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    रमज़ानुल मुबारक – 2013 – (7)

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    पवित्र रमज़ान के दिन और रात एक के बाद एक गुज़र रहे हैं। रमज़ान के घंटे मूल्यवान उपहार हैं। इस विशिष्ट अवसर का सदुपयोग करना चाहिए और इस महीने के बाक़ी बचे दिन को बर्बाद होने से बचाना चाहिए। इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम की प्रसिद्ध दुआ मकारेमुल एख़लाक़ का एक टुकड़े का अर्थ आपकी सेवा में पेश कर रहे हैः हे प्रभु! जब तक मेरी वस्त्र-रूपी आयु तेरा आज्ञापलन कर रही है मुझे दीर्घायु दे  और जब मेरी आयु को शैतान अपने प्रयोग की चरागाह बना ले तो उसका अंत कर दे इससे पहले कि तेरी कृपा मुझसे दूर हो या मैं तेरे क्रोध का निशाना बनूं।

     

    इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम ईश्वर से ऐसी आयु मांग रहे हैं जो पूरी तरह उसके आज्ञापालन के लिए समर्पित हो और सारी शक्ति ईश्वरीय आदेशों के पालन की दिशा में केन्द्रित हो। इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम की प्रार्थना के इस टुकड़े में जिस बिन्दु पर ध्यान देने की आवश्यकता है वह यह कि प्रायः काम के लिए विशेष कपड़े को काम करते समय प्रयोग करते हैं और जब काम का समय ख़त्म हो जाता है तो कर्मचारी उसे अपने जिस्म से उतार देता है किन्तु मनुष्य की आयु उस वस्त्र की भांति है जिसे मनुष्य दिन रात चौबीस घंटे उसके साथ है और जब तक वह जीवित है उससे अलग नहीं होता। इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम ईश्वर से ऐसी आयु की प्रार्थना कर रहे हैं जो चौबीस घंटे ईश्वर के आज्ञापालन के लिए समर्पित हो। दूसरे शब्दों में यदि वस्त्र के समान आयु दिन रात ईश्वर के आदेश का पालन करे तो इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम की दृष्टि में ऐसी आयु मूल्यवान है किन्तु यदि इस आयु से कभी ईश्वर की अवज्ञा की जाए और पाप में गुज़ारी जाए तो ऐसी उम्र इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम की दृष्टि में मूल्यहीन है।

     

    इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम ईश्वर से प्रार्थना कर रहे हैं कि हे प्रभु! यदि मेरी उम्र शैतान की चरागाह बन जाए तो उसका अंत कर दे। उम्र को चरागाह से उपमा, बहुत ही सुंदर उपमा है जिसमें बहुत ही आकर्षक अर्थ छिपे हुए हैं। चरागाह में पशु जिस तरफ़ चाहते हैं चरते हैं। जो घास उनके सामने आती है उसे खाते हैं कभी छोटे-छोटे पौधों के पत्ते खा जाते हैं तो कभी वनस्पति को अपने दांत में लेकर इतनी ज़ोर से झटका देते हैं कि वह जड़ से उखड़ जाती है। कभी तने और जड़ को एक साथ चबाकर खा जाते हैं। संक्षेप में यह कि चरागाह की विशेषता यह होती है कि वह पशुओं के चरने का विशाल मैदान होता है। शैतान भी मनुष्य की उम्र के विशाल मैदान में बहुत सक्रिय रहता है कभी उसके शरीर को प्रयोग करते हुए आंख, कान, ज़बान, हाथ और पैर हर एक को पाप के लिए उकसाता है और व्यक्ति अवैध कृत्य करता है। कभी वह मनुष्य के मन पर इस प्रकार हावी हो जाता है कि उसके विचार व कल्पना से अपनी गतिविधियों की भूमि समतल करता है और मनुष्य से पाप करवाता है। इसलिए मनुष्य की भौतिक और आत्मिक शक्ति की दृष्टि से शैतान के पास विशाल मैदान है।

    पवित्र क़ुरआन में इब्लीस और शैतान शब्द का बारंबार प्रयोग हुआ है। इब्लीस जिन्नात की जाति से है जिसने बड़ी लंबी अवधि फ़रिश्तों के साथ ईश्वर की उपासना में बिताया था किन्तु जिस समय ईश्वर ने हज़रत आदम को पैदा किया और जब फ़रिश्तों को नत्तस्तक होने के लिए कहा तो इब्लीस को छोड़ सब ईश्वरीय आदेश का पालन करते हुए नत्मस्तक हो गए किन्तु इब्लीस ने घमंड के कारण ईश्वरीय आदेश का पालन नहीं किया और इस अवज्ञा के कारण ईश्वर ने उसे धुत्कार दिया तो उस समय इब्लीस ने बदला लेने के लिए ईश्वर से कहा कि मैं आदम की नस्ल को बहकाउंगा किन्तु शैतान शब्द उस हर उस अस्तित्व के लिए प्रयोग होता है जो गुमराह करते हैं और यह नाम इब्लीस पर भी चरितार्थ होता है कि उसने ईश्वर के आदेश की अवज्ञा की और आदम को सजदा नहीं किया और इसी प्रकार शैतान शब्द हर उस मनुष्य और जिन्नात को कहा जाता है जो दूसरों को बहकाते हैं। इसके इलावा पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पवित्र परिजनों के कथनों में इच्छाओं को भी शैतान की संज्ञा दी है जो व्यक्ति को पथभ्रष्टता की ओर उकसाती है। ईश्वर इस पवित्र महीने में हम सबको शैतान के प्रलोभन से बचाए।

     

    जैसा कि आप जानते हैं कि ज़बान एक मनुष्य का दूसरे से संपर्क का मुख्य साधन समझी जाती है इसलिए इसका बहुत महत्व व मूल्य है। जिस प्रकार ज़बान मनुष्य को कल्याण तक पहुंचाने में सहायता कर सकती है यदि इसे क़ाबू में न रखा जाए तो व्यक्ति लोक-परलोक दोनों जगह में हानि उठाता है। ज़बान के अधिकार को अदा करने के लिए कि

    ईश्वर की ओर से यह बहुत बड़ी अनुकंपा है, इसे इस प्रकार प्रयोग करें कि जैसे ईश्वर पसंद करता है और यह बात भी महत्वपूर्ण है कि ज़बान को अनुचित शब्दों के प्रयोग से बचते हुए क़ाबू में रखा जा सकता है। यदि ज़बान क़ाबू में हो जाए तो बहुत से पाप करने से मनुष्य बच सकता है।

    इतिहास में है कि लुक़मान हकीम अपने मालिक की निरर्थक बातों से बहुत अप्रसन्न रहते और किसी ऐसे अवसर की खोज में रहते कि मालिक को उसकी ग़लती की ओर से सावधान कर सकें। एक दिन हकीम लुक़मान के मालिक के घर एक मेहमान आया। उसने हकीम लुक़मान से एक भेड़ ज़िबह कर उसके सबसे अच्छे अंग से स्वादिष्ट व्यंजन तय्यार करने के लिए कहा। हकीम लुक़मान ने भेड़ की ज़बान और दिल से एक व्यंजन तय्यार कर दस्तरख़ान पर रखा।

    एक दिन और हकीम लुक़मान के मालिक ने उनसे एक भेड़ ज़िबह कर उसके सबसे बुरे अंग का व्यंजन तय्यार करने के लिए कहा। इस बार भी हकीम लुक़मान के इस काम से उनका मालिक आश्चर्य में पड़ गया और उसने पूछाः यह कैसे हो सकता है कि यह दोनों अंग सबसे अच्छे हों और सबसे बुरे भी? लुक़मान हकीम ने कहाः हे मालिक हृदय और ज़बान मनुष्य के कल्याण और दुर्भाग्य में सबसे बड़ी भूमिका निभाते हैं। अगर अपने हृदय को अच्छाइयों का स्रोत बनाएं और ज़बान से लोगों को सुधारने तथा आत्मज्ञान के प्रसार में सहायता ली जाए तो यह सबसे अच्छे अंग हैं और यदि हृदय बुराई के अंधकार में डूब जाए और द्वेष व शत्रुता का केन्द्र बन जाए तथा ज़बान से दूसरों के विरुद्ध चाल चले एवं बुराई करने का काम ले तत यह सबसे बुरे अंग होंगे। लुक़मान हकीम के मालिक ने इस नसीहत से पाठ लिया और उसके बाद से आत्मसुधार का प्रयास करने लगा।

     

    इस भाग में हज़रत अली अलैहिस्सलाम द्वारा अपने बेटे को की गयी एक वसीयत का उल्लेख करने जा रहे हैं। हज़रत अली अपनी वसीयत में एक स्थान पर कहते हैः मेरे बेटे! जान लो कि किसी ने भी पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम की भांति ईश्वरीय आदेशों को बयान नहीं किया इसलिए उन्हें अपना मार्गदर्शक बनाओ और कल्याण व मुक्ति के मार्ग में उन्हें ही अपना पथप्रदर्शक चुनो। मैंने तुम्हें नसीहत करने में तनिक भी लापरवाही नहीं की और तुम आत्मसुधार के मार्ग को समझने के लिए जितना प्रयास करो उस सीमा तक नहीं पहुंच सकते जिस सीमा तक मैंने तुम्हारे भले के बारे में सोचा है।

    हज़रत अली अलैहिस्सलाम अपनी वसीयत के इस भाग में अपने बेटे इमाम हसन अलैहिस्सलाम से दो महत्वपूर्ण बिन्दुओं की ओर संकेत कर रहे हैं एक यह कि पैग़म्बरे इस्लाम सर्वश्रेष्ठ मार्गदर्शक हैं और दूसरे यह कि उनके पिता ने उनके मार्गदर्शन के लिए किसी भी प्रयास में कमी नहीं की इसलिए दोनों मार्गदर्शकों का अनुसरण ज़रूरी है।

     

    पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम के मार्गदर्शक होने के बारे में हज़रत अली के वाक्य से यह पता चलता है कि पैग़म्बरे इस्लाम पर जो ईश्वरीय संदेश उतरा उनसे पहले के सभी ईश्वरीय दूतों पर उतरने वाले संदेशों से महत्वपूर्ण है। हर युग में उस युग के मनुष्य की क्षमताओं के अनुसार ईश्वरीय आदेश आए और पैग़म्बरे इस्लाम के युग में अंतिम ईश्वरीय संदेश उतरा। तौरैत और बाइबल से पवित्र क़ुरआन के तुलनात्मक अध्ययन से पह महाअंतर स्पष्ट हो जाता है। ईश्वर की पहचान और उसके एक होने एवं उसकी विशेषताओं के बारे में जिन बिन्दुओं का पवित्र क़ुरआन में उल्लेख मिलता है वह किसी भी ईश्वरीय संदेश में नहीं मिलता। कुछ शोधकर्ताओं के अनुसार पवित्र क़ुरआन में 2000 आयतें प्रलय और उससे संबंधित बिन्दुओं का उल्लेख करती हैं। नैतिक, सामाजिक एंव राजनैतिक विषयों तथा पहले वालों के इतिहास की दृष्टि से क़ुरआन बहुत समृद्ध है। यही कारण है कि हज़रत अली अलैहिस्सलाम कह रहे हैं कि किसी ने पैग़म्बरे इस्लाम की भांति ईश्वरीय संदेश को व्यापक रूप से बयान नही किया इसलिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ मार्गदर्शक के रूप में चुना है। हज़रत अली आगे कहते हैः मैंने तुम्हारे बारे में कसी भी नसीहत से संकोच से काम नहीं लिया और जितना मैंने तुम्हारा भला सोचा है उतना तुम अपने भले के बारे में नहीं सोच सकते। हज़रत अली अलैहिस्सलाम के इस वाक्य का उद्देश्य अपने बेटे को दो तर्कों के आधार पर इन नसीहतों पर अमल करने के लिए प्रेरित करना है। एक तो यह कि इमाम उनके अथाह स्नेह व सहानुभूति के कारण किसी चीज़ से लापरवाही नहीं की और दूसरे यह कि उनके बेटे उस सीमा तक अपने भले के बारे में नहीं सोच सकते जितना उन्होंने सोचा है।