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    रमज़ानुल मुबारक – 2013 – (24)

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    पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम का कथन हैः ईश्वर कहता है कि बंदों के सभी भले कर्मों पर दस से लेकर सात सौ गुना अधिक तक पारितोषिक है सिवाए रोज़े के कि उसका पारितोषिक मैं स्वयं दूंगा।

    पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के पौत्र हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम अलैहिस्सलाम मकारेमुल अख़लाक़ नामक प्रख्यात दुआ के एक अन्य अंश में कहते हैः प्रभुवर! मुझे डटे रहने वाले लोगों में शामिल कर। डटे रहने के लिए अरबी भाषा में सेदाद शब्द का प्रयोग होता है। जब कोई व्यक्ति अपनी कथनी और करनी में सत्य और सच्चाई के आधार पर क़दम बढ़ाएऔर इसी प्रकार प्रयास करे कि अपने व्यवहार और बात में सदैव अटल रहे और उस मार्ग से किसी प्रकार भी डिगे नहीं उसे सेदाद वाला कहा जाता है। क़ुरआने मजीद ने एकेश्वरवाद के संबंध में अटल रहने के बारे में सूरए फ़ोस्सेलत की तीसवीं आयत में कहता है। जिन लोगों ने कहा कि हमारा पालनहार अल्लाह है। फिर अपने इस कथन पर दृढ़तापूर्वक जमे रहे उन पर फ़रिश्ते उतरते हैं  (और उन्हें शुभ सूचना देते हैं) कि न तो डरो और न ही दुखी हो, और उस स्वर्ग की शुभ सूचना लो जिसका तुमसे वादा किया गया है।

    वस्तुतः सेदाद वाले या सत्य पर अटल रहने वाले लोग वे हैं जिनमें दो मूल विशेषताएं पाई जाती हों। एक सत्य मार्ग पर चलना और दूसरे उस पर डटे रहना। अलबत्ता यदि सत्य के मार्ग पर चलने में समस्याएं उत्पन्न न हों और जानी व माली ख़तरे सामने न आएं तो उसे जारी रखना कोई कठिन काम नहीं है किंतु यदि सत्य के मार्ग पर चलने में कठिनाइयां, समस्याएं व ख़तरे हों तो फिर उस पर टिके रहना बहुत कठिन हो जाता है और यह हर किसी के बस की बात नहीं है। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम तथा उनके परिजन, ईश्वर की ओर से चुने गए पथप्रदर्शक हैं जो व्यवहारिक रूप से बिना किसी शर्त के सत्य के समक्ष नतमस्तक रहते थे और उससे हट कर कोई क़दम नहीं उठाते थे। इस मार्ग में उन्होंने मृत्यु और शहादत तक प्रतिरोध किया। आशूरा के दिन इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके साथियों की शहादत की घटना, अत्यंत जटिल व कड़ीपरिस्थितियों में भी सत्य को ऊंचा रखने के मार्ग में प्रतिरोध का एक उच्च उदाहरण है। इस प्रकार हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम अलैहिस्सलाम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि प्रभुवर! मुझे इस प्रकार से बना दे कि मैं सत्य के मार्ग में और तेरे पवित्र आदेशों के पालन के लिए उस प्रकार से डटा रह सकूं जिस प्रकार से अटल रहना चाहिए।

    हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के काल में बनी इस्राईल में एक ज़बरदस्त अकाल पड़ा। लोग उनके पास आए और कहने लगे कि आप नमाज़ पढ़ कर ईश्वर से हमारे लिए प्रार्थन कीजिए कि वर्षा आ जाए। वे उठे और बड़ी संख्या में लोगों के साथ प्रार्थना के लिए बाहर निकले। फिर वे एक स्थान पर पहुंचे और प्रार्थना की किंतु उन्होंने जितनी भी दुआ की, बारिश नहीं आई। हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने ईश्वर से कहाः प्रभुवर! वर्षा क्यों नहीं आ रही है, क्या तेरे निकट मेरा जो स्थान था वह अब नहीं रहा? ईश्वर की ओर से कहा गयाः नहीं मूसा! ऐसा नहीं है बल्कि तुम लोगों के बीच एक ऐसा व्यक्ति है जो चालीस वर्षों से मेरी अवज्ञा करते हुए पाप कर रहा है, उससे कहो कि भीड़ से अलग हो जाए तो मैं तुरंत वर्षा भेज दूंगा। हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने ऊंची आवाज़ से कहा, जो व्यक्ति चालीस वर्षों से ईश्वर की अवज्ञा कर रहा है, वह उठ कर हमारे बीच से निकल जाए क्योंकि उसी के कारण ईश्वर ने अपनी दया के द्वार बंद कर दिए हैं और वर्षा नहीं भेज रहा है। उस पापी व्यक्ति ने इधर-उधर देखा, कोई भी भीड़ में से नहीं उठा, वह समझ गया कि उसे ही लोगों के बीच से उठ कर जाना होगा। उसने अपने आपसे कहा कि क्या करूं, यदि में उठ कर जाता हूं तो सभी लोग मुझे देख लेंगे और मैं अपमानित हो जाऊंगा और यदि नहीं जाता हूं तो ईश्वर बारिश नहीं भेजेगा। यह सोचते सोचते उसका दिल भर आया और उसने सच्चे मन से तौबा की और अपने किए पर पछताने लगा। फिर उसने आकाश की ओर देखा और मन ही मन कहाः प्रभुवर! इतने सारे लोगों के बीच मुझे अपमानित होने से बचा ले। कुछ ही क्षणों के बाद बादल उमड़ आए और ऐसी बारिश हुई कि हर स्थान पर जल-थल हो गया। हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने ईश्वर से कहाः प्रभुवर! कोई भी उठ कर हमारे बीच से नहीं गया तो फिर किस प्रकार तूने वर्षा भेज दी? ईश्वर की ओर से कहा गयाः मैंने वर्षा उस व्यक्ति के कारण भेजी है जिसे मैंने भीड़ से अलग होने के लिए कहा था किंतु उसने सच्चे मन से तौबा कर ली है। हज़रत मूसा ने कहा कि प्रभुवर! मुझे उस व्यक्ति के दर्शन करा दे। ईश्वर ने कहाः हे मूसा! जब वह पाप कर रहा था तब तो मैंने उसे अपमानित नहीं किया तो अब जब वह तौबा कर चुका है तो मैं उसे अपमानित कर दूं?

    पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के उत्तराधिकारी हज़रत अली अलैहिस्सलाम द्वारा अपने बड़े पुत्र इमाम हसन अलैहिस्सलाम को की गई वसीयत के एक भाग पर दृष्टि डालते हैं। वे कहते हैं। हे मेरे बेटे! क्रोध को पी जाओ कि मैंने अंजाम की दृष्टि से इससे मीठा कोई घूंट नहीं देखा और न ही अंत की दृष्टि से इससे अधिक स्वादिष्ट चीज़ देखी। जो तुम्हारे साथ कठोरता करे उसके साथ तुम नर्मी का व्यवहार करो कि इससे हो सकता है कि वह भी तुम्हारे प्रति नर्म हो जाए और अपने शत्रु पर उपकार करो कि यह दोनों प्रकार की विजय में अधिक मीठी है। और यदि तुम अपने भाई से संबंध तोड़ना चाहो तो इतनी गुंजाइश छोड़ दो कि यदि कभी तुम फिर से संबंध जोड़ना चाहो तो उससे तुम्हें सहायता मिले। और जो तुम्हारे बारे में अच्छी सोच रखे, उसकी सोच को सच कर दिखाओ।

    हज़रत अली अलैहिस्सलाम के अनुसार क्रोध को पी जाने का परिणाम अत्यंत मीठा होता है क्योंकि वह मनुष्य को पछतावे और बहुत से नुक़सानों सेसुरक्षित रखता है। पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के पौत्र इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम कहते हैं कि मेरे पिता इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम ने मुझे इस प्रकार नसीहत की कि हे मेरे पुत्र! क्रोध के समय संयम से अधिक कोई भी वस्तु आंखों की रौशनी नहीं बढ़ाएगी और मैं इस बात को पसंद नहीं करता कि क्रोध के समय अपने आपको अपमानित करूं चाहे इसके बदले में मुझे बेहिसाब धन ही क्यों न मिले। हज़रत अली अलैहिस्सलाम की एक अन्य वसीयत यह है कि जिसने तुम्हारे साथ कड़ाई की है तुम उसके साथ नर्मी का व्यवहार करो। बहुत से लोग होते हैं जो क्रोध के समय हिंसा का मार्ग अपनाते हैं और कभी कभी ख़तरनाक मोड़ तक भी पहुंच जाते हैं किंतु यदि मनुष्य अपने आप पर नियंत्रण रखे, संकल्प के साथ स्वयं को क्रोध के मुक़ाबले में संयम से काम लेने के लिए प्रतिबद्ध कर ले तथा हिंसा के बजाए नर्मी से काम ले तो फिर न केवल यह कि हिंसा समाप्त हो जाएगी बल्कि उसके स्थान पर प्रेम व मित्रता प्रचलित होगी।

    इमाम अलैहिस्सलाम अपनी वसीयत में आगे चल कर कहते हैं कि तुम अपने शत्रु को या तो कड़ाई व हिंसा के माध्यम से पराजित कर सकते हो या फिर प्रेम व मित्रता द्वारा और निश्चित रूप से दूसरा मार्ग अधिक बेहतर है और इसका परिणाम ज़्यादा अच्छा होगा क्योंकि भविष्य में तुम्हें युद्ध और हिंसा का भय नहीं होगा जबकि यदि तुम हिंसा के माध्यम से उसे पराजित करोगे तो फिर तुम्हें अपने शत्रु की ओर से हर समय एक नई हिंसा की आशंका रहेगी। दूसरे शब्दों में पहली शैली में शत्रु, यथावत शत्रु बना रहेगा जबकि दूसरी शैली में शत्रु, मित्र में परिवर्तित हो जाएगा। अलबत्ता कुछ अवसरों पर शत्रु के साथ टकराव के अतिरिक्ति कोई मार्ग नहीं होता।

    हज़रत अली अलैहिस्सलाम इसी प्रकार कहते हैं। यदि तुम बंधुत्व व मित्रता के रिश्ते को समाप्त करना चाहो को मेल-मिलाप के लिए थोड़ी बहुत गुंजाइश छोड़ दो। यह बात निश्चित है कि मनुष्य को मित्रता में संतुलन बाक़ी रखना चाहिए और अपने सभी रहस्यों को मित्र के सामने नहीं खोल देना चाहिए क्योंकि यदि किसी दिन वह मित्र उसका शत्रु बन गया तो फिर उसे बहुत घाटा उठाना पड़ेगा। इसी प्रकार यदि मनुष्य किसी से दोस्ती के रिश्ते को समाप्त करे तो उसे मित्रता बहाल करने की गुंजाइश अवश्य छोड़नी चाहिए क्योंकि इस बात की संभावना होती है कि वह व्यक्ति अपने ग़लत काम पर पछता कर पुनः मित्र बनना चाहे।

    हज़रत अली अलैहिस्सलाम का इसी प्रकार का एक अन्य कथन भी है जिसमें वे कहते हैं कि अपने मित्र के साथ एक सीमा तक मित्रता करो कि शायद वह किसी दिन तुम्हारा शत्रु बन जाए और अपने शत्रु के साथ एक सीमा तक दुश्मनी करो कि शायद वह किसी दिन तुम्हारा मित्र बन जाए और तुम्हें उसके विरुद्ध किए गए अपने कार्यों पर पछतावा होने लगे। वसीयत के इस भाग के अंत में हज़रत अली अलैहिस्सलाम अपने पुत्र इमाम हसन अलैहिस्सलाम से कहते हैं कि जो कोई तुम्हारे बारे में अच्छे विचार रखता है उसके विचारों को सच कर दिखाओ। इस तत्वदर्शितापूर्ण वाक्य का तात्पर्य है कि यदि कोई व्यक्ति तुम्हें दानी समझ कर तुमसे कोई चीज़ मांगे तो उसकी सहायता करो ताकि तुम्हारे बारे में उसका विचार सही सिद्ध हो जाए। ऐसा बहुत होता है कि कोई व्यक्ति किसी के पास जाता है और कहता है कि मेरी अमुक समस्या है और मुझे लगता है कि यह समस्या केवल तुम ही दूर कर सकते हो। इस प्रकार के लोगों की समस्याओं के समाधान का प्रयास करना चाहिए और उनके निवेदन को ठुकरा कर अपने बारे में उनके अच्छेविचार को बुरे विचार में परिवर्तित नहीं करना चाहिए।