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    रमज़ानुल मुबारक – 2013 – (2)

    रमज़ानुल मुबारक – 2013 – (2)
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    रमज़ान का पवित्र महीना, आसमानी विभूतियों की प्राप्ति के क्षणों से भरा हुआ होता है अतः हमें इस अवसर को हाथ से नहीं जाने देना चाहिए। अब जब कृपालु ईश्वर ने अपनी दया व कृपा के द्वार रमज़ान के अतिथियों के लिए खोल दिए हैं तो हम उसी की ओर उन्मुख होते हैं। जो बात बंदे को ईश्वर की दया व कृपा के द्वार पर खींच लाती है, वह अनन्य ईश्वर के प्रति उसका प्रेम है और बंदा अपने प्रेम में जितना सच्चा होगा, उतना ही अधिक वह ईश्वर के ध्यान का पात्र बनेगा। इन उज्जवल क्षणों में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम के पौत्र इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम की प्रख्यात दुआ, मकारिमुल अख़लाक़ के एक अन्य भाग को सुनते हैं। « اللهم بلِّغْ بِإِیمَانِى أَکْمَلَ الْإِیمَانِ وَ اجْعَلْ یَقِینِى أَفْضَلَ الْیَقِینِ  इस वाक्य का अनुवाद है। प्रभुवरः तुझ पर मेरे ईमान को सबसे संपूर्ण ईमान के चरण तक पहुंचा दे और तुझ पर मेरे विश्वास को सर्वोत्तम विश्वास बना दे।

     

    इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम, पैग़म्बरे इस्लाम व उनके पवित्र परिजनों पर दुरूद भेजने के बाद ईश्वर से सबसे पहली प्रार्थना जो करते हैं, वह यह है कि प्रभुवरः तुझ पर मेरे ईमान को सबसे संपूर्ण ईमान के चरण तक पहुंचा दे। ईमान, ईश्वर को हृदय से स्वीकार करने को कहते हैं। हज़रत अली अलैहिस्सलाम, ईमान को परिभाषित करते हुए कहते हैं कि ईमान, ईश्वर को हृदय से स्वीकार करने, ज़बान से उसे मानने और कर्म से उसे सिद्ध करने का नाम है। ईश्वर के चिन्हों और सृष्टि की विचित्र व्यवस्था पर ध्यान देने से ज्ञान व तत्वदर्शी ईश्वर के अस्तित्व पर हमारी आस्था सुदृढ़ होती है। अलबत्ता इस बात पर भी ध्यान रखना चाहिए कि केवल रचयिता या पालनहार के अस्तित्व पर आस्था, से ईमान संपूर्ण नहीं होता बल्कि आवश्यक है कि हमारे विचार और कर्म भी ईश्वर की इच्छा के अनुसार हों।

    इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम मकारिमुल अख़लाक़ नामक दुआ में, ईश्वर से सबसे संपूर्ण ईमान के चरण तक पहुंचाने की प्रार्थना के बाद कहते हैं कि प्रभुवर! मेरे विश्वास को सर्वोत्तम विश्वास बना दे। ईमान के बाद विश्वास के उल्लेख से पता चलता है कि विश्वास का महत्व अधिक है। यहां संभव है कि मन में यह प्रश्न आए कि जब ईमान, आध्यात्मिक व हार्दिक आस्था को कहते हैं और उसमें कोई संदेह भी नहीं होता तो किस प्रकार विश्वास का महत्व उससे अधिक हो सकता है? ईमान की आत्मिक स्थिति और विश्वास में क्या अंतर है? इस प्रश्न के उत्तर में क़ुरआने मजीद में वर्णित ईश्वर के महान पैग़म्बर हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के उस कथन की ओर संकेत किया जा सकता है जिसमें उन्होंने ईश्वर से कहा कि प्रभुवर! मुझे यह दिखा कि तू किस प्रकार मुर्दों को जीवित करता है? ईश्वर ने कहा कि क्या तुम्हें इस पर ईमान नहीं है? हज़रत इब्राहीम ने कहा, ईमान तो है किंतु मैं चाहता हूं कि मेरे हृदय को विश्वास हो जाए। उनके इस वाक्य से पता चलता है कि विश्वास का दर्जा ईमान से अधिक है।

     

    हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने भी विश्वास का अर्थ, वास्तविक रूप में नतमस्तक होना बताया है। वे कहते हैं कि इस्लाम का अर्थ है नतमस्तक होना और नतमस्तक होना, वास्तविक विश्वास और हृदय के संतोष को कहते हैं जो सच्चे मुसलमानों में उत्पन्न होता है। सूरए बक़रह के आरंभ में ईश्वर कहता हैः सच्चे ईमान वाले वे लोग हैं जो ईश्वर की ओर से जो कुछ आप पर और आपसे पहले के पैग़म्बरों पर उतर चुका है, उस पर ईमान रखते हैं। इसके बाद प्रलय के बारे में कहता है। ये ईमान वाले लोग परलोक पर विश्वास रखते हैं। तो इस प्रकार हम देखते हैं कि ईश्वर ने प्रलय के विषय का उल्लेख विश्वास शब्द के साथ किया है क्योंकि लोगों को पाप से दूर रखने और उन्हें ईश्वरी आदेशों का पालन करने हेतु प्रोत्साहित करने का सबसे बड़ा कारक, प्रलय में ईश्वर की ओर से दंड या पारितोषिक मिलने पर विश्वास है। यदि संसार में किसी के लिए यह स्थिति उत्पन्न हो जाए तो उसके सभी कर्म सुव्यवस्थित एवं लक्ष्यपूर्ण हो जाते हैं और वह ईश्वरीय आदेशों का कण भर भी उल्लंघन नहीं करता। इस स्थिति में वह अपने जीवन की सबसे बड़ी पूंजी को भी ईश्वर के मार्ग में देने के लिए तैयार रहता है ताकि उसे परलोक में कल्याण प्राप्त हो जाए।

     

    जो कोई ईश्वर की ईश्वर की मर्ज़ी के समक्ष नतमस्तक रहता है, उसे इतना उच्च स्थान प्राप्त होता है कि जो उसके लोक-परलोक पर सार्थक प्रभाव डालता है। इस प्रकार का व्यक्ति ईश्वर की इच्छा पर प्रसन्न रहता है और अपने हृदय एवं ज़बान से उसके निर्णयों को स्वीकार करता है तथा कभी भी कोई शिकायत नहीं करता। ईश्वर ने अपने पैग़म्बर हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को संबोधित करते हुए कहा था। हे मूसा! मोमिन व्यक्ति मेरी सबसे प्रिय रचना है और यदि मैं उसे किसी कठिनाई और दुख में ग्रस्त करता हूं तो उसमें उसकी भलाई होती है और यदि मैं उसे किसी बात से रोकता हूं तो उसमें भी उसकी भलाई होती है। मुझे अपने बंदे की भलाई का उससे अधिक ज्ञान है।

     

    एक दिन हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने ईश्वर से कहा कि प्रभुवर! मेरा दिल चाहता है कि तेरे अच्छे बंदों में से किसी को देखूं। ईश्वर ने उनसे कहाः रेगिस्तान में जाओ, वहां एक व्यक्ति खेती कर रहा है, वह मेरे अच्छे बंदों में से है। हज़रत मूसा मरुस्थल में गए और उन्होंने एक व्यक्ति को खेत में काम करते हुए देखा। उन्हें आश्चर्य हुआ कि वह किस प्रकार ऐसे दर्जे पर पहुंच गया है कि ईश्वर ने उसे अपने अच्छे बंदों की श्रेणी में रखा है। उन्होंने ईश्वर के निकटवर्ती फ़रिश्ते हज़रत जिब्रईल से यह बात पूछी। उन्होंने कहा कि ईश्वर अभी इस व्यक्ति को किसी पीड़ा में ग्रस्त करेगा और तुम देखो कि वह क्या करता है। उसी समय कुछ ऐसा हुआ कि एक ही क्षण में उसकी दोनों आंखें चली गईं। वह तुरंत धरती पर बैठ गया और उसने अपना बेलचा अपने सामने रखा और ईश्वर से कहाः प्रभुवर! जब तक तू मुझे आंखों के साथ पसंद करता था, तब तक मैं भी अपनी आंखों को पसंद करता था, अब जबकि तू मुझे अंधा देखना पसंद करता है तो मैं अंधेपन को आंखों से अधिक पसंद करता हूं। यह सुन कर हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की आंखों में आंसू आ गए। वे उस व्यक्ति के पास गए और कहा कि मैं ईश्वर का पैग़म्बर हूं और वह मेरी दुआ को स्वीकार करता है। क्या तुम चाहते हो कि मैं ईश्वर से यह प्रार्थना करूं कि वह तुम्हारी आंखें लौटा दे? उस व्यक्ति ने कहाः नहीं। हज़रत मूसा ने पूछा क्यों? उस व्यक्ति ने कहा कि जो कुछ मेरे पालनहार ने मेरे लिए चुना है उसे मैं अपनी इच्छा से अधिक चाहता हूं।

     

    कार्यक्रम के इस भाग में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के सच्चे उत्तराधिकारी इमाम अली अलैहिस्सलाम द्वारा अपने सुपुत्र इमाम हसन अलैहिस्सलाम को लिखी गई वसीयत के एक भाग के बारे में बात करेंगे। जैसा कि आप जानते हैं, प्रशिक्षण और आत्म निर्माण के लिए सबसे अच्छा समय, जवानी है क्योंकि अभी युवा के हृदय पटल पर बुराइयां एवं अवगुण अंकित नहीं होते और पवित्र प्रवृत्ति का दिया उसके हृदय में बुझा नहीं होता है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम अपने सुपुत्र इमाम हसन अलैहिस्सलाम को लिखी गई वसीयत में कहते हैं। युवा का हृदय उस ख़ाली ज़मीन की भांति होता है जिसमें तुम जो कुछ भी डालो वह स्वीकार कर लेती है अतः इससे पहले कि तुम्हारा हृदय कठोर हो जाए और तुम दूसरों के मामलों में व्यस्त हो जाओ, मैंने तुम्हारी शिक्षा और प्रशिक्षण में जल्दी की ताकि तुम पूरी दृढ़ता व गंभीरता के साथ काम करने लगो और उन बातों का स्वागत करो जिनके इच्छुक अनुभवी लोग रहे हैं ताकि इस प्रकार तुम्हें खोज करने का परिश्रम न करना पड़े और अनुभव की राहों पर न चलना पड़े। तो इससे तुम्हें वह सब कुछ मिल जाएगा जो हमने किया है और जिन बातों को हमने स्पष्ट रूप से देखा है उन्हें तुम भी स्पष्ट रूप से देख लोगे।

     

    जैसा कि हम सब जानते हैं, युवाकाल में चूंकि बुरी आदतें जड़ नहीं पकड़ चुकी होतीं इस लिए उन्हें रोकना अपेक्षाकृत सरल होता है। यही कारण है कि जवानी, बुराइयों, बुरी आदतों और अवगुणों से बचने का अच्छा अवसर है। युवाओं को इस अवसर का सदुपयोग करना चाहिए। इस्लामी क्रांति के संस्थापक स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी युवाकाल में अपने आपको सुधारने की आवश्यकता पर सदैव बल देते थे। उन्होंने अपने एक भाषण में कहा था कि बड़ा जेहाद, वह जेहाद है जो मनुष्य अपनी शैतानी इच्छाओं से संघर्ष के रूप में करता है। आप युवाओं को अभी से यह जेहाद आरंभ कर देना चाहिए। अपनी जवानी की शक्ति को हाथ से न जाने दीजिए क्योंकि जवानी की शक्ति जितनी कम होती जाती है बुराई की जड़ें मनुष्य में उतनी ही अपनी पैठ बनाती चली जाती हैं और जेहाद अधिक कठिन होता चला जाता है। युवा, इस जेहाद में शीघ्र ही विजयी हो सकता है किंतु वृद्ध व्यक्ति इतनी जल्दी सफल नहीं हो पाता। अपने आपको सुधारने का काम, युवा काल से बुढ़ापे तक न पहुंचने दीजिए।

     

    ईरान के प्रख्यात कवि मौलाना रूम इस बात के लिए एक उदाहरण प्रस्तुत करते हैं कि जैसे जैसे मनुष्य की आयु बीतती जाती है, उसकी आदतें अधिक मज़बूत होती जाती हैं क्योंकि मनुष्य के हृदय की मिट्टी, कड़ी और कठोर होती जाती है। वे कहते हैं कि एक व्यक्ति ने लोगों के गुज़रने के स्थान पर कांटे का एक पौधा बोया जिससे लोगों को तकलीफ़ होने लगी। उसने कहा कि अगले वर्ष वह इस पौधे को उखाड़ देगा। अगले वर्ष उसने यह काम उसके अगले वर्ष पर टाल दिया और फिर आगे भी ऐसा ही करता रहा। कांटे का पौधा प्रति वर्ष अधिक मज़बूत होता गया जबकि वह व्यक्ति हर बीतते वर्ष के साथ दुर्बल होता गया, यहां तक कि वह फिर कभी भी उस पौधे को वहां से उखाड़ नहीं पाया। मनुष्य की स्थिति भी ऐसी ही है। यही कारण है कि हज़रत अली अलैहिस्सलाम अपने सुपुत्र इमाम हसन अलैहिस्सलाम से कहते हैं कि इससे पूर्व कि तुम्हारे हृदय की मिट्टी कठोर हो, मैंने अवसर से लाभ उठाया और उसमें शिष्टाचार का पौधा बो दिया क्योंकि यदि अनुचित आंतरिक इच्छाएं मनुष्य के हृदय में घर कर जाएं और मज़बूत हो जाएं तो फिर वे मनुष्य की लगाम अपने हाथ में ले लेती हैं और उसे जहां चाहें मोड़ देती हैं।