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    रमज़ानुल मुबारक – 2013 – (9)

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    हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम ईश्वर से दुआ करते हुए कहते हैः हे ईश्वरः निकटवर्तियों की शत्रुता को मित्रता में और उनके अलगाव को भलाई और मिलाप में बदल दे।

    जैसाकि आप जानते हैं कि अधिकाशं लोग अपनी आंतरिक मित्रता और शत्रुता जैसी आंतरिक भावना को विभिन्न ढंग से व्यक्त करते हैं जैसे प्रशंसा या निंदा एवं पुष्टि या खण्डन के रूप में और कभी-कभी दूसरे किसी अन्य ढंग से बहुत ही तीव्रता से व्यक्त करते हैं।  किंतु कुछ अन्य जैसे लोग इमाम सज्जाद, ईश्वर ये यह प्रार्थना करते हैं कि निकटवर्तियों की शत्रुता को मित्रता में परिवर्तित कर दे।  जो भी ईश्वर से यह प्रार्थना करता है कि वह उसके निकटवर्तियों की शत्रुता को मित्रता में परिवर्तित कर दे उसे पहले यह सोचना चाहिए कि उसकी शत्रुता मेरे साथ उचित है या अनुचित।  यदि प्रार्थना करने वाले ने किसी अवसर पर अपने किसी निकटवर्ती का अपमान किया हो और उसकी अनुपस्थिति में उसने उसके विरुद्ध ग़लत बातें कही हों तथा यही विषय शत्रुता का कारण बना हो तो इस बात के लिए कि प्रार्थना स्वीकार हो जाए और उसकी शत्रुता, मित्रता में परिवर्तित हो जाए तो उसे अपने व्यवहार में निश्चित रूप से परिवर्तन करना चाहिए।  इसका अर्थ यह है कि प्रार्थना करने वाले को प्रार्थना के समानांतर अपने कार्यों में सुधार करना चाहिए और उसकी कथनी एवं करनी इस प्रकार की होनी चाहिए जो मित्रता का कारण बने।

    यदि सामने वाले की शत्रुता अनुचित हो और दुआ करने वाला नैतिक नियमों का पालन करते हुए सम्मान के साथ अपने परिजनों के साथ व्यवहार करे तो एसी स्थिति में उसपर कोई ज़िम्मेदारी नहीं आती।  उस व्यक्ति के भीतर सुधार, उसके मन के परिवर्तनों पर ही निर्भर है और यह कार्य करने में केवल ईश्वर ही सक्षम है।  केवल ईश्वर ही एसा है जो हृदयों में परिवर्तिन उत्पन्न कर सकता है और शत्रुता के स्थान पर मित्रता को रख सकता है।

    अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए इमाम सज्जाद कहते हैं कि हे ईश्वर, निकटवर्तियों से दूरी को भलाई और मिलन में बदल दे।  इस्लामी शिक्षाओं में जिन विषयों पर बहुत बल दिया गया है और मुसलमानों को जिसके लिए बहुत प्रेरित किया गया है उमें से एक, वह अपने निकटवर्तियों के साथ भलाई करना है।  पैग़म्बरे इस्लाम ने मुसलमानों से कहा है कि तुम अपने निकटवर्तियों के साथ भलाई करो।  चाहे उनके बीच की दूरी एक वर्ष की यात्रा के बराबर क्यों न हो।  निकटवर्तियों के साथ भलाई करना, धर्म का एक महत्वपूर्ण दायित्व है।

    पैग़म्बरे इस्लाम के एक अन्य कथन में आया है कि एक व्यक्ति पैग़म्बरे इस्लाम की सेवा में उपस्थित हुआ।  उसने उनसे कहा कि मेरे कुछ परिजन हैं जिनसे मैं मिलता रहता हूं।  किंतु वे मुझको परेशान करते हैं।  अब मैं उनसे संबन्ध विच्छेद करना चाहता हूं।  इसपर पैग़म्बरे इस्लाम ने कहा कि एसी स्थिति में ईश्वर, तुम सबको त्याग देगा।

    लोक-परलोक में ईश्वरीय ध्यान को अपनी ओर आकृष्ट करने के कारकों में से एक, परोपकार है।  इस बारे में इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम का एक कथन है कि अपने परिजनों के साथ भलाई करने से प्रलय के दिन हिसाब-किताब में आसानी होगी और यह कार्य, मनुष्य को पापों से सुरक्षित रखता है।  बस तुमको अपने परिजनों के साथ मेल-मिलाप रखना चाहिए और अपने मिलने वालों के साथ भलाई करनी चाहिए।  यह भलाई चाहे सलाम करने और उसके जवाब देने की सीमा तक ही क्यों न हो।

    यहां पर हम आपको एक रोचक कहानी सुनाने जा रहे हैं।  लुक़मान हकीम लंबे समय तक एक धनवान, न्यायप्रिय और शिक्षित स्वामी के दास थे।  उसके पास बड़ी संख्या में दास और दासियां थीं।  लुक़मान के भीतर पाई जाने वाली विशेषताओं के कारण स्वामी उनकी ओर अधिक ध्यान दिया करता था।  एक दिन एक निर्धन व्यक्ति उस धनवान व्यक्ति के लिए उपहार में एक ख़रबूज़ा लाया।  स्वामी में ख़रबूज़े को काटा और उसके कई हिस्से किये।  एक भाग के अतिरिक्त सारा ख़रबूज़ा उसने लुक़मान को दे दिया।  लुक़मान ख़रबूज़ा खाते जा रहे थे और साथ ही उसकी मिठास की प्रशंसा भी करते जा रहे थे।  स्वामी ने, जो लुक़मान की बातों से प्रसन्न था, ख़रबूज़े का अपना भाग खाना आरंभ किया।  जैसे ही उसने ख़रबूज़ा खाना आरंभ किया तो देखा कि यह तो बहुत कड़वा है।  स्वामी ने बहुत ही आश्चर्य से लुक़मान से पूछा कि तुम इतने कड़वे ख़रबूज़े को किस प्रकार से इतने चाव से खा रहे हो? लुक़मान ने, जिन्हें हकीम अर्थात तत्वदर्शी का शीर्षक दिया गया था, स्वामी के उत्तर में कहा कि मैंने यह काम दो कारणों से किया है।  पहली बात तो यह है कि उपहार लाने वाला एक बहुत ही निर्धन व्यक्ति था।  वह यह उपहार बहुत ही आशा के साथ आपके पास लाया था।  क्योंकि मैं उसे निराश नहीं करना चाहता था इसलिए मैंने एसा किया।  दूसरी बात यह है कि मैंने आपके द्वारा दी गई बहुत सी वस्तुएं खाई हैं जो सब अच्छी थीं।  एसे में मैंने यह सोंचा कि यह अच्छी बात नहीं है कि मैं आपसे यह कहूं कि यह ख़रबूज़ा बहुत कड़वा है।  क्योंकि मैंने आपके प्रेम भरे हाथों से इस कड़वाहट को लिया है अतः इसको मैं मीठा ही समझता हूं।

    यह कहानी उन अकृतज्ञ लोगों के लिए है जो ईश्वर की अनुकंपाओं से ख़ूब लाभ उठाते हैं।  समय व्यतीत होने के साथ ही उनकी अनुकंपाओं में वृद्धि भी होती जाती है किंतु यदि उनके लिए कोई छोटी सी समस्या भी आ जाती है तो वे ईश्वर की अनुकंपाओं के प्रति वे अकृतज्ञता प्रकट करने लगते हैं और उसकी दी हुई अनुकंपाओं और विभूतियों को भूल जाते हैं।  ईश्वर का वास्तविक दास हर स्थिति में अपने पालनहार का आभार व्यक्त करता रहता है चाहे वह प्रसन्नता की स्थिति में हो या फिर दुख की स्थिति में।  वह अपने ईश्वर की ओर से प्रदान की गई विभूतियों से हर स्थिति में प्रसन्न और सहमत रहता है।

    इस भाग में हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम के पत्र के एक भाग पर चर्चा करेंगे।  इमाम अली अलैहिस्सलाम कहते हैं कि हे मेरे सुपुत्रः जान लो कि जिसके नियंत्रण में धरती और आकाश के ख़ज़ाने हैं उसने तुमको प्रार्थना करने की अनुमति दी है।  और उसी ने तुम्हारी प्रार्थना को स्वीकार किये जाने को भी सुनिश्चित बनाया है।  उसी ने तुमको आदेश दिया है कि तुम उससे मांगो और वह तुमको प्रदान करेगा।  तुम उससे कृपा की मांग करो ताकि तुम भी उसकी क्षमा में सम्मिलित हो जाओ।  ईश्वर ने अपने और तुम्हारे बीच किसी को मध्यस्त नहीं बनाया ताकि तुम्हारे और उसके बीच कोई बाधा न हो और तुमको इस बात के लिए विवश नहीं किया है कि तुम अपने लिए किसी मध्यस्त को ढूंढो।  इमाम अली अलैहिस्सलाम अपने पत्र के इस भाग में लोगों को प्रार्थना करने के लिए प्रेरित करते हुए कुछ बिंदुओं की ओर संकेत करते हैं।  वे कहते हैं कि तुम उससे मांगो जिसके अधिकार में सबकुछ हो अर्थात धरती और आकाश के समस्त ख़ज़ानों का जो स्वामी हो।  एसे में इस बात की प्रबल संभावना पाई जाती है कि मांगने वाले की दुआ स्वीकार होगी।  फिर आप कहते हैं कि उसने तुमको यह अनुमति दी है कि वास्तव में तुम उसकी शरण में उपस्थित हो और उससे मांगो।  यह कृपा का शिखर है कि कोई आवश्यकता रखने वालों को स्वयं से मांगने की अनुमति दे।  वे आगे कहते हैं कि आओ और तुम ईश्वर से जो कुछ चाहते हो उससे मांगो।

    इमाम अली अलैहिस्सलाम आगे कहते हैं कि उसने तुम्हारी प्रार्थना के स्वीकार किये जाने को सुनिश्चित बनाया है।  हज़रत अली का यह वाक्य पवित्र क़ुरआन की इस आयत की ओर संकेत करता है जिसमें कहा गया है कि मुझसे मांगो मैं तुम्हारी सुनूंगा।  ईश्वर से मांगना इतना महत्वपूर्ण है कि यह अनुमति की सीमा से भी आगे की बात है।  हज़रत अली अलैहिस्सलाम कहते हैं कि ईश्वर तुमको आदेश देता है कि उससे मांगो ताकि वह तुम्हारी मांग को पूरा कर सके।   अपने इस पत्र में हज़रत अली अलैहिस्सलाम एक अन्य बिंदु की ओर संकेत करते हैं।  वे कहते हैं कि इस्लाम का आधार इस बात पर है कि लोग अपने पालनहार से सीधे ढंग से संपर्क स्थापित कर सकें।  नमाज़ के दौरान लोग बिना किसी मध्यस्त के सीधे तरीक़े से ईश्वर को संबोधित करते हुए अपनी बात कहते हैं विशेषकर सूरए हम्द में।  इस्लाम ने सबके लिए ईश्वर से सीधे ढंग से संपर्क स्थापित करने का मार्ग खोल रखा है।  पवित्र क़ुरआन की आयतें इस बात की पुष्टि करती हैं विशेषकर वे आयतें जिनका आरंभ “रब्बना” शब्द से होता है अर्थात हे हमारे पालनहार।

    यहां पर यह प्रश्न उठता है कि पैग़म्बरे इस्लाम, उनके पवित्र परिजनों या महापुरूषों को माध्यम बनाना और ईश्वर से सीधे संपर्क स्थापित करने में क्या कोई विरोधाभास पाया जाता है?  इस बारे में पवित्र क़ुरआन के एक व्याख्याकार एवं वरिष्ठ धर्म गुरू आयतुल्लाह नासिर मकारिम शीराज़ी कहते हैं कि एसे में कोई विरोधाभास नहीं पाया जाता क्योंकि ईश्वर से सीधा संपर्क रखना तो स्पष्ट है क्योंकि मुसलमान रात-दिन उससे सीधा संपर्क स्थापित करते हैं।  ईश्वर के लिए माध्यम बनाना और सीधे ढंग से ईश्वर से मांगने में कोई विरोधाभास नहीं है।  दोनो रास्तें कृपालू ईश्वर ही की ओर जाते हैं।  दूसरी बात यह है कि पवित्र क़ुरआन में इस बिंदु पर बल दिया गया है कि किसी के माध्यम से ईश्वर से अपनी बात मनवाना भी उसकी अनुमति से ही है। इस आधार पर ईश्वर से निकट होने के लिए पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पवित्र परिजनों को यदि कोई माध्यम बनाना है तो उसे ईश्वर से कहना चाहिए कि वह उन्हें शफ़ाअत की अनुंमति प्रदान करे।

    दूसरे शब्दों में मनुष्य को चाहिए कि वह अपनी आवश्यकताओं को सीधे ईश्वर से ही मांगे किंतु जब मनुष्य की मांग बहुत महत्वपूर्ण हो या फिर उसने इतने अधिक पाप किये हों कि वह यह समझता हो कि वह एसी स्थिति में अकेला अपनी बात ईश्वर से नहीं मनवा सकता।  एसे में उसे किसी एसे व्यक्ति की आवश्यकता पड़ती है जिसे ईश्वर की ओर से आज्ञा प्राप्त हो।  उदाहरण स्वरूप इस बारे में हज़रत यूसुफ़ के भाइयों की घटना की ओर संकेत किया जा सकता है जो अपने भाई पर भांति-भांति के अत्याचार करके यह समझने लगे थे कि उनके पापा इतने अधिक हैं कि वे अब सीधे ईश्वर से क्षमा याचना नहीं कर सकते।  इसीलिए वे अपने पिता हज़रत याक़ूब के शरण में आए और उन्होंने अपने पिता से कहा, हे पिताः ईश्वर से हमारे पापों के प्रायश्चित के लिए प्रार्थना कीजिए क्योंकि हमने पाप किया है। http://hindi.irib.ir/