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    3. रमज़ानुल मुबारक – 2013 – (5)

    रमज़ानुल मुबारक – 2013 – (5)

    रमज़ानुल मुबारक – 2013 – (5)
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     इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम की दुआ मकारेमुल अखलाक़ के एक भाग में कहा गया है कि हे ईश्वर! मोहम्मद और उनके वंश पर सलाम भेज और मुझे उन कामों से बचा जो मुझे पूर्ण रूप से स्वंय में व्यस्त कर लेते हैं और मुझे उन कामों में व्यस्त रख जिनके बारे में कल तू मुझ से पूछेगा।

          इस दुआ का आरंभ इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम पैगम्बरे इस्लाम और उनके वंश पर सलाम भेजने की दुआ से करते हैं और फिर आस्था, नीयत, कर्म और विश्वास के बारे में अपनी मांगें ईश्वर के सामने रखते हैं। दुआ के पहले वाक्य में हम पढ़ते हैं हे ईश्वर! मुझे उन कामों से बचा जो मुझे पूर्ण रूप से स्वंय में व्यस्त कर लेते हैं और मुझे उन कामों में व्यस्त रख जिनके बारे में कल तू मुझ से पूछेगा। वास्तव में बहुत से एसे लोग होते हैं जो अच्छे कर्म कर सकते हैं और भलाई की उनमें योग्यता होती है किंतु उनकी आयु एसे कामों में गुज़रती है जो बहुत अधिक आवश्यक नहीं होते या यह कि वह काम दूसरे भी कर सकते थे। यदि इस प्रकार के लोगों में ईश्वर के प्रति वास्तविक आस्था हो वह इमाम ज़ैनुलआबेदीन की भांति यह दुआ दोहरा सकते हैं कि ईश्वर उनके छोटे कामों को पूरा करने का वातावरण बनाए और ताकि  इस राह में अपनी बहुमूल्य आयु न गवांए। इस संदर्भ में उदाहरण स्वरूप ईरान के प्रसिद्ध बुद्धिजीवी सैयद रज़ा बहाउद्दीनी की जीवनी में आया है कि वे जब पढ़ रहे थे तो समय के सदपयोग के लिए लगभग एक वर्ष तक अपने स्कूल से घर नहीं गये जबकि उनके स्कूल और हास्टल से उनका घर मात्र हज़ार क़दम की दूरी पर ही था। इस प्रकार से वे हर उस काम से बचते थे जिसमें उनका समय बर्बाद होता हो और केवल पढ़ाई करते थे। इस प्रकार की दिनचर्या महान लोगों की दूरदर्शिता की परिचायक होती है जो बड़े उद्देश्य के लिए छोटे विषयों को महत्व नहीं देते। इमाम ज़ैनुल आबेदीन की दुआ के  दूसरे वाक्य में को पहले वाक्य का पूरक कहा जा सकता है क्योंकि इसमें मनुष्य के कर्तव्यों का मापदंड बताया गया है और इसके लिए दुआ के रूप में ईश्वर से मांग की गयी है। वे कहते हैं कि हे ईश्वर! मुझे उन कामों में व्यस्त रख जिनके बारे में कल तू मुझ से पूछेगा। अर्थात वे ईश्वर से कहते हैं कि वह उन्हें निरर्थक कामों से दूर रखे ताकि वे अपने समय को महत्वपूर्ण कामों में लगा सकें जिनके बारे में ईश्वर प्रलय के दिन अपने सभी दासों से सवाल करने वाला है। इस्लाम के सभी नियम व कर्तव्य इस मानदंड पर खरे उतरते हैं। इमाम ज़ैनुल आबेदीन अपने एक लंबे कथन में ईश्वर के अधिकार, शरीर के अंगों के अधिकार, माता पिता के अधिकार, संतान के अधिकार, शिक्षक के अधिकार तथा अन्य लोगों और विभिन्न प्रकार के अधिकारों का विस्तार से वर्णन किया है और इन अधिकारों पर लोगों के कर्तव्यों का स्पष्ट किया है।

    प्रसिद्ध बुद्धिजीवी लुक़मान सदैव अपने पुत्र को उपदेश देते और उन्हें सही मार्ग पर चलने पर प्रोत्साहित करते थे। अपने पुत्र के लिए उनके उपदेशों में एक उपदेश यह भी  है कि अपने कामों और बातों में केवल ईश्वर की इच्छा को भी दृष्टि में रखना चाहिएऔर लोगों की ओर से मिलनी वाली सराहना से घमंडी नहीं होना चाहिए और इसी प्रकार बुरे लोगों की आपत्तियों और उलाहनों पर ध्यान नहीं देना चाहिए। उनके पुत्र ने इस का उदाहरण चाहा तो लुकमान हकीम ने उनसे कहा कि यात्रा की तैयारी करो और इसी यात्रा के दौरान मेरे इस उपदेश का राज़ तुम समझ जाओगे।

    हज़रत लुकमान के पुत्र ने अपने पिता के आदेश का पालन किया और सारा सामान तैयार करके अपने पिता को सूचना दी। लुकमान हकीम, खच्चर पर सवार हुए और बेटे से अपने पीछे पीछे चलने को कहा। चलते चलते वे एक एसे क्षेत्र से गुज़रे जहां खेतों में लोग का कर रहे थे। किसानों ने जो लुकमान और उनके बेटे को इस दशा में देखा तो कहने लगे कि देखो कितना निर्दयी पिता है स्वंय तो सवारी के मज़े लूट रहा है और अपने कमज़ोर बेटे को अपने पीछे पीछे दौड़ा रहा है। यह सुन कर हज़रत लुकमान खच्चर से नीचे उतरे और अपने बेटे को खच्चर पर बिठा दिया और स्वंय पीछे पीछे चलने लगे। कुछ आगे जाकर जब एक बाज़ार से वे गुज़र रहे थे तो वहां के लोगों ने कहना आरंभ किया इस पिता को देखो इसने अपने बेटे को संस्कार नहीं दिया जो वह आराम से खच्चर पर बैठा है और बूढ़ा पिता पैदल चल रहा है। यह सुन कर हज़रत लुकमान भी खच्चर पर बैठ गये किंतु जब लोगों ने यह स्थिति देखी तो कहा यह दोनों कितने निर्दयी हैं जो एक कमज़ोर जानवर पर दोनों बैठे हुए हैं। यह सुन हर हज़रत लुकमान अपने बेटे के साथ खच्चर से उतर गये और दोनों खच्चर के पीछे पीछे पैदल चलने लगे इसी प्रकार वे एक गांव में पहुंचे। ग्रामीणों ने जब उन्हें इस दशा में देखा तो कहने लगे यह किशोर और वृद्ध कितने मूर्ख हैं खच्चर होते हुए भी पैदल चलकर स्वंय को थका रहे हैं लगता है यह लोग स्वंय से अधिक इस खच्चर से प्रेम करते हैं।

    यह सुनकर हज़रत लुकमान मुस्कराए और अपने पुत्र से कहा कि देखो बेटे यह जो मैं कहता हूं कि लोगों की बातों पर ध्यान न दो उसका कारण यही है। अब तुम्हें स्वंय पता चल गया कि लोगों को प्रसन्न रखना संभव नहीं है इसी लिए बुद्धिमान वही है जो अपना समय लोगों को प्रसन्न करने में नष्ट नहीं करता बल्कि ईश्वर की प्रसन्नता के लिए प्रयास करता है और सीधे मार्ग पर चलता रहता है।

    इस भाग में हम इमाम अली अलैहिस्सलाम की अपने बेटे इमाम हसन अलैहिस्सलाम के लिए वसीयत के कुछ भागों पर चर्चा कर रहे हैं। वे कहते हैं यदि किसी निर्धन को देखो जो तुम्हारा सामान प्रलय के दिन तक ले जाए और उस समय जब तुम्हें उसकी आवश्यकता हो तुम्हें लौटा दे तो उसकी सहायता का अपने लिए स्वर्णिम अवसर समझो और उसकी सहायता करके परलोक के लिए अपना सामान उसके द्वारा भिजवा दो क्योंकि हो सकता है कि प्रलय के दिन तुम एसे किसी को खोजो किंतु उस समय वह तुम्हें न मिले। धन हो और उस दशा में यदि तुम से कोई क़र्ज़ मांगे तो इसे अपने लिए अच्छा अवसर समझो ताकि तुम्हारी तंगी के समय वह तुम्हें वह धन लौटा सके।

    हज़रत अली अलैहिस्सलाम के उपदेशों में एक विशेष व सुन्दर बिन्दु लोक परलोक पर उनके विचार और उसे साधारण भाषा में लोगों के सामने वर्णित करना है। यदि लोक परलोक पर इतनी स्पष्ट नज़र होगी तो उसका परिणाम उसी रूप में निकलेगा जिसकी ओर इमाम अली अलैहिस्सलाम ने संकेत किया है। इस विचारधारा के अनुसार ईश्वर ने संसार की रचना इस लिए की है ताकि मनुष्य सदैव रहने वाली परलोक में अपने स्थायी जीवन की तैयारी कर सके। जिसकी भी तैयारी अधिक होगी उसे उतना ही अधिक परलोक में उसका लाभ मिलेगा। कुरआने मजीद में भी इस वास्तविकता की ओर संकेत किया गया है। कुरआने मजीद में कहा गया है कि जो कुछ तुम्हारे पास है वह खत्म हो जाएगा और जो कुछ ईश्वर के पास है वह सदा बाकी रहने वाला है। इस लिए बुद्धि यही कहती है कि मनुष्य से संसार में अपने गिने चुने कुछ दिनों से भरपूर लाभ उठाए और अपने सदा रहने वाले जीवन की तैयारी करे। परलोक के लिए सामान भेजने और तैयारी का सब से अच्छा  मार्ग यह है कि मनुष्य अपना धन निर्धनों पर खर्च करे कि इस प्रकार से वह धन उसे परलोक में मिल सकता है। इमाम अली अलैहिस्सलाम अपने बेटे से कहते हैं कि सांसारिक धन तुम जितना भी जरूरत रखने वालों पर खर्च करोगे इस संसार में तुम्हारा बोझ उतना ही हल्का होगा और यह सब कुछ चूंकि ईश्वर के लिए किया गया होगा इस लिए इसका पारितोषिक तुम्हें परलोक में मिल जाएगा। इस प्रकार से तुम अपना धन ढोने से भी बच जाओगे और उसका बढ़ा हुआ लाभ परलोक में तुम्हें मिलेगा। दान दक्षिणा के बारे में इमाम अली अलैहिस्सलाम की विचार धारा यह  है कि एसे समय में कि जब तुम्हारे पास धन हो तो उसे जरूरत मंदों को दे दो ताकि कल  जब तुम्हें उसकी आवश्यकता हो वह तुम्हें लौटा दें। महान लोगों को दान में सुख प्राप्त होता है और वास्तव में यह शैतान है जो मनुष्य को निर्धनता से डरा कर अपने भाइयों की सहायता से उन्हें रोक देता है। http://hindi.irib.ir/