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    रमज़ानुल मुबारक – 2013 – (15)

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    इस संसार के अन्त में लौटने का कोई मार्ग नहीं है ठीक उसी प्रकार जैसे अविकसित व विकरित बच्चा विकास करने एवं विकार दूर करने के लिये पुनः माता के पेट में नहीं जा सकता तथा पेड़ से टूटा हुआ फल दोबारा पेड़ में नहीं लग सकता। यह एक प्रकार से हमारे लिये चेतावनी है कि हम जान लें कि सम्भव है कि एक पल में सब कुछ समाप्त हो जाये, तौबा व प्रायश्चित के मार्ग बन्द हो जायें, भले कर्मों का कोई अवसर न बचे और हम लालसा और हसरत के साथ इस संसार से चले जायें। अतः रमज़ान के पवित्र समय को हमें अपने नैतिक विकास का महत्वपूर्ण अवसर समझना चाहिये।

    हज़रत अली(अ) का कथन है कि पापी विचारों से दूरी मन का रोज़ा है जो पेट के रोज़े अर्थात भूख-प्यास सहन करने से बढ़ कर होता है।

    अब आइये पैगम्बरे इस्लाम(स) के पौत्र इमाम सज्जाद(अ) की दुआ मकारेमुल अखलाक़ अर्थात शिष्टाचार व नैतिकता के चरण का एक भाग सुनते हैः हे ईश्वर मेरे प्रति पापियों एवं अत्याचारियों की ईष्या को प्रेम व मित्रता में परिवर्तित कर दे।

    ईष्या किसी के पास से उस अनुकंपा के समाप्त हो जाने की आरज़ू को कहते हैं जिसे वह अनुकंपा प्राप्त होनी ही चाहिये। जो लोग ईश्वर एवं इस्लामी शिक्षाओं पर पूर्ण विश्वास रखते हैं वे कभी दूसरों के पास से अनुकंपाओं के समाप्त होजाने की कामना नहीं करते बल्कि ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि स्वयं उनको भी वह अनुकंपा प्राप्त हो जाये। परन्तु पाखंण्डी एवं बिना ईमान वाले लोग ईर्ष्या करते हैं और चाहते हैं कि दूसरों के पास कोई अच्छी वस्तु या गुण न रहे। पैगम्बरे इस्लाम(स) के एक अन्य पौत्र इमाम जाफ़र सादिक़(अ) का कहना है कि ईमान वाला व्यक्ति ईर्ष्या नहीं करता बल्कि इच्छा करता है कि ईश्वर उसे भी वैसी ही अनुकंपा प्रदान करदे जबकि पाखंण्डी ईर्ष्या करता है और अनुकंपा के अन्त की इच्छा करता है।

    इस आधार पर दूसरों को प्राप्त अनुकंपाओं से ईर्ष्या का कारण अधिकतर धन या पद होता है परन्तु इमाम सज्जाद(अ) के पास न तो धन था कि ईर्ष्यालु लोग ईर्ष्या करते न ही शासन व सरकार में उन्हें कोई पद प्राप्त था कि जलने वाले उससे जलते, इस लिये उनसे शत्रुओं की ईर्ष्य़ा का कारण उनकी उत्तम क्षमतायें, महान गुण, अद्वतीय आध्यात्मिक स्थान एवं ईश्वर पर उनका दृढ़ विश्वास था। इमाम की दृष्टि में मनुष्य के लिये सर्वश्रेष्ठ मूल्य अपने पालनहार से उसका विशुद्ध संपर्क है और इमाम के पास यह अनुकंपा मौजूद थी और इसी लिये वे किसी भी भौतिक व सांसारिक वस्तु की परवा नहीं करते थे। इस्लाम में यही वास्तविक वैराग है.

    इस दुआ में इमाम ईश्वर से चाहते हैं कि अत्याचारियों की ईर्ष्या को प्रेम में परिवर्तित करदे। वास्तव में ईर्ष्या एक मान्सिक स्थिति एवं आंतरिक इच्छा है, जब तक अत्याचारी अपनी इच्छा पूर्ति के लिये अत्याचार आरंभ नही करता उस समय तक उस व्यक्ति को कोई ख़तरा नहीं होता जिससे ईर्ष्या की जा रही है। इस समय तक स्वयं ईर्ष्या करने वाला ही अपनी भीतरी आग में जलता रहता है तथा निरन्तर दुखी रहता है। दूसरे व्यक्ति के लिये ख़तरा उस समय आरंभ होता है जब ईर्ष्यालु अपनी आन्तरिक इच्छा की पूर्ति के लिये दूसरे को प्राप्त अनुकंपा को छीन लेना या मिटा देना चाहता है और अत्याचार पर उतर आता है। यही कारण है कि इमाम सज्जाद(अ) दुआ करते हैं कि इस स्थिति से पूर्व ईर्ष्यालु लोगों के मन में

    प्रेम उत्पन्न हो जाय।

    अब हम आपको हज़रत अली अलैहिस्सलाम के अपने सुपुत्र इमाम हसन अलैहिस्सलाम को लिखे एक पत्र के एक भाग से अवगत करा रहे हैं। हज़रत अली कहते हैं कि हे मेरे बेटे तुम्हें ज्ञात रहे कि तुम्हारे सामने एक कठिन मोड़ है कि जिससे गुज़रने के लिए हल्के फुल्के रहने वालों की स्थिति भारी सामान लेकर चलने वालों से बेहतर होती है तथा धीरे चलने वालों की स्थिति जल्दी करने वालों से बहुत बदतर होती है और जान लो कि उस मोड़ से गुज़रने के पश्चात या तुम स्वर्ग में उतरोगे या नरक में अतः वहां पहुंचने से पूर्व अपने लिए आवश्यक सामान इकट्ठा कर लो और अपने ठिकाने को वहां उतरने से पहले तैयार कर लो क्योंकि मृत्यु के पश्चात न तो क्षमा याचना के लिए कोई मार्ग होता है न संसार में लौटने की कोई राह।

    हज़रत अली अलैहिस्सलाम अपने पत्र के इस भाग में एक बार फिर लंबी व भयंकर यात्रा तथा प्रलय के ख़तरे की ओर संकेत करते हुए इस मार्ग को सही ढंग से तय करने को बड़ी सूक्ष्मता से स्पष्ट करते हैं कि जो परलोक के स्थायी जीवन के लिए भले कर्मों द्वारा तैय्यारी करना है। आरंभ में वे कहते हैं कि मेरे बेटे तुम्हें ज्ञात रहे कि तुम्हारे सामने एक कठिन मोड़ है, इस कठिन मोड़ से तात्पर्य मृत्यु या इस संसार तथा अनंत संसार के बीच का स्थान या यह सब कुछ हो सकता है।

    स्पष्ट सी बात है कि कठिन मोड़ से गुज़रने के लिए सामान हल्का करना पड़ता है और सावधानी से गुज़रना पड़ता होता है। यह अर्थ स्वयं क़ुरआन से लिया गया है जिसमें ईश्वर कहता है कि परंतु वह उस महत्त्वपूर्ण मोड़ से नहीं गुज़रा और तुमको क्या पता कि वह मोड़ क्या है? किसी दास को स्वतंत्र करना या भूखे को खाना खिलाना है।

    अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए हज़रत अली अलैहिस्सलाम कहते हैं कि जान लो कि उस मोड़ के बाद निश्चित रूप से या तुमको स्वर्ग में उतरना होगा या नरक में। अतः वहां प्रवेश से पूर्व अपने लिए आवश्यक सामाना इकट्ठा कर लो। हज़रत मुहम्मद (स) का भी कथन है कि मृत्यु के पश्चात क्षमा मांगने तथा ईश्वर को राज़ी करने का कोई मार्ग नहीं होता।

    यह वाक्य कि कोई मार्ग नहीं होता एक स्पष्ट वास्तविकता है जिसकी ओर क़ुरआन की आयतों एवं पैग़म्बरे इस्लाम के कथनों में अनेक स्थानों पर संकेत किया गया है। पवित्र क़ुरआन में ईश्वर कहता है कि अनेकेश्वरवादी अपने ग़लत मार्ग को जारी रखते हैं यहां तक कि उनमें से किसी एक की मृत्यु आ पहुंचती है, तब वह कहता है कि हे पालनहार मुझे लौटा दो, ताकि जो कुछ मैंने छोड़ दिया था, भले कर्म करूं (परंतु उससे कहा जाता है) ऐसा नहीं हो सकता।

    हज़रत अली के भाषणों, पत्रों एवं कथनों पर आधारित नहजुल बलाग़ा नामक किताब के भाषण क्रमांक 188 में मृतकों के संबंध में आया है कि न उन में शक्ति है कि जो बुरे कर्म उन्होंने किए उनका इन्कार कर दें और न अपने भले कर्मों में ही कुछ वृद्धि कर सकते हैं।

    जी हां, इस संसार के अंत में लौटने का कोई मार्ग नहीं है ठीक उसी प्रकार जैसे अविकसित व विकसित बच्चा विकास करने एवं विकास से दूर करने के लिए पुनः माता के पेट में नहीं जा सकता तथा पेड़ का टूटा हुआ फल दोबारा पेड़ में नहीं लग सकता। यह एक प्रकार से हमारे लिए चेतावनी है कि हम जान लें कि संभव है कि एक पल में सब कुछ समाप्त हो जाएगा, तौबा व प्रायश्चित के मार्ग बंद हो जायें, भले कर्मों का कोई अवसर न बचे और हम लालसा और हसरत के साथ इस संसार से चले जाएं। अतः रमज़ान के पवित्र समय को हमें अपने नैतिक विकास का महत्त्वपूर्ण अवसर समझना चाहिए।

    कितना अच्छा हो यदि हम रमज़ान के पवित्र महीने में हज़रत अली अलैहिस्सलाम के उपदेशों को सुनें तथा तौबा और प्रायश्चित के अवसर से लाभ उठाएं। http://hindi.irib.ir/