islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. रमज़ानुल मुबारक – 2013 – (6)

    रमज़ानुल मुबारक – 2013 – (6)

    रमज़ानुल मुबारक – 2013 – (6)
    Rate this post

    इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम की दुआ मकारेमुल अखलाक़ के एक भाग में कहा गया है कि हे ईश्वर मुझे सम्मान प्रदान कर और मुझे आत्ममुग्धता में ग्रस्त न कर।

          सम्मान, आत्मा की श्रेष्ठता की दशा है जो मनुष्य को ईश्वर के अतिरिक्त किसी भी शक्ति के सामने झुकने से रोकती है। जो लोग, धन दौलत, सत्ता या अन्य लोगों के धन के लोभ, आतंरिक इच्छाओं, वासना  के कारण तुच्छ व सम्मानहीन होते वे वास्तव में अपना व्यक्तित्व खो चुके होते हैं और सम्मान नाम की कोई चीज़ उनमें नहीं होती। क्योंकि वे  शैतानी बहकावे  के सामने हार मान चुके होते हैं और इस लिए अपमान उनका अंजाम होता है क्योंकि सम्मान उन लोगों से विशेष होता है जो स्वंय को मन की किसी भी इच्छा के सामने तुच्छ नहीं करते और अपनी किसी इच्छा की पूर्ति के लिए सम्मान का सौदा नहीं करते।

    इतिहास में आया है कि वर्तमान सऊदी अरब के दक्षिण पश्चिम में स्थित नजरान नामक स्थान के ईसाई, अत्याधिक धनी व समृद्ध थे। पैगम्बरे इस्लाम ने उन्हें पत्र लिखकर इस्लाम धर्म स्वीकार करने का निमंत्रण दिया। उन लोगों ने विचार विमर्श के बाद यह निर्णय किया कि एक प्रतिनिधिमंडल को वार्ता और तर्क वितर्क के लिए मदीना भेजा जाना चाहिए। यह प्रतिनिधिमंडल जब मदीना नगर के निकट पहुंचा तो उसके सदस्यों ने सोचा कि मुसलमान निर्धन लोग हैं यदि हम, मूल्यवान वस्त्रों और आभूषणों के साथ उनके सामने जाएं तो वे हमारे शानदार कपड़े और आभूषण देख कर ही हमसे प्रभावित हो जाएंगे और हमें बड़ा समझने लगेंगे जिससे हमें उनके साथ शस्त्रार्थ में विजय भी मिल सकती है। उन लोगों ने अत्याधिक मूल्यवान कपड़े और आभूषण पहने और मदीना नगर में प्रविष्ट हो गये किंतु उन्हें देख कर पैगम्बरे इस्लाम और मुसलमान न केवल यह कि प्रभावित नहीं हुए बल्कि उन्होंने इन सब की अनदेखी करके उन्हें लज्जित भी कर दिया और नजरान के धनी ईसाई समझ गये कि पैगम्बरे इस्लाम और उनके अनुयाइयों को आभूषणों  और रत्नों की चमक दमक से प्रभावित नहीं किया जा सकता।

    इमाम ज़ैनुलआबेदीन ने अपनी प्रसिद्ध दुआ, मकारेमुलअखलाक़ के इस भाग में ईश्वर से अपने लिए सम्मान की दुआ करने के तत्काल बाद उससे यह विनती करते हैं कि हे पालनहार मुझे आत्म मुग्धता में ग्रस्त न करना । यहां पर यह प्रश्न उठता है कि क्या आत्मसम्मान और घमंड व आत्ममुग्धता के मध्य किसी प्रकार का कोई संबंध है जो इमाम ज़ैनुलआबेदीन आत्मसम्मान की दुआ के तत्काल बाद घमंड से बचाने की दुआ करते हैं? इस का उत्तर हां में है। क्योंकि संभव है कि आत्मसम्मान कुछ लोगों में सीमा से अधिक बढ़ जाए और उन्हें आत्ममुग्धता और घमंड में ग्रस्त कर दे अर्थात वह अन्य लोगों को तुच्छ और स्वंय को सर्वर्श्रेष्ठ समझने लगे।

    निश्चित रूप से आत्मसम्मान का का अनिवार्य परिणाम आत्ममुग्धता और घमंड नहीं है। आत्मसम्मान, विनम्रता के साथ सुन्दर होता है। विनम्र लोग सदैव ही लोकप्रिय और लोगों की दृष्टि में सम्मानीय होते हैं। पैगम्बरे इस्लाम का कथन है कि विनम्रता, विनम्र व्यक्ति का स्थान समाज में ऊंचा करती है, विनम्र बनो ताकि ईश्वर की कृपा के पात्र बनो। किंतु यह भी एक वास्तविकता है कि अच्छी विनम्रता वही है जो आत्मसम्मान को ठेस न पहुंचाए और अपमान का कारण न बने। उदाहरण स्वरूप यदि हम दूसरे का आदर सत्कार करने में संकोच न करें, बैठकों में जहां जगह मिले बैठ जाएं, निर्रथक बहस व विवाद से बचें भले ही हमारी बात सही हो, तो इसे विनम्रता कहा जाएगा। किंतु यदि कोई विनम्रता के नाम पर स्वंय का अपमान करे या अन्य लोगों की चापलूसी पर उतर आए तो इसे अच्छा स्वभाव नहीं कहा जाएगा। इसी लिए विनम्र लोगों को यह भी ध्यान देना चाहिए कि उनकी विनम्रता कहीं उन से उनका आत्मसम्मान तो नहीं छीन रही है।

    एक अन्य नैतिक सदगुण जो मनुष्य के आध्यामिक निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका रखता है, कथनी व करनी में सत्यता है। मनुष्य शारीरिक व मानसिक आवश्यकताओं के कारण सामाजिक जीवन जीना चाहता है और इस सामाजिक जीवन की रक्षा का सब से महत्वपूर्ण साधन व कारण सत्यता है। इस आधार पर यदि मनुष्य के सभी कामों का आधार सत्य हो और हर प्रकार के झूठ से पवित्र हो तो उसके सम्मान व महत्व की भूमिका स्वयतः तैयार हो जाती है। कहते हैं कि एक किशोर पढ़ने के लिए इराक़ के नगर बगदाद जाने वाला था। जाने से पूर्व उसकी मां ने उसे चालीस दीनार दिये  और कहा कि बेटे मुझे वचन दे कि तू कभी भी किसी भी दशा में झूठ नहीं बोलेगा। किशोर ने अपनी माता को वचन दिया और बगदाद जाने वाले कारवां से जुड़ गया। किशोर का यह काफिला जब मरूस्थल में पहुंचा तो अचानक लुटेरों ने उस पर आक्रमण कर दिया और सब कूछ लूट लिया। तभी अचानक एक लुटेरे की नज़र उस किशोर पर पड़ी तो उसने झिड़कर उससे पूछा, हे बच्चे! तेरे पास भी कुछ है?

    किशोर ने कहाः हां चालीस दीनार। लुटेरे को हंसी आ गयी। उसे लगा कि लड़का उसके साथ मज़ाक कर रहा है या फिर पागल है। इसी लिए उसने किशोर को पकड़ा और उपने सरदार के पास ले गया और उसे पूरी बात बतायी। सरदार ने उस किशोर की तलाशी लेने का आदेश दिया और जब सचमुच चालीस दीनार उसके पास से निकले तो डाकुओं के सरदार ने उससे पूछाः लड़के! तूने सच क्यों बोला?

    किशोर ने कहाः मैंने अपना मांग को वचन दिया था कि सदैव सच बोलूंगा।  मैं ने सच बोला क्योंकि मैं अपना वचन नहीं तोड़ना चाहता था। किशोर की बात सुनकर डाकुओं के सरदार की रीढ़ की हड्डी में सिहरन हुई और वह कहने लगाः तुमने अपने धन के बारे में सच बता दिया ताकि अपनी मां से किये गये वचन को न तोड़ो और एक मैं हूं जो अपने ईश्वर को दिये गये वचन को तोड़ने से भी नहीं डरता। उसके बाद सरदार ने सारे लोगों का धन व सामान वापस लौटाने का आदेश दिया और फिर उस किशोर से कहाः मैं तुम्हारे छोटे छोटों हाथों को पकड़ कर अपने ईश्वर की ओर वापस लौट रहा हूं और अपने पापों का प्राश्यशित करता हूं। यह सुन कर सारे लुटेरों ने कहा कि जिस प्रकार लूट में आप हमारे सरदार से उसी प्रकार ईश्वर की ओर वापसी में भी आप की हमारे सरदार हैं हम सब प्रायश्चित करते हैं। इस प्रकार से सब लोग सही रास्ते पर आ गये।

    इस भाग में हम इमाम अली अलैहिस्सलाम की सिफारिशों के कुछ भागों पर चर्चा करेगें। इमाम अली अलैहिस्सलाम कहते हैं कि बीते युगों के लोगों की जीवनियों और उनके साथ घटने वाली घटनाओं का अपने ह्रदय पर चित्रण करो और याद करो कि बीते हुए लोगों का क्या अंजाम हुआ है और बीते हुए लोगों के नगरों और खंडहरों को देखो और ध्यान दो कि उन्होंने क्या किया था? कहां से आए थे, और कहां जाकर ठहरे?

          वास्तव में इस नश्वर संसार में मनुष्य की सारी निश्चितां का एक यही कारण है कि वह इस अस्थाई ससांर को स्थायी समझ बैठता है और यह सोचता है कि वह इस संसार में सदा रहने वाला है। यदि यही मनुष्य मृत्यु और अपने पूर्वजों के बारे में सोचे तो उसकी समझ में आ जाएगा कि इस संसार में मनुष्य का जीवन कितना छोटा है और इस प्रकार से वह इस संसार से आशा नहीं लगाएगा और उस लोक के लिए प्रयास करेगा जो सदा रहने वाला है। अन्य लोगों के अनुभवों से लाभ उठाने के विषय पर इमाम अली अलैहिस्सलाम ने अपने कथनों में बारम्बार बल दिया है। इमाम अली अलैहिस्सलाम ने अपने पुत्र को उनकी किशोरावस्था के दृष्टिगत यह उपदेश दिया है। हालांकि समाज के हर व्यक्ति को दूसरों के अनुभवों की आवश्यकता होती है किंतु युवाओं को कम आयु के कारण इतिहास और अन्य लोगों के अनुभवों की जानकारी की अधिक आवश्यकता होती है क्योंकि किशोर अपनी कम आयु और कच्चे मन मस्तिष्क के कारण अनुभवहीन होता है। उसे दुनिया की ऊंच नीच का अनुभव नहीं होता और अपने जीवन में वह कम समस्याओं का सामना किये  होता है। इसी लिए कभी कभी समस्याओं के दबाव से किशोर के मन की शांति समाप्त हो जाती है और इससे उसमें अवसाद या फिर आक्रामकता उत्पन्न हो जाती है। दूसरी ओर किशोरों में कल्पनाएं व सपनों की अपनी एक दुनिया बसी होती है जिसके कारण बहुत से किशोर, वास्तविकताओं तक पहुंच ही नहीं पाते। अनुभव, कल्पनाओं व सपनों के जाल को तोड़ कर मनुष्य को वास्तविकता से निकट कर देता है। इस संवेदनशील काल में जो चीज़ किशोरों की सहायता कर सकती है और इस चरण से सुरक्षा से साथ उन्हें आगे ले जा सकती है वह उन लोगों के अनुभव हैं जिन्होंने कांटों भरे इस चरण को पार किया होता है। इमाम अली अलैहिस्सलाम कहते हैं कि अनुभवी लोगों के साथ उठो बैठो कि उन्होंने अनुभवों की अपार संपत्ति को अपनी अनमोल आयु के मूल्य पर एकत्रित की है और इस अपार संपत्ति को तुम बड़े सस्ते मूल्य पर उनसे प्राप्त कर सकते हो।

          अनुभव से लाभ उठाने का एक मार्ग, अतीत की जातियों और लोगों के बारे में अध्ययन है। इतिहास एक एसा दर्पण होता है जो अतीत को दिखाता है और भविष्य के लिए मार्गदर्शक बनता है। ईरान के प्रसिद्ध बुद्धिजीवी शहीद मुतह्हरी कहते हैं कि मनुष्य जिस प्रकार अपने समकालीनों से भाषा और जीवन शैली सीखता है उसी प्रकार वह अपने से पहले वालों से भी बहुत कुछ सीखता है। इतिहास उस जीवंत प्रसारण की भांति है जो अतीत को वर्तमान में बदल देता है।

    इमाम अली अलैहिस्सलाम अपने बेटे को बीते हुए युग के लोगों की जीवनी के अध्ययन की सिफारिश करते हैं ताकि उनके अनुभवों से वह अपने जीवन में लाभ उठाएं और इस प्रकार से स्वंय को कुछ गलतियों से बचा लें। http://hindi.irib.ir/