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    रमज़ानुल मुबारक – 2013 – (16)

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    उचित खान पान का यदि प्रबन्ध रखा जाये तो शिशु को दूध पिलाने वाली माताओं के रोज़ा रखने में कोई समस्या नहीं है। परन्तु इस बात की अनुशंसा की जाती है कि दूध पिलाने वाली मातायें पहले 6 महीने की अवधि में रोज़ा न रखें क्योंकि बच्चा इस अवधि में पूर्ण रूप से माता पर निर्भर होता है और कई दिन तक निरन्तर रोज़ा रखने से दूध की मात्रा कम होजाने की आशंका रहती है अतः रोज़े से शिशु के विकास में विघ्न पड़ सकता है। यदि ऐसी माताओं के शरीर के लिये आवश्यक खाद्य पदार्थों की उचित मात्रा इफ़तार अर्थात रोज़ा खोलते समय तथा सहरी अर्थात भोर समय उनके शरीर में पहुंच जाती है तो माता में उत्पन्न होने वाली संतोष की भावना बच्चे पर बहुत सकारात्मक प्रभाव डालती है।

    दूध पिलाने वाली माताओं के खाने में प्रोटीन, कैल्शियम, आयरन तथा विटामिन होने चाहियें ताकि बच्चे के विकास एवं माता के स्वास्थ्य को क्षति न पहुंचने पाये। यदि खाने पीने का उचित प्रबंध होने के बाद भी माता इस बात का आभास करे कि दूध की मात्रा में कमी होरही है तो उसे रोज़ा नहीं रखना चाहिये। माता का कर्तव्य बच्चे का पेट भरना और उसके शारीरिक व मान्सिक विकास का ध्यान रखना है अतः इस्लाम में माताओं को यह अनुशंसा की गयी है कि बच्चे या स्वयं माता को यदि हानि पहुंचने की आशंका हो तो उनके लिये रोज़ा रखना मना  है।

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