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    रमज़ानुल मुबारक – 2013 – (4)

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    इमाम ज़ैनुलआबेदीन की प्रसिद्ध दुआ मकारेमुलअखलाक़ के एक भाग में कहा गया हैः हे ईश्वर अपनी कृपा से मेरी नीयत को सम्पूर्ण कर दे और अपने ऊपर मेरे विश्वास को सही करदे और मेरी भीतर जो खराबियां हैं उन्हें अपनी शक्ति से ठीक कर दे।

    नीयत के सम्पूर्ण होने का प्रथम चिन्ह, सदभावना व पवित्रता है। संकल्प जितना अधिक शुद्ध होगा काम उतना ही अच्छा होगा। सम्पूर्ण नीयत वह संकल्प है जिसके अंतर्गत मनुष्य ईश्वर की उपासना केवल उसके प्रति आभर प्रकट करने के लिए करता हो। अर्थात ईश्वर को उसके ईश्वर होने के कारण उपासना योग्य समझता हो न कि पुण्य पाने या उसके प्रकोप से बचने के लिए। इमाम ज़ैनुलआबेदीन का एक कथन है कि उन्होंने कहा है कि मुझे यह पसन्द नहीं है कि मैं ईश्वर की उपासना स्वर्ग के लिए करूं  और इसी प्रकार मुझे यह भी पसन्द नहीं है कि मैं ईश्वर की उपासना उसके प्रकोप के डर से करूं और दासों की भांति हो जाऊं। इस अवसर पर इमाम से पूछा गया कि तो फिर आप किस भावना के अंतर्गत ईश्वर की उपासना करते हैं? इमाम ज़ैनुलआबेदीन ने कहा कि मैं ईश्वर की उपासना इस लिए करता हूं क्योंकि वह उपासना के योग्य है और चूंकि उसने मुझे अपने कृपाओं का पात्र बनाया है। वास्तव में इस प्रकार की उपासना ही सर्वश्रेष्ठ उपासना है और इस प्रकार की नीयत की सम्पूर्ण नीयत है। यह वही नीयत है जिसके लिए प्रार्थना करते हुए इमाम ज़ैनुलआबेदीन अलैहिस्सलाम कहते हैं कि हे ईश्वर! मेरी नीयत सम्पूर्ण कर दे।

    इस वाक्य के बाद इमाम ज़ैनुलआबेदीन अलैहिस्सलाम कहते हैः

    हे ईश्वर! मेरे विश्वास को, अपनी शक्ति से सम्पूर्ण कर दे, और फिर वे कहते हैं हे ईश्वर! जो कुछ भी मेरे अस्तित्व में सही दशा से निकल गया है और भ्रष्ट हो रहा है उसे तो अपनी कभी न समाप्त होने वाली शक्ति से सही कर दे।

    इमाम ज़ैनुलआबेदीन अलैहिस्सलाम अपनी दुआ के इस भाग में मानो यह कहना चाहते हों कि हे ईश्वर! मुझे कभी भी अपने आप के सहारे न छोड़ना और सदैव मेरी सभी भौतिक व आध्यात्मिक आवश्यकताओं के लिए अपनी कृपा दृष्टि मेरे ऊपर रखना। यह एक वाक्य आत्मा व शरीर की सभी दशाओं को स्पष्ट करता है जिसमें शारीरिक कमज़ोरी, व्याकुलता, बैचनी जैसी विभिन्न दशाओं को सही करने की प्रार्थना की गयी है। किंतु यहां पर यह बात भी स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि विचारधारा, आस्था और कर्म में खराबी तथा सही राह स भटकाव सब से बड़ी खराबी और बीमारी है और इसका नुकसान सब से अधिक होता है। यदि ईश्वर कृपा करे और इस प्रकार की दुआ करने वाले की दुआ स्वीकार कर ले तो निश्चित रूप से मनुष्य के मन व शरीर के सही विकार मिट जाएंगे और कल्याण व परिपूर्णता का मार्ग उसके सामने स्पष्ट हो जाएगा क्योंकि ईश्वर हर चीज़ का ज्ञान रखता है और मनुष्य की भलाई बुराई को भलीभांति समझता है इसी लिए उससे इस प्रकार की दुआ की जाती है किंतु इसके साथ ही स्वंय मनुष्य को भी स्वंय अपने भीतर और अपने समाज से बुराईयों के उन्मूलन का भरसक प्रयास करना चाहिए। इस्लाम ने अपने अनुयाइयों को आदेश दिया है कि वह एक दूसरे की खराबियों को सही करने का प्रयास करें और नरमी के साथ अपने मित्रों की बुराइयों को स्वंय उनसे बताएं ताकि इस प्रकार से उनके मित्रों के कल्याण का मार्ग भी प्रशस्त हो सके।

    मनुष्य की परिपूर्णता के मार्ग की एक बड़ी बाधा, धोखा, धूर्तता और गद्दारी है। लोगों के साथ धोखाधड़ी आलोचनीय व घातक कृत्य है जिससे धर्म पर आस्था कम होती है। एक सामाजिक जीवन में विश्वास व सच्चाई दो अनमोल सिद्धान्त हैं। यदि परस्पर विश्वास नहीं होगा तो हरेक को दूसरे के प्रति शंका होगी औज्ञ समाज का ढांचा ही बिखर जाएगा। कहा जाता है कि सभी ईश्वरीय दूत अपने पूरे अभियान में अमानत व सच्चाई पर अत्याधिक बल देते थे। हमारे आज के कार्यक्रम की कहानी का विषय भी यही है।

    एक बार एक मुसलमान व्यापारी यात्रा पर गया और दुकान पर अपने नौकर को बिठा दिया। कपड़े के इस व्यापारी की अनुस्थिति में एक यहूदी दुकान में आया और उसने एक कपड़ा खरीदा जो वास्तव में खराब था। जब वह व्यापार यात्रा से वापस आया तो उसने नौकर से उस कपड़े के बारे में पूछा तो नौकर ने कहा कि मैंने उसे एक यहूदी के हाथ बेच दिया और उसे कपड़े की खराबी का भी पता नहीं चला। यह सुन कर व्यापारी अत्याधिक क्रोधित हुआ और उसने नौकर से पूछा कि वह यहूदी कहां है? नौकर ने बताया कि वह एक काफिले के साथ यात्रा पर निकल गया है। व्यापार तुरंत घोड़े पर सवार होकर निकला और तीन दिनों की यात्रा के बाद यहूदी व्यक्ति के कारंवा तक पहुंच गया और उस यहूदी के पास जाकर उससे कहा कि तुमने मेरी दुकान से जो कपड़े खरीदे हैं उसमें खराबी है इस लिए मैं तुम्हारे पैसे ले आया हूं इसे लो और मेरा कपड़ा वापस कर दो। यहूदी को अत्याधिक आश्चर्य हुआ और उसने पूछाः एसा तुम क्यों किया, क्यों कपड़ा वापस लेने के लिए इतनी लबीं यात्रा की? उस मुसलमान व्यापारी ने कहा कि मेरे धर्म ने मुझे सच्चाई का आदेश दिया है। हमारे पैगम्बर ने कहा है कि जो धोखा देता है वह हम में से नहीं है।

    यहूदी आश्चर्य चकित रह गया और फिर उसने स्वीकार किया कि नौकर को जो उसने दिरहम दिये थे वह नकली थे। उसके बाद उसने असली सिक्के व्यापारी को देते हुए कहा कि मैं तुम्हारे ईश्वर और तुम्हारे धर्म पर ईमान ले आया। मैं गवाही देता हूं कि एक ईश्वर के अतिरिक्त कोई पूज्य नहीं है और गवाही देता हूं कि मोहम्मद ईश्वर के दूत हैं।

    अंतिम में हम इमाम अली अलैहिस्सलाम की वसीयत के कुछ अंश आप की सेवा में प्रस्तु कर रहे हैं। इमाम अली अलैहिस्लाम ने अपने पुत्र इमाम हसन के लिए अपनी वसीयत के एक भाग में कहा है कि हे  पुत्र! जान ले कि आत्ममुग्धता, सच्चाई के विपरीत और बुद्धि का रोग है तो अपने विकास के लिए अत्याधिक प्रयास करो और अन्य लोगों के खज़ांनी न बना और जब अपना मार्ग खोज लो तो अपने पालनहार की उपासना में सब से अधिक विनम्र दास बनो।

    निश्चित रूप से आप को ज्ञात होगा कि आत्ममुग्धता अर्थात स्वंय को सर्वश्रेष्ठ समझना होता है। इमाम अली अलैहिस्लाम इस दशा को सही मार्ग से भटकाव और बुद्धि का रोग कहते है। जो सदैव स्वंय को ही देखता है वह सही मार्ग नहीं देख पाता। इस प्रकार का आत्मप्रेम मनुष्य की बुद्धि को भ्रष्ट कर देता है। क्योंकि जब मनुष्य स्वंय को सर्वश्रेष्ठ समझता है तो हर वस्तु और हर काम के केन्द्र में स्वंय को देखता है और हर प्रकार की वास्तविकता के विश्लेषण में केन्द्र  व धुरी स्वंय को समझता है और यही उसकी सब से बड़ी भूल होती है क्योंकि उसकी गलती यहीं से आरंभ होती है। हजरत अली अलैहिस्लाम कहते हैं कि जब स्वंय से प्रेम हो जाए तो तुम सही मार्ग से भटक जाओगे और तुम्हारी बुद्धि सही मार्ग नहीं खोज पाएगी। यदि तुम स्वंय को ही देखोगे तो अन्य बहुत सी वस्तुएं तुम्हें नज़र नहीं आएंगी और वास्तविकता से तुम दूर हो जाओगे। इसी लिए उन्होंने कहा कि आत्ममुग्धता, बुद्धि का अंत कर देती है और मनुष्य के मन मस्तिष्क में अंधकार छा जाता है।

    हज़रत अली अलैहिस्सलाम यह कहते हैं कि अपने कल्याण व विकास  के लिए प्रयास करो अर्थात तुम्हारा काम अत्याधिक विकसित हो। विकास से इमाम अली अलैहिस्सलाम का आशय, आध्यात्मिक विकास है। अर्थात मनुष्य को अपनी आत्मा के विकास के लिए प्रयास करना चाहिए। इसका अर्थ यह है कि हमें सब से पहले सही विचारधारा की खोज करना चाहिए ताकि हम निम्नस्तरीय व गलत विचारधाराओं के जाल में न फंसने पाएं और जो सत्य है उसे पहचानें और इसके साथ ही हमें यह प्रयास भी करना चाहिए नैतिक बुराइयों को अपने पास न आनें दें। इसके पास इमाम अली अलैहिस्सलाम कहते हैं कि प्रयास करो कि अन्य लोगों के ख़ज़ांची न बनो और अपनी आयु एसा न बिताओ कि उसके परिणाम से अन्य लोग लाभ उठाएं और तुम्हारे लिए कुछ न बचे और ईश्वर के निकट सम्मानीय होने के बजाए केवल इस संसार में और कुछ लोगों के मध्य ही सम्मानीय रहो।

    यदि मनुष्य ईश्वर की अनदेखी करके केवल धन जुटाने में ही व्यस्त रहे तो वास्तव में वह अन्य लोगों के लिए अपना जीवन बर्बाद करता है क्योंकि वह अपनी मूल्यवान आयु गंवा कर जो कुछ जटाता है उससे दूसरों को अधिक लाभ मिलता है और उसका नुकसान स्वंय उस मनुष्य को परलोक में उठाना पड़ता है। इमाम अली अलैहिस्सलाम अपनी वसीयत में इसी प्रकार कहते है कि जब तुम्हें अपनी मार्ग मिल जाए तो अपने पालनहार की उपासना में विनम्रता का प्रदर्शन करो। वास्तव में जो मनुष्य ईश्वर तक पहुंचने का मार्ग खोज लेता है तो उसका सारा ध्यान ईश्वर के इसी मार्ग पर लगा रहता है और उसके मन में किसी भी प्रकार के भटकाने वाले विचार उत्पन्न ही नहीं होते और यह मनुष्य के कल्याण के लिए सर्वश्रेष्ठ दशा है और हर मनुष्य को इसके लिए अपने ईश्वर के प्रति आभारी रहना चाहिए। http://hindi.irib.ir/