्होंने अपने घोड़ों और ऊंटों को उचित स्थान पर बांध दिया था।  उनके सैनिक अपने निर्धारित स्थानों पर विश्राम कर रहे थे।  एक अन्य स्थान पर अनेकेश्वरवादियों ने खाना पकाने के लिए आग जला रखी थी।  अपने हिसाब से वे युद्ध के लिए पूरी तरह से तैयार थे।  रात हो चुकी थी और चारों ओर अंधेरा था।  इस बीच एकदम से तेज़ हवा चलना आरंभ हुई जो बाद में तेज़ आंधी में बदल गई।  आंधी में धूल के साथ छोटे-छोटे पत्थर भी थे जो वहां पर मौजूद लोगों को लग रहे थे।  आंधी के कारण अनेकेश्वरवादियों के सारे तंबू गिर गए और वहां पर जलने वाली आग चारों ओर फैल गई।  इस तेज़ आंधी के कारण अनेकेश्वरवादियों का सारा सामान इधर-उधर बिखर गया।  अब स्थिति एसी बन चुकी थी कि अनेकेश्वरवादी न केवल यह कि युद्ध में अपनी विजय के प्रति निराश हो चुके थे बल्कि अब तो उन्हें अपनी जान बचाने के लाले पड़ गए थे।  होज़ैफ़ा उस समय वहां पर पहुंचे जब शत्रु की छावनी नष्ट हो चुकी थी और अनेकेश्वरवादियों के बड़े नेता अब अपनी जान बचाकर भागने में लगे हुए थे।

     

    इस भाग में हम आपको एक वरिष्ठ धर्मगुरू मुल्ला मुहम्मद तक़ी मजलिसी के जीवन की एक घटना सुनाने जा रहे हैं।  इस्लाम के एक वरिष्ठ धर्मगुरू अल्लामा मजलिसी के पिता मुल्ला मुहम्मद तक़ी मजलिसी के एक मित्र ने एक दिन उनसे अपने पड़ोसी की शिकायत की।  उन्होंने कहा कि मुझको इस बात का दुख है कि मेरा पड़ोसी अपने कुछ दोस्तों के साथ देर रात तक नाच-गाने और शराब पीने में व्यस्त रहता है।  तक़ी मजलिसी ने अपने मित्र से कहा कि तुम अपने पड़ोसी और उसके मित्रों को आज रात अपने यहां खाने पर बुलाओ।  मैं भी वहां पर आऊंगा।  तक़ी मजलिसी के मित्र ने उनकी बात मान ली और अपने पड़ोसी को रात के खाने का निमंत्रण दिया।  पड़ोसी ने निमंत्रण स्वीकार कर लिया और व्यंगात्मक ढंग से उनसे कहा कि एसा क्या हुआ कि तुम हमारे गुट में सम्मिलित हो गए?

     

    तक़ी मजलिसी के मित्र अपने घर जाकर रात के खाने की तैयार में लग गए।  रात के समय तक़ी मजलिसी, मेहमानों के आने से पहले ही अपने मित्र के घर पहुंच गए और वहां पर उनके आने की प्रतीक्षा करने लगे।  जब मेहमान घर में आए और उन्होंने वहां पर मुल्ला मुहम्मद तक़ी को देखा तो उनको बहुत आश्चर्य हुआ।  उन्होंने जब वहां पर एक धार्मिक व्यक्ति को उपस्थित पाया तो सोचा कि उनकी उपस्थिति में तो हम कुछ कर ही नहीं सकते इसलिए उन लोगों ने तक़ी मजलिसी को वहां से दूर करने के लिए एक चाल चली।  उन्होंने मुल्ला तक़ी को संबोधित करते हुए कहा कि जो शैली आपने अपनाई है वह उचित है या फिर वह काम जो हम करते हैं वह सही है।  उनकी बात सुनकर मुल्ला तक़ी ने मुस्कुराते हुए कहा कि हरएक अपनी-अपनी शैली बताए उसके बाद देखा जाएगा कि किसकी शैली ठीक है।  पड़ोसी ने कहा कि हमारी एक विशेषता यह है कि हम जब किसी का नमक खा लेते हैं तो फिर उसको कभी धोखा नहीं देते।  यह बात सुनकर मुल्ला मजलिसी ने सोचा कि यह उचित अवसर है इसलिए अब अपनी बात कही जाए।  उन्होंन कहा कि मैं तुम्हारी इस बात को स्वीकार नहीं करता।  शराबी पड़ोसी ने कहा कि यह बात तो हमारी नीति के विरुद्ध है।  शराबी की बात सुनकर मुल्ला ने कहा कि क्या तुमने अबतक ईश्वर का नमक खाया है या नहीं? उनकी इस बात ने जलती आग पर ठडे पानी का काम किया।  उनकी बात के पश्चात वहां पर मौन छा गया और उपस्थित लोग लज्जित हो गए।  उन्होंने आंखों ही आंखों में एक दूसरे को देखा और एक-एक करके वहां से उठकर चले गए।  घर के स्वामी ने जब यह देखा तो उन्हें बहुत आश्चर्य हुआ।  वे मुल्ला मुहम्मद तक़ी के पास गए और उन्होंने कहा कि यह तो बहुत बुरा हुआ।  इसपर मुल्ला तक़ी ने कहा कि धैर्य रखों देखते हैं आगे क्या होता है?  उन लोगों के घर से बाहर जाने के कुछ समय बाद स्वयं मुल्ला तक़ी भी अपने घर चले गए।   वे अपने घर पहुंचे।  प्रातः किसी ने उनका दरवाज़ा खटखटाया।  उन्होंने देखा कि उनके दरवाज़े पर वही शराबी व्यक्ति खड़ा है।  उसने मुल्ला तक़ी को सलाम किया और कहा कि आपकी बात ने मुझको सोचने पर विवश कर दिया।  अब मैंने प्रायश्चित कर लिया है और आपसे धार्मिक बातें सीखना चाहता हूं।  उसकी यह बात सुनकर मुल्ला मुहम्मद तक़ी मुस्कुराए और उसे अपने घर में ले जाकर धार्मिक बातें सिखाने लगे।

    इस भाग में हम नजहुल बलाग़ा के ३१वें पत्र का एक भाग प्रस्तुत करने जा रहे हैं।  हज़रत अली अलैहिस्सलाम कहते हैं कि स्वयं को हर प्रकार की तुच्छता और बुरी बातों से बचाओ।  हो सकता है कि प्रयास करके तुम तुच्छ इच्छाओं की पूर्ति कर लो किंतु इनकी प्राप्ति में तुम्हारे व्यक्तित्व को जो क्षति होगी उसकी पूर्ति किसी भी स्थिति में संभव नहीं है।  तुम दूसरों के दास न बनों क्योंकि ईश्वर ने तुमको स्वतंत्र पैदा किया है।  अपने इस कथन में इमाम अली अलैहिस्सलाम इस बिंदु को समझाना चाहते हैं कि मनुष्य की कुछ इच्छाएं एसी होती हैं जिनकी पूर्ति के लिए उसे दूसरों के सामने लज्जित और अपमानित होना पड़ता है।  हालांकि एक स्वतंत्र और सम्मानित व्यक्ति के लिए यह शोभा नहीं देता कि वह इस प्रकार का कार्य करे।  यह बहुत ही तुच्छ कार्य है कि अपनी एक भौतिक इच्छा की पूर्ति के लिए मनुष्य दूसरों के सामने अपमानित हो।  जो कोई भी अपनी किसी इच्छा की पूर्ति के लिए अपने मान-सम्मान को दावं पर लगा दे तो उसने वास्तव में घाटा उठाया है।  चाहे इस मार्ग से उसे कितना ही धन क्यों न मिल जाए।  दूसरे शब्दों में पैसों का प्रयोग मनुष्य को अपनी इज़्ज़त और अपने सम्मान की सुरक्षा के लिए करना चाहिए न कि पैसे के कारण वह अपने मान-सम्मान को ही दांव पर लगा दे।

     

    हज़रत अली अलैहिस्सलाम अपने उपदेश में आगे कहते हैं कि किसी अन्य के दास न बनों क्योंकि ईश्वर ने तुम्हें स्वतंत्र पैदा किया है।  हज़रत अली अलैहिस्सलाम का यह वाक्य उनके उपदेशों में अत्यंत महत्वपूर्ण है।  वास्तव में ईश्वर ने मनुष्य को स्वतंत्र पैदा किया है अतः उसे इस मूल्यवान उपहार को किसी भी वस्तु के बदले बदलना नहीं चाहिए।  हज़रत अली अलैहिस्सलाम का यह कथन व्यक्ति और राष्ट्र दोनों के लिए है।  कुछ राष्ट्र एसे भी है जो कुछ विशिष्टाएं प्राप्त करने के लिए अपनी स्वतंत्रता का सौदा कर लेते हैं।  विश्व की वर्चस्ववादी शक्तियां उनकी इस कमी का दुरूपयोग करते हुए उन्हें अपना दास बना लेती हैं।  यह वर्चस्ववादी शक्तियां कमज़ोर देशों की छोटी सी आर्थिक सहायता करके अपनी भ्रष्ट संस्कृति को इन राष्ट्रों पर थोप देती हैं और इस प्रकार से उनके धर्म और उनकी आस्था का सौदा करती हैं किंतु सम्मानीय व्यक्ति एवं स्वतंत्र राष्ट्र किसी के दास नहीं बनते चाहे उन्हें इस मार्ग में कितना ही संघर्ष क्यों न करन पड़े।  यही कारण है कि इमाम अली अलैहिस्सलाम कहते हैं कि अपने व्यक्तित्व को भौतिक वस्तुओं की बलि न चढ़ाओ।