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    रमज़ानुल मुबारक – 2013 – (25)

    रमज़ानुल मुबारक – 2013 – (25)
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    हज़रत इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम दुआ के इस भाग में कहते हैं” पालनहार! यदि मैं दुःखी होता हूं तो तू मेरा आश्रय है और यदि मैं वंचित होता हूं तू मेरी आशा व भरोसा है”

    इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम ने अपनी दुआ में उद्दा शब्द का प्रयोग किया है जिसका अर्थ वह धन व हथियार होता है जिसे व्यक्ति कठिन समय का मुकाबला करने के लिए तैयार करता है। दुःखी होना भी वह स्थिति है जो संकटों और समस्याओं का सामना होने के कारण मनुष्य में उत्पन्न होती है। यह स्थिति केवल सामान्य लोगों से विशेष नहीं है बल्कि महान व्यक्ति, ईश्वरीय दूत और पैग़म्बर भी संकटों व समस्याओं के समय दुःखी होते हैं और यह बात पवित्र क़ुरआन की कुछ आयतों एवं पैग़म्बरे इस्लाम तथा उनके पवित्र कथनों में आयी है। उदाहरण स्वरूप पवित्र कुरआन के सूरये युसूफ में हज़रत याक़ूब पैग़म्बर के दुःखी होने की बात की गयी है। हज़रत याक़ूब पैग़म्बर अपने बेटे हज़रत युसूफ के वियोग में, जो अपने समय के पैग़म्बर थे, इतना दुःखी हुए और रोये कि नेत्रहीन हो गये।

     

    इस आधार पर दुःखी होना हर मनुष्य के लिए एक स्वाभाविक बात सी है और समस्त लोग यहां तक कि पैग़म्बर और ईश्वरीय दूत भी दुःखी होते हैं। अंतर केवल इतना है कि जब साधारण व्यक्तियों को दुःखों व समस्याओं का सामना होता है तो संभव है कि उनकी ज़बान से अप्रिय व अनुचित शब्द निकल आयें और वे महान ईश्वर के निर्णय पर आपत्ति जतायें परंतु ईश्वरीय दूत और ईमानदार व्यक्ति सदैव महान ईश्वर के निर्णय के प्रति प्रसन्न रहते हैं और वे न केवल अपनी ज़बान पर अनुचित शब्द नहीं लाते बल्कि जैसाकि हज़रत इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम ने कहा है कि संकटों व कठिनाइयों में महान ईश्वर की शरण मांगते हैं। वे महान ईश्वर पर ईमान और उससे सहायता मांग कर स्वयं को शांत व संतुष्ट करते हैं और स्वयं को दुःखों से छुटकारा दिलाते हैं।

     

    मुसलमानों द्वारा एक दूसरे की सहायता किये जाने को ईश्वरीय धर्म इस्लाम में बहुत बल दिया गया है। हर मुसलमान का चाहे वह जिस पद व स्थान पर हो, दायित्व है कि वह अपने दूसरे मुसलमान भाई की आवश्यकताओं पर ध्यान दे और उनकी पूर्ति में यथासंभव उसकी सहायता करे परंतु कुछ अवसरों पर संभव है कि मुसलमान इस दायित्व का निर्वाह न करें और अपने मुसलमान भाई की सहायता न करें। हज़रत इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम मुसलमान भाइयों की सहायताओं से वंचित होने के संबंध में महान ईश्वर की बारगाह में कहते हैं” हे हमारे पालनहार! यदि मैं मुसलमान भाइयों की सहायता से वंचित हो जाता हूं तो तेरी ओर आता हूं और मेरी आशा व भरोसा तू है। ईमानदार लोग निराशा के समय सर्व समर्थ व महान ईश्वर के समक्ष आवश्यकता का हाथ फैलाते हैं और सच्चे हृदय से अपनी कठिनाइयों का समाधान उससे चाहते हैं कि महान ईश्वर अपनी असीम कृपा व दया से उनकी दुआओं को एहसान जताये बिना स्वीकार करता है।

     

    ईश्वरीय नियम के अनुसार समस्त लोगों की परीक्षा ली जाती है ताकि वे प्रतिरोधक एवं मज़बूत हो जायें और उनकी क्षमताएं व योग्यताएं विकसित हो सकें। स्पष्ट है कि कोई भी व्यक्ति ईश्वरीय परीक्षाओं से सफल होकर मुक्ति व कल्याण तक पहुंच सकता है और धैर्य व प्रतिरोध का प्रयोग कठिनाइयों से मुकाबले के लिए हथियार के रूप में कर सकता है।

    धैर्य व प्रतिरोध के विषय से संबंधित अब आपको एक कहानी सुनाते हैं।

    एक प्रतिभाशाली गुरू बड़ी खुशी व प्रसन्नता के साथ अपने परिवार में रह रहा था। उसके दो बच्चे और एक बहुत ही वफादार पत्नी थी। एक समय उसे कोई काम पेश आ गया जिसके कारण उसे कई दिनों तक अपने परिवार से दूर रहने पर विवश होना पड़ा। इस अवधि में एक घटना पेश आई जिसमें उसके दोनों बच्चों की मृत्यु हो गयी। बच्चों के मरने से जो दुःख हुआ उसे अकेले मां ने सहा परंतु चूंकि वह महिला ईमानदार थी और महान ईश्वर पर उसका गूढ़ ईमान व विश्वास था इसलिए उसने इस दुःख का सहन बड़ी बहादुरी व साहस से किया परंतु किस तरह वह इस हृदय विदारक समाचार को अपने पति को देती? इसे लेकर वह काफी परेशान थी। उस महिला से जो कुछ हो सकता था वह यह था कि महान ईश्वर से दुआ करे कि वह उसे बेहरतीन मार्ग दिखाये। जिस रात को तय था कि उसका पति घर लौट आयेगा उसने उस रात भी दुआ की और अंततः ऊपर वाले ने  उसकी दुआ सुन ली।

     

    अगले दिन प्रतिभाशाली गुरू घर लौटा और उसने अपनी पत्नी से बच्चों के बारे में पूछा। पत्नी ने उससे कहा अभी चिंता मत करो और स्नान करके विश्राम करो। थोड़ी देर बाद पति-पत्नी दोनों भोजन करने के लिए बैठे। पत्नी ने अपने पति से यात्रा के बारे में पूछा। पति ने उत्तर दिया कि ईश्वर की कृपा से यात्रा ठीक- ठाक रही। इसके बाद उसने फिर बच्चों को पूछा। इस पर पत्नी ने विचित्र दशा में कहा बच्चों की चिंता मत करो, बाद में उनके बारे में बात करूंगी मुझे एक कठिन समस्या का सामना है जिसके समाधान में मुझे तुम्हारी सहायता की आवश्कता है। प्रतिभाशाली गुरू ने परेशान होकर कहा क्या हुआ है? बताओ तो सही, मुझे लगा कि तुम परेशान हो बताओ किस सोच में डूबी हो, मुझे पूरा विश्वास है कि ईश्वर की कृपा से हम दोनों मिलकर बड़ी से बड़ी समस्याओं का समाधान कर सकते हैं।

    इस पर धर्म परायण पत्नी ने कहा जब तुम नहीं थे तो एक मित्र हमारे पास आया, उसने दो बहुत ही मूल्यवान रत्न हमारे पास अमानत के रूप रख दिये ताकि हम उसकी सुरक्षा करें। रत्न बहुत ही सुन्दर हैं! अब तक मैंने इतनी सुन्दर चीज़ नहीं देखा है। अब वह मित्र अपने सुन्दर रत्नों को ले जाने के लिए आया है मैं इन रत्नों को उसे नहीं दे सकती। उन्हें बहुत चाहती हूं। मैं क्या करूं? इस पर मेधावी गुरू ने कहा मैं तुम्हारे व्यवहार को नहीं समझ रहा हूं! तुम कभी भी इस प्रकार की महिला नहीं थी, पत्नी ने कहा आखिर मैंने कभी भी इस प्रकार का सुन्दर रत्न नहीं देखा था! उससे अलग होना मेरे लिए बहुत कठिन है। प्रतिभाशाली गुरू ने बड़ी दृढ़ता के साथ कहा किसी को भी उस चीज़ से दिल नहीं लगाना चाहिये जो उसकी नहीं है। इन रत्नों को अपने पास रख लेने का अर्थ उन्हें चूरा लेना है। तो तुम्हें इन इत्नों को वापस देना चाहिये और इसके बाद मैं तुम्हारी सहायता करूंगा ताकि तुम इनके चले जाने का दुःख सहन कर सको। पत्नी ने कहा तुम कह रहे हो तो रन्नों को वापस कर देती हूं किन्तु जान लो कि इससे पहले रत्नों को वापस लिया जा चुका है। यह मूल्यवान रत्न हमारे दो बच्चे थे। ईश्वर ने इन्हें अमानत के रूप में हमें दिया था। जब तुम यात्रा पर थे तो उसने इन बच्चों को वापस ले लिया। मेधावी व प्रतिभाशाली गुरू सारा मामला समझ गया। उसके बाद ईमानदार पति- पत्नी दोनों ने मिलकर अपने बच्चों के मरने पर धैर्य से काम लेने का प्रयास किया।

    इस भाग में हम नहजुल बलाग़ा नामक किताब में हज़रत अली अलैहिस्सलाम के ३१वें पत्र के कुछ अंशों का उल्लेख कर रहे हैं। इस पत्र में आया है” हे मेरे बेटे जान लो कि आजीविका दो प्रकार की है एक वह है जिसके लिए तुम प्रयास करते हो और दूसरी वह है जो तुम्हारे पास आती है चाहे उसके लिए प्रयास भी न करो। आवश्यकता के समय दूसरों के सामने झुकना कितना बुरा है और आवश्यकता न होने व समृद्धि के समय दूसरों पर अत्याचार करना कितना बुरा है”

     

    उस आजीविका से हज़रत अली अलैहिस्सलाम का तात्पर्य, जिसके लिए मनुष्य को प्रयास करना पड़ता है, दिनचर्या के काम हैं जैसे खेताबाड़ी,व्यापार और इस जैसे कार्य और वह आजीविका जो मनुष्य के पास आती है चाहे उसके लिए वह प्रयास भी न करे जैसे उपहार, पिता के मरने पर मिलने वाला धन, व्यापार और इसी तरह से अप्रत्याशित रूप से होने वाली दूसरी आमदनी। इस आधार पर यदि पहले प्रकार की आजीविका कम हो जाये तो महान ईश्वर की कृपा से निराश नहीं होना चाहिये और अधिक प्रयास करना चाहिये तथा अप्रत्याशित आजीविका की प्रतीक्षा व आशा में रहना चाहिये। जब मनुष्य इस ब्रह्मांड में आजीविका के दूसरे प्रकार को देखता है तो यह आशा उसके हृदय में अधिक मज़बूत व प्रबल हो जाती है। महान ईश्वर पवित्र क़ुरआन के सूरये हूद की ६ठीं आयत में कहता है” ज़मीन पर कोई रेंगने वाला नहीं है किन्तु यह कि उसकी आजीविका ईश्वर पर है और वह उनके रहने एवं घुमने फिरने का स्थान जानता है। ये सब बातें किताब में लिखी हुई हैं”

    जो व्यक्ति ईश्वरीय भय रखता हो और अवैध रूप से आजीविका कमाने से बचता हो तो महान ईश्वर ने विशेषकर इस प्रकार के व्यक्तियों की आजीविका को अधिक करने की शुभ सूचना दी है। दूसरी ओर हम देखते हैं कि इस ब्रह्मांड में बहुत सारी अनुकंपायें मौजूद हैं और जीवन के लिए वह बहुत आवश्यक हैं और ये अनुकंपायें मोमिन, काफिर सबको प्राप्त हैं जैसे सूर्य का प्रकाश, ज़मीन की विभूतियां, पानी और आक्सीजन आदि। ये वे आजीविका हैं जो मनुष्य के पास आती हैं चाहे मनुष्य उनके पास जाये ही नहीं।

     

    हज़रत अली अलैहिस्सलाम का एक मूल्यवान कथन व लाभप्रद नसीहत यह है “आवश्कता के समय दूसरों के सामने झुकना कितना बुरा है और समृद्धि व आवश्यकता न होने के समय दूसरों पर अत्याचार करना कितना बुरा है”

    इस कथन में उन व्यक्तियों की ओर संकेत किया गया है जो आवश्यकता के समय इनके –उनके सामने इस प्रकार गिर कर पेश आते हैं कि अपने पूरे व्यक्तित्व पर ही प्रश्न चिन्ह लगा देते हैं और समृद्धि की स्थिति में जब कोई उनके सामने हाथ फैलाता है और उनके पास आता है तो वे उसे हिंसा व दुर्व्यवहार के साथ भगा देते हैं। नैतिक दृष्टि से दोनों बुरी व निंदनीय बातें हैं। आवश्यकता के समय अपने व्यक्तित्व का ध्यान रखना चाहिये और समृद्धि के समय परोपकार में संकोच से काम नहीं लेना चाहिये। हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने जिस विन्रमता की निंदा की है वह अपमानित ढंग से दूसरों के सामने पेश आना है और अत्याचार से तात्पर्य आवश्यकता रखने वालों के साथ अपमान से पेश आना है। इस आधार पर मनुष्य जब सक्षम व समृद्ध हो तो उसे अहंकारी नहीं होना चाहिये और जब निर्धन हो जाये तो उसे पूरी दुनिया की उपेक्षा करके सर्व समर्थ व महान ईश्वर से आशा रखनी चाहिये तथा उसी से सहायता मांगनी चाहिये।