islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. रमज़ानुल मुबारक – 2013 – (8)

    रमज़ानुल मुबारक – 2013 – (8)

    Rate this post

    ईश्वर से आपकी उपासनाओं की स्वीकृति की मनोकामना करते हुए आज के कार्यक्रम का आरंभ मकारिमुल एख़लाक़ की दुआ के एक भाग से कर रहे हैं। इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम ईश्वर से प्रार्थना करते हुए कहते हैः हे प्रभु मुझमें कोई भी ऐसी आदत जो बुरी हो उसे यूंही न रहने दे बल्कि उसे ठीक कर दे और कोई भी अप्रिय आचरण जो मेरी निंदा का कारण बने उसे सुधार कर प्रिय बना दे और कोई भी विशेषता जो मेरे भीतर अधूरी है उसे संपूर्ण कर दे।

     

    इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम दुआ के इस भाग में ईश्वर से अच्छी आदतों की प्रार्थना कर रहे हैं। मनुष्य स्वाभाविक रूप से ख़ुद को पसंद करता है और अपने काम को भी सकारात्मक दृष्टि से देखता है यहां तक कि यदि उसके काम में कोई कमी भी होगी तो चूंकि स्वंय को दोस्त रखता है इसलिए उस कमी पर पर्दा डालने की कोशिश करता है और दूसरों को अपने ऐब से अवगत नहीं होने देता। किन्तु यदि हर व्यक्ति किशोरावस्था से यह मान ले कि उसे अपने कर्मों की ओर से ईश्वर को जवाब देना है, ईश्वरीय शिक्षाओं को सीधे, हलाल और हराम को जाने, अच्छे और बुरु आचरण के अंतर को समझे तो ऐसा व्यक्ति कम ग़लतियां करेगा और यदि ग़लती कर बैठा तो उसके कारण की समीक्षा करेगा। इस संदर्भ में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम का कथन हैः जब ईश्वर किसी बंदे का भला चाहने का इरादा करता है तो उसे धर्म पहचनवा देता है, भौतिक व सांसारिक मामलों की ओर से निश्चिंत कर देता है और उसका ध्यान उसकी अपनी कमियों की ओर उन्मुख कर देता है।

     

    अपनी नैतिक बुराइयों को पहचानने का दूसरा मार्ग यह है कि लोग एक दूसरे के व्यवहार पर ध्यान दें और हर व्यक्ति दूसरे के लिए आइने की भांति हो, उसके अनुसार स्वंय को परखे, अपनी कमियों को पहचाने  और उन्हें सुधारे, अच्छी बातें ले और उन्हें व्यवहार में उतारे।

     

    हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने अपने एक साथी कुमैल बिन ज़्याद से कहाः मोमिन, मोमिन का आयना है क्योंकि बहुत गहराई से उसे देखता है। उसके द्वारा अपनी आत्मिक आवश्यकताओं की पूर्ति और कमियों को दूर करता है तथा अपने मन को सुदंर बनाता है।

     

    अपनी नैतिक बुराइयों को पहचानने का एक और मार्ग यह है कि हर व्यक्ति अपने धार्मिक बंधु से यह अनुरोध करे कि वह उसके व्यवहार के प्रति ध्यान दे। यदि कोई कमी दिखाई दे तो उसे सचेत करे ताकि वह उसे दूर कर सके। इस्लाम के उदय के आरंभिक काल में आत्मनिर्माण के लिए यह शैली प्रचलित थी। इस प्रकार मुसलमान अपनी कमियों से अवगत होते और उसे दूर करते थे। जब भी मस्जिद या मार्ग में एक मुसलमान दूसरे मुसलमान को देखता तो कहता थाः उस पर ईश्वर की कृपा हो जो मेरी कमियां मुझे बता कर मुझ पर उपकार करे और मुझे उपहार दे।

     

    इस बात में संदेह नहीं कि यदि ईश्वर किसी व्यक्ति पर कृपा करे तो उसके उच्च स्थान पर पहुंचने की भूमि प्रशस्त हो जाती है और उसकी कमियां दूर हो जाती हैं। किन्तु इस संदर्भ में इस बिन्दु पर ध्यान देने की आवश्यकता है कि यह सफलता उस समय प्राप्त होगी जब हम सच्चे मन से प्रार्थना करें और उस मार्ग में पूरी लगन से प्रयास करें।

    बहुत से लोगों को उनके जीवन में एक जैसी समस्याओं का सामना होता है किन्तु एक प्रकार की समस्या के संबंध में उनकी प्रतिक्रिया भिन्न भिन्न होती है। कुछ लोग समझदारी से काम लेते हुए अपनी समस्याओं को सबसे सरल मार्ग से हल कर लेते हैं जबकि कुछ दूसरे ऐसे होते हैं तो इस संदर्भ में कठिन मार्ग अपनाते हैं। जीवन का कठिन या सरल होने, समस्याओं के प्रति हमारे दृष्टिकोण पर निर्भर करता है। इस छोटी सी पृष्ठिभूमि के साथ एक कहानी आपकी सेवा में पेश कर रहे हैं।

     

    पुराने समय की बात है एक धनी आदमी, आंख के दर्द में ग्रस्त हो गया। दर्द इतना तेज़ था कि सो नहीं पाता था। उसने नाना प्रकार के उपचार कराए। बहुत से चिकित्सकों के पास गया किन्तु उसका दर्द ठीक न हो सका। इस धनी व्यक्ति ने चिकित्सकों के सुझाव पर यह फ़ैसला किया कि अपने दर्द का उपचार एक प्रसिद्ध सन्यासी से पूछेगा। सन्यासी के पास गया तो उसने धनी व्यक्ति की आंख देखने के बाद उसे सुझाव दिया कि कुछ समय तक हरे रंग के सिवा कोई दूसरा रंग न देखे।

    सन्यासी के पास लौटने के बाद धनी व्यक्ति अपने सारे नौकरों को आदेश दिया कि हरे रंग से भरा पीपा ख़रीद कर पूरे घर में हरे रंग से रंगाई कर दी जाए। इसी प्रकार भर के सारे सामान भी बदल दिए गए। थोड़े समय बाद परिवार के सदस्यों और नौकरों के कपड़े यहां तक कि जो चीज़ दिखाई पड़ती थी उसे हरे रंग का करवा दिया और धीरे धीरे उसकी आंख ठीक हो गयी। थोड़े समय बाद धनवान व्यक्ति सन्यासी का आभार व्यक्त करने के लिए उसे अपने घर आमंत्रित किया। सन्यासी  जब अपने रोगी के घर गया तो उससे पूछा कि तुम्हारी आंखों का दर्द कैसा है? ठीक हुआ या नहीं? धनी व्यक्ति ने भी आभार व्यक्त किया और कहाः जी हां मगर यह सबसे महंगा उपचार था जो मुझे कराना पड़ा।

     

    सन्यासी ने बड़े आश्चर्य से अपने मरीज़ से पूछाः बिल्कुल विपरीत बात है। मैंने तो अब तक का सबसे सस्ता उपचार बताया था। तुम्हारी आंखों के उपचार के लिए केवल इतना ही पर्याप्त था कि तुम हरे रंग के शीशे वाला चश्मा ख़रीद लेते और इतने बड़े ख़र्चे की कोई ज़रूरत न पड़ती। तुम अपने दर्द के उपचार के लिए पूरी दुनिया को नहीं बदल सकते और बूरी दुनिया को हरे रंग का नहीं कर सकते किन्तु अपने दृष्टिकोण को बदल कर दुनिया को अपने काम में ला सकते हो। संसार को बदलने की आशा मूर्खतापूर्ण है किन्तु हमे अपना दृष्टिकोण बदलना सबसे सस्ता व प्रभावी क़दम है। सही सोच रखो ताकि सरल जीवन जी सको।

    कार्यक्रम के इस भाग में नहजुल बलाग़ा के पत्र खंड के इकतीसवें पत्र में हज़रत अली अपने बेटे इमाम हसन को संबोधित करते हुए कहते हैः मेरे बेटे! मैंने तुम्हें इस दुनिया और इसक बदलते हालात और ऊच-नीच के बारे में तुम्हें सूचित किया तथा परलोक और उसके वासियों के लिए जो उपलब्ध कराया गया है उसके बारे में बताया और दोनों से संबंधित उदाहरण तुम्हें पेश किए ताकि उनके द्वारा पाठ लो और सही मार्ग पर क़दम बढ़ाओ। जिन लोगों को इस दुनिया का अनुभव प्राप्त है वे इस दुनिया में स्वंय को ऐसे मुसाफ़िरों की भांति समझते हैं जिन्हें किसी ऐसे स्थान भेजा गया है जहां न तो पानी है और न ही आबादी इसलिए उन्होंने अनुकंपाओं से समृद्ध स्थान की ओर जाने का निर्णय किया और उस गंतव्य तक पहुंचने के लिए उन्होंने मार्ग की कठिनाइयों को सहन किया, दोस्तों की जुदाई पर तय्यार रहे, यात्रा की कठिनाइयों को स्वीकार किया ताकि अपने आराम व चैन के विशाल घर पहुंच सकें। किन्तु जो लोग इस दुनिया में घमंडी हो गए वे ऐसे यात्रियों की भांति हैं जो अनुकंपाओं से भरे स्थान पर हैं और फिर उन्हें एक सूखे एवं अनुकंपाओं से ख़ाली स्थान की ओर जाने की सूचना दी जाती है तो उनके लिए वर्तमान आराम की स्थिति से उस ओर जाने से बढ़ कर कोई दुख व कठिनाइ नहीं है कि वहां उन्हें जाना ही पड़ेगा।

     

    हज़रत अली अलैहिस्सलाम अपनी वसीयत के इस भाग में लोक-परलोक की स्थिति को सदाचारियों और सांसारिक मोहमाया में डूबे हुए लोगों की दृष्टि से बयान करते हुए दो सुंदर उदाहरण देते हैं। उदाहरण से मामलों को समझने में बहुत महत्वपूर्ण योगदान मिलता है चाहे वे मामले बौद्धिक या भावनात्मक हों। उदाहरण द्वारा सुनने वाले को विषय की गहराई समझाई जा सकती है। नहजुल बलाग़ा में बहुत से ऐसे अर्थपूर्ण उदाहरण मौजूद हैं जो वाग्मिता व वाक्पटुता की दृष्टि से चरम सीमा पर हैं। हज़रत अली की इस बात का उद्देश्य यह है कि ईश्वरीय भक्त सांसारिक अनुकंपाओं से लाभ तो उठाता है किन्तु इस संसार की तड़क भड़क से धोखा नहीं खाता। प्रलय, स्वर्ग, और ईश्वरीय अनुकंपाओं पर विश्वास तथा ईश्वरीय वचनों पर आस्था उन्हें इस ओर से संतुष्ट करती है कि वास्तविक शांति व राहत परलोक में मिलेगा। यही कारण है कि ईश्वरीय भक्त इस संसार की कठिनाइयों को पूरी तनमयता से स्वीकार कर सहन करता है क्योंकि जब कोई व्यक्ति किसी उद्देश्य की प्राप्ति का दृढ़ संकल्प करता है तो मार्ग में कांटे उसे रेशम के समान नर्म लगते हैं और कठिनाइयां शहद के समान मीठी लगती हैं।

     

    सांसारिक मोहमाया में डूबे हुए लोग कि जो ईश्वर को याद नहीं करते और पाप में ग्रस्त हैं, वे जानते हैं कि उनका अंजाम नरक है और इसलिए वे मृत्यु से डरते हैं और अपने भविष्य को लेकर भयभीत हैं। ठीक उसी तरह जैसे किसी आबाद व अच्छी जलवायु वाले स्थान से निर्जन व मरूस्थलीय स्थान की ओर यात्रा करें। पैग़म्बरे इस्लाम का एक कथन हैः यह दुनिया मोमिन के लिए जेल और नास्तिक के लिए स्वर्ग है और मृत्यु मोमिन के लिए उनके स्वर्ग की ओर और नास्तिक के लिए उनकी नरक की ओर पुल के समान है।

    एक दिन एक व्यक्ति ने इमाम हसन अलैहिस्सलाम से पूछाः मृत्यु के नाम से हमारा मन क्यों उचाट हो जाता है और हमें अच्छा नहीं लगता? इमाम हसन अलैहिस्सलाम ने जवाब दियाः क्योंकि तुमने अपने परलोक को वीरान बनाया है और अपनी दुनिया को आबाद किया है इसलिए तुम्हें पसंद नहीं कि आबाद स्थान से उजड़े हुए स्थान की ओर जाओ।  http://hindi.irib.ir/