islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. रमज़ानुल मुबारक – 2013 – (3)

    रमज़ानुल मुबारक – 2013 – (3)

    रमज़ानुल मुबारक – 2013 – (3)
    Rate this post

    रमज़ान, वंदना का बेहतरीन मौसम है। ईश्वर की उपासना और उसके सामिप्य की प्राप्ति के लिए उचित अवसर है। बहुत से लोग इस वास्तविकता को भलिभांति समझते हैं कि पवित्र रमज़ान के बिना जीवन खोखला है। यदि रमज़ान जैसा आध्यात्मिक अवसर न हो तो हमारे मन पापों के कारण काले हो जाएंगे। किन्तु पवित्र रमज़ान हमारे मन की गलियों से गुज़रता है तो पापों से उजड़े हुए मन के उपवन को फिर से हरा-भरा कर जाता है। रमज़ान हमसे कहता है कि एक मेहरबान मित्र की भांति हमारे जीवन के हर क्षण पर नज़र रखता है। आइये एक बार फिर इस मूल्यवान अवसर से लाभ उठाते हुए अपने मन बंद दरीचों को खोलें।

     

    हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम की एक प्रसिद्ध दुआ मकारेमुल इख़लाक़ है। इसका एक टुकड़ा हैः अल्लाहुम्मा वन्तहि बेअमली इला अहसनिल आमाल अर्थातः हे प्रभु हमारे कर्म का अंत बेहतरीन व श्रेष्ठ कर्म हों। इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम मकारेमुल इख़लाक़ नामक इस दुआ में ईश्वर से यह प्रार्थना करते हैं कि मेरे कर्म का अंत बेहतरीन व श्रेष्ठ कर्म हों। जिस समय इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम कहते हैः अहसनिल आमाल तो इस टुकड़े से स्पष्ट होता है कि लोगों के कर्म की उनकी नियत के अनुसार दर्जे रखते हैं और इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम बेहतरीन व श्रेष्ठ दर्जे की विनती करते हैं। सद्कर्म के संबंध में एक महत्वपूर्ण बिन्दु यह है कि सद्कर्म को इस्लामी परंपरा और पवित्र शरीया के कार्यक्रमानुसार होना चाहिए और यदि नियत, बातचीत और व्यवहार की दृष्टि से कर्म पैग़म्बरे इस्लाम की परंपरा व शरीया के अनुसार न हो तो उसे सद्कर्म नहीं कहा जा सकता। इस संदर्भ में पैग़म्बरे इस्लाम के एक कथन से यह बात स्पष्ट हो जाती है। पैग़म्बरे इस्लाम कहते हैः कोई बात बिना अमल के स्वीकार्य नहीं होगी और अमल व बातचीत बिना नियत के स्वीकार्य नहीं होगी और बातचीत, अमल और नियत उस समय तक स्वीकार्य नहीं होगी जब तक इस्लामी परंपरा के अनुसार न हो।

     

    इसलिए यह बात समझनी चाहिए कि सद्कर्म, ज़बान, व्यवहार और नियत पर निर्भर है। ईश्वर मुल्म नामक सूरे की आयत क्रमांक 2 में कह रहा हैः ईश्वर ने मृत्यु और जीवन को पैदा किया ताकि तुम्हारी परीक्षा ले कि तुममे से कौन कर्म की दृष्टि से कौन सबसे अच्छा है।

     

    इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम इस आयत के संदर्भ में कहते हैः ईश्वर जो इस आयत में सबसे अच्छा कर्म कह रहा है उससे तात्पर्य कर्म की मात्रा नहीं बल्कि यह तात्पर्य है कि ईश्वर तुम्हारी परीक्षा लेना चाहता है ताकि पता चल जाए कि तुममे से किसका चरित्र वास्तविकता के अधिक निकट है। ऐसे बहुत लोग हैं जिनके कर्म की मात्रा अधिक किन्तु आत्मज्ञान कम है इसलिए कर्म का बदला भी उन्हें कम मिलता है। इसके विपरीत कुछ लोगों के कर्म की मात्रा कम किन्तु उनके पास वास्तविक ईमान और युद्ध नियत है और वे इस्लामी शरीया के नियमों से परिचित हैं, उनका कर्म कम होने के बावजूद भी मूल्यवान है।

     

    कर्म के मूल्य बारे में पैग़म्बरे इस्लाम का एक कथन हैः तुममे से हर एक के तीन मित्र होते हैं। एक वह दोस्त जो तुम्हारी इच्छाओं को परा करता है वह तुम्हारी धन-संपत्ति है। दूसरा दोस्त वह जो तुम्हारे साथ रहता है यहां तक कि मरने के बाद तुम्हें क़ब्र में दफ़्न करके अलग हो जाता है, न तुम्हें कुछ देता है और न तुम्हारे साथ जाता है वह तुम्हारा परिवार है किन्तु तीसरा मित्र जो व्यक्ति के साथ रहता है वह उसका कर्म है। उसके बाद पैग़म्बरे इस्लाम ने कहाः कर्म कहता हैः ईश्वर की सौगन्ध जहां जाओगे तुम्हारे साथ आउंगा और तुमसे कदापि जुदा नहीं हूंगा। चाहे सद्कर्म हो या बुरा कर्म हो। इसलिए हमें यह पता होना चाहिए कि हमारे कर्म हमसे जुदा नहीं होंगे अब यदि अच्छे हुए तो हमें स्वर्ग ले जाएंगे और यदि बुरे होंगे तो नरक में ले जाएंगे।  एक बार फिर इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम की मकारेमुल इख़लाक़ नामक दुआ का यह टुकड़ा पढ़ेः अल्लाहुम्मा वन्तहि बेअमली इला अहसनिल आमाल अर्थातः हे प्रभु हमारे कर्म का अंत बेहतरीन व श्रेष्ठ कर्म हों।

     

    सहनशीलता मनुष्य के लिए बहुत सी सफलताओं की कुन्जी के समान है। चूंकि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और अपने माहौल और दूसरे मनुष्य के साथ संपर्क में रहता है, इसलिए न चाहते हुए भी जीवन में बहुत सी समस्याओं का उसे सामना करना पड़ता है। ऐसी स्थिति में मनुष्य को धैर्य और सहनशीलता का साथ नहीं छोड़ना चाहिए ताकि शांत रह कर सही उपाय से सही मार्ग का चयन करे। सहनशीलता उन महत्वपूर्ण विशेषताओं में है जो महापुरुषों एवं ईश्वरीय दूतों में पायी जाती थी और वे अपने इस गुण द्वारा बहुत से लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने में सफल रहे।

     

    अरवा बिन मोहम्मद एक भले व्यक्ति थे। एक दिन वह एक सभा में लोगों से बात कर रहे थे कि अचानक एक व्यक्ति खड़ा हुआ और उसने उन्हें गाली दी। अरवा का चेहरा क्रोध से लाल हो गया किन्तु उन्होंने उस व्यक्ति का जवाब बुरी बात से नहीं दिया बल्कि पूरी सहनशीलता के साथ सभा से उठ कर चल दिए। फिर उन्होंने वज़ू किया और फिर सभा में लौट आए। अब उनका मन शांत हो चुका था और क्रोध व आक्रोश का कोई लक्षण उनके अस्तित्व से नहीं झलक रहा था। एक बार फिर उन्होंने सभा को संबोधित करते हुए कहाः मेरे एक पूर्वज ने पैग़म्बरे इस्लाम का एक कथन कहा हैः क्रोध, शैतान का काम है। शैतान आग से पैदा किया गया है और आग पानी से बुझती है इसलिए जब क्रोध आए वज़ू कर लो।

     

    इस भाग में हज़रत अली अलैहिस्सलाम की एक और वसीयत पेश कर रहे हैं। हज़रत अली अलैहिस्सलाम अपने बेटे को सामाजिक जीवन में अन्तरात्मा को मापदंड बनाने की वसीयत करते हुए कहते हैः मेरे बेटे! अपने और दूसरों के बीच स्वंय को मानदंड बनाओ। तो दूसरों के लिए वह पसंद करो जो अपने लिए पसंद करते हो। और दूसरों के लिए वह पसंद न करो जो अपने लिए पसंद नहीं करते। दूसरों पर अत्याचार मत करो जिस प्रकार तुम स्वंय पर दूसरों का अत्याचार पसंद नहीं करते। भलाई करो जिस प्रकार तुम यह  चाहते हो कि तुम्हारे साथ भलाई की जाए। जो अवगुण दूसरों में नापंसद है अगर ख़ुद में तो उसे बुरा समझो। जो नहीं जानते उस बारे में मत बोलो। जो बात अपने बारे में सुनना पसंद नहीं करते वह बात दूसरों के बारे में मत कहो।

     

    हज़रत अली अलैहिस्सलाम अपने  बेटे को नसीहत करते हैः दूसरों के बारे में कोई राय बनाने से पहले स्वंय को दृष्टिगत रखो और इस दृष्टिकोण के साथ जो कुछ दूसरों के लिए चाहते हो वही अपने लिए भी चाहो और जो कुछ दूसरों के लिए नहीं चाहते वही अपने लिए भी मत चाहो ताकि इस प्रकार तुम्हारे और अन्य लोगों के बीच एक प्रकार की समरस्ता बन जाए। हज़रत अली अलैहिस्सलाम की अनुशंसा की अनदेखी का परिणाम मैत्रिपूर्ण संबंधों में ख़राबी के सिवा और कुछ नहीं निकलेगा। जबकि अन्तरात्मा की बात को सुनना गहरी मित्रता और स्वस्थ सामाजिक संबंध की गरैंटी है। यदि समाज में सब लोग अन्तरात्मा को आधार बनाकर एक दूसरे से व्यवहार करें और दूसरों के अधिकारों का सम्मान करें तो सामाजिक संबंध अधिक सुदृढ़ होंगे और समाज में शांति व सुरक्षा बढ़ेगी।

     

    हज़रत अली अलैहिस्सला मन को सीमित्ताओं व मानसिक समस्याओं से स्वतंत्र करने के लिए यह अनुशंसा कर रहे हैं कि अत्याचार मत करो जिस प्रकार तुम स्वंय पर दूसरों के अत्याचार पसंद नहीं करते। जिस प्रकार तुम यह चाहते हो कि दूसरे तुम्हारे साथ प्रेमपूर्ण व्यवहार करें ताकि दूसरों के साथ मित्रता की दृष्टि से संबंध रख सको उसी भावना के साथ ख़ुद भी दूसरों के साथ व्यवहार करो ताकि लोग देखें कि तुम्हारे मन में दूसरों के संबंध में तनिक भी द्वेष नहीं है।

     

    अब अगर दूसरों के मन में अपने लिए स्थान चाहते हो तो जो कुछ अपने लिए नापसंद करते और जिस अप्रिय चीज़ में नहीं फंसना चाहते तो दूसरों के लिए भी वही चीज़ नापसन्द करो क्योंकि प्रेम मनुष्य की वह खोई हुयी धरोहर है जिसकी उसे तलाश है और वह दूसरों के बारे में दुर्भावना से पनप नहीं सकती। यहां तक कि मोमिन का आपस में एक दूसरों को भलाई की ओर बुलाना और बुराई से रोकना भी एक दूसरे के प्रति मित्रता को प्रमाढ़ करने के लिए है ताकि उनके बीच जो समान तत्व है उसे अधिक सुदृढ़ किया जा सके। इसलिए हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने अनुशंसा की है कि अपनी प्रसन्नता व संतुष्टि के तत्वों को पहचानो फिर दूसरों में वही प्रसन्नता पैदा कर उन्हें ख़ुशी का उपहार दो। यह ऐसी अनुशंसा है जो मनुष्य को आत्मुग्धता और आत्ममोह के आघात से बचाती है।