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    रहबरे मोअज़्ज़मे इंक़लाबे इस्लामी काहज कमेटी के ज़िम्मेदारों से खि़ताब

    रहबरे मोअज़्ज़मे इंक़लाबे इस्लामी काहज कमेटी के ज़िम्मेदारों से खि़ताब
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    बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम

          ये वो मसाइल हैं जो हज के असली मसाइल हैं। हज को इत्तेहाद का मज़हर होना चाहिये आपसी गुफ़तगू और बातचीत का मज़हर होना चाहिये इसे मुसलमानों की आपसी हमदर्दी, सहायता और नज़दीकी का नुमाइन्दा होना चाहिये। हमें हज को इस सिम्त में ले जाना चाहिये इस रास्ते पर चलना चाहिये। अगर इस मरकज़े इत्तेहाद व यकजहती में कुछ लोग इख़्तेलाफ़ पैदा करना चाहते हों और मक्का व मदीने के मुक़द्दस मक़ामात पर शियों के खि़लाफ़ काम करते हों इनकी जि़यारत इनके मज़हबी बाते व अक़ाइद और दूसरे फ़राइज़ की अदायगी में रूकावट करें, इन पर दबाव डालें इनके अक़ाइद व मुक़ददेसात की तौहीन करें जैसा कि हमें इसकी रिपोर्टें मुसलसल मिलती रहती हैं। इसके जवाब में शिया हज़रात भी कुछ ग़लत क़दम उठाँए तो इससे फ़रीज़-ए-हज की खुली हुई मुख़ालेफ़त होगी यह काम फ़लसफ़-एहज के खिलाफ़ हैं। हज को सही अन्दाज़ से बजा लाना चाहिये पिछले तीस साल के हज और हमारे मौजूदा हज में ज़मीन व आसमान का फ़र्क़ है लेकिन यह काफ़ी नहीं है हमें इस से भी आगे बढ़ना चाहिये ईरानी हाजी को ऐसा होना चाहिये जो हज के हर एक मुसलमान पर फ़र्ज हुआ करती है। परवरदिगारे आलम के सामने में गिड़ गिड़ाना, ख़ुज़ू व ख़ुशू  तो नस्ले क़ुरआने मजीद से लगाव ख़ुदा का ज़िक्र कर दिलों को ख़ुदा से क़रीब करना अपने आप को अच्छाइयों से सजाना चाहिये अपने अन्दर नूर और दूसरी अच्छी ख़ुसूसियात को पैदा करके ख़ाना-ए-ख़ुदा से पलटना यह वो ख़ुसूसियात हैं जिन से हर हाजी को मुज़य्यन (सजा हुआ) होना चाहिये इस के अलावा सियासी और इजतमाई लिहाज़ से आलमे इस्लाम में एक दूसरे की मद्द करने का जज़बा पैदा होना चाहिये। आज आलमे इस्लाम का एक ज़रूरी और फि़ल नूर मसला हमारे पाकिस्तानी भाईयों का मसअला है। अलबत्ता हमारे लोग और हुकूमत ने इस सिलसिले में काफ़ी मदद की है ख़ुदा उन्हें इसका बदला दे लेकिन यह मद्द काफ़ी नहीं है। वो लोग जो फ़रीज़-ए-हज से मुशर्रफ़ हो रहे हैं इन में से सब से पहले ईरानी ज़ायरीन का फ़रीज़ा है कि वो अपने इज़ाफ़ी इख़राजात को कम करें या पाकिस्तान का पड़ौसी होने और वहां के मुतास्सिर अवाम की मुश्किलात से आगाह होने के ऐतबार से अपने पाकिस्तानी भाईयों और बहनों का दुख दर्द बांटने के लिये उनकी मदद करें ख़ुदा के नज़दीक इस का बहुत ज़्यादा अज्र व सवाब है यह एक तमरीन है एक तजुर्बा है इस के अलावा आप दीगर इस्लामी मुमालिक के ज़ायरीन तक भी यह पैग़ाम पहुंचाइये इन्हें भी पाकिस्तानी भाईयों की मदद की तरफ़ राग़िब कीजिये इन में भी इसका जज़बा और शौक़ पैदा कीजिये। वहदत व इत्तेहाद के मसअले को संजीदगी से लीजिये। इस ज़माने में इस्लाम मुख़ालिफ़ ख़ेमों में आलमे इस्लाम की हुकूमतों और क़ौमों को एक दूसरे से लड़ाने की गहरी साज़िशें रची जा रही है। जब आलमे इस्लाम में कोई एैसा वाके़आ रोनुमा होता है जो इस की कु़रबतों का मज़हर होता है तो फ़ौरी तौर पर कोई अमरीकी या सैहूनी बैहरूनी आमिल इस्लामी की हुकूमतों की आपसी नज़दीकी व क़ुरबत में रूकावट हो जाता है जिस किसी मअसले पर इस्लामी हुकूमतों का नुक़तए नज़र एक दूसरे के क़रीब होता है वो इस मसअले को दीनी साजि़शों का निशाना बनाते हैं वो मुसलमान क़ौमों के इत्तेहाद में भी रूकावट डालने पर तुला है। मुसलिम क़ौमों में एक दूसरे से जंग करने का कोई जज़बा नहीं पाया जाता इसलिये इस्लाम दुश्मन ताक़तें उम्मते मुस्लिमा के इत्तेहाद को पारा-पारा करने के लिये बेजा मज़हबी और क़ौमी ताअस्सुबात का सहारा लेती हैं। अगर हम इन चीज़ों से होशियार नहीं रहेंगे तो हमें नुक़सान पहुंच सकता है अगर हम इनकी साजिशों से ख़बरदार नहीं रहेंगे तो इस्लाम को नुक़सान पहुंच सकता है दौरे हाजि़र में आलमी सामराज की इस्लाम दुश्मनी बिल्कुल साफ़ ज़ाहिर है अगरचे वो ज़बान से इस को रद कर रहा है। लेकिन इन अश्कबारी व सामराजी ताक़तों की इसलामी दुश्मनी बिल्कुल ज़ाहिर है यह चीज़े हमारी जि़म्मेदारियों को भी संगीन बना देती है। हम दुआ करते हैं कि परवरदिगारे आलम आप और दूसरे इस्लामी मुमालिक के हुज्जाज किराम को इस बात की तौफ़ीक़ इनायत फ़रमाये कि आप सभी हज़रात इन्शाअल्लाह हर साल एक कामिल और बुलन्द हज की तरफ़ एक क़दम आगे बढ़ायें।

    वस्सलाम अलैयकुम व रहमतुल्लाह व बराकातुहू

    (सूराः हज आयत 28)