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    राजनीति पर वरिष्ठ नेता का दृष्टिकोण

    राजनीति पर वरिष्ठ नेता का दृष्टिकोण
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    हालिया दिनों ईरान में राष्ट्रपति चुनाव हुए। अतः हमने चुनाव, उसके महत्व, उसके परिणाम, चुनावों में जनता की भागीदारी के महत्व, इसके परिणाम, उम्मीदवारों को परखने की शैली आदि विषयों पर इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता के विचार पेश किए। इस कार्यक्रम में हम राजनीति के विषय में इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता के विचार पेश कर रहे हैं। ईरान में इसलामी लोकतांत्रिक व्यवस्था का आधार धर्म और राजनीति पर रखा गया है और इस्लामी गणतंत्र ईरान के विचारकों का कहना है कि धार्मिक नियमों के दायरे में रहते हुए राजनीति की जानी चाहिए। ईरा का पक्ष यह है कि धर्म ही राजनीति और राजनीति ही धर्म है।

    मनुष्य जो गतिविधियां करता है और जो प्रयास अंजाम देता है उनमें कुछ का संबंध उसके व्यक्तिगत मामलों और मुद्दों से होता है जो मनुष्य के जीवन की कुल गतिविधियों का एक छोटा भाग है। उदाहरण स्वरूप रोज़गार, अध्यात्मिकता, भवनाएं अनुभूतियां आदि इसी प्रकार अन्य लोगों से उसके संबंध तथा रिश्ते आदि उसके व्यक्तिगत विषयों और मुद्दों में आते और गिने जाते हैं। मनुष्य के जीवन की गतिविधियों, प्रयासों और कामों का अधिक महत्वपूर्ण भाग वह है जो वह अन्य लोगों के साथ मिलकर सामूहिक रूप से सामाजिक स्तर पर अंजाम देता है, इसी को राजनीति कहते हैं। अब राजनीति के भी कई भाग और प्रकार हैं। आर्थिक राजनीति, सामाजिक राजनीति, रक्षात्मक राजनीति, सांस्कृतिक राजनीति, विश्व राजनीति यह मानव जीवन के अति महत्वपूर्ण और मूल विषय तथा गतिविधियां हैं। मूल गतिविधियां इन्हें क्यों कहा जाता है? मूल गतिविधियां इस लिए कहा जाता है कि यह राजनीति के यह विभिन्न रूप मानवीय गतिविधियों को विशेष दिशा और रूख़ की ओर मोड़ते और ले आगे ले जाते हैं। मनुष्य की सबसे बड़ी कोशिश और चेष्टा वह होती है जिसके माध्यम से वह व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत, सामान्य और छोटी मोटी गतिविधियों को भी लक्ष्यपूर्ण व उद्देश्यपूर्ण बना लेता है और इन विशेष व्यक्तिगत विषयों और मामलों को भी लक्ष्यपूर्ण तथा उद्देश्यपूर्ण बना लेता है। धर्म का संबंध इन दोनों भागों की गतिविधियों से है और धर्म के नियम दोनों भागों में लागू होते हैं। व्यक्तिगत गतिविधियों के भाग में भी और राजनीति से जुड़े भाग के बारे में भी जो मानव जीवन का बहुत बड़ा और विस्तृत भाग है, धर्म दोनों से जुड़ा हुआ है।

    पवित्र नगर मक्का से मदीने की ओर पलायन करने के बाद पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम का सबसे पहला क़दम, सरकार के गठन और समाज को राजनैतिक सुप्रबंधन के अधीन लाने का क़दम था। पैग़म्बरे इस्लाम ने सरकार गठित करके समाज को सही ढर्रे पर लगाया। दूसरे अनेक साक्ष्य हैं जो धर्म और राजनीति के गहरे संबंध की गवाही देतें हैं और इस मज़बूत रिश्तो को प्रमाणित करते हैं। निश्चित रूप से पैग़म्बरे इस्लाम का लाया हुआ धर्म इस्लाम राजनीति को धर्म का अटूट अंग ठहराता है। सभी मुसलमानों को इस धर्म ने जहां व्यक्तिगत जीवन के संबंध में महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं और धार्मिक नियमों को अंजाम देने का आदेश दिया है वहीं राजनैतिक सूझबूझ, राजनैतिक बोध और राजनैतिक गतिविधियों का निमंत्रण भी दिया है।

    इस्लाम धर्म तथा सभी आसमानी धर्मों में ईश्वर की ओर से भेजे गए धर्म और धार्मिक शिक्षाओं को राजनीति, ज्ञान विज्ञान, मानवीय जीवन और सामाजिक विषयों व मामलों में केन्द्रीय स्थान दिया गया है। धर्म सभी विभागों और क्षेत्रों के लिए राजनैतिक व सामाजिक क्षेत्रों तथा मानव जीवन को संगठित और प्रबंधित करने के लिए प्रयोग किया जाने वाला मत है। इसी से इन क्षेत्रों को सही दिशा और प्रबंधन मिलता है।

    साम्राज्यवाद का अभिषाप जिसने दर्जनों देशों, राष्ट्रों और दसियों लाख इंसानों, महिलाओं, पुरुषों बच्चों और बूढ़ों को वर्षों तक अति कठिन परिस्थितियों में गिरफ़तार किए रखा, वास्तव में यह अभिषाप अध्यात्म से ज्ञान की दूरी का परिणाम है, अध्यात्म से राजनीति के अलग हो जाने का दुष्परिणाम है, सत्ता की शिष्टाचारिक नियमों से जुदाई का परिणाम है और यह जुदाई और दूरी यूरोप में सबसे पहले दिखाई दी। पहला और दूसरा विश्व युद्ध, साम्यवाद, पारिवरिक ढांचे को अस्त व्यस्त होकर ढह जाना, यौन दुराचारों और बुराइयों का सैलाब, पूंजीवादी समाज व पूंजीवादी शासन व्यवस्था का अत्याचार व अन्याय, यह सब कुछ इसी जुदाई और धर्म से राजनीति की दूरी का परिणाम और देन है।

    यह जो हम कहते हैं कि हमारी राजनीति ही हमारा धर्म और हमारा धर्म ही हमारी राजनीति है यानी दोनों एक दूसरे से इस प्रकार जुड़े हुए और एक दूसरे में इस प्रकार विलीन हैं कि इन्हें एक दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता, तो यह बिल्कुल सच्चाई है। महान बुद्धिजीवी और धर्मगुरू शहीद मुदर्रिस ने कितनी अच्छी बात कही और इस्लामी क्रान्ति के संस्थापक इमाम ख़ुमैनी ने भी उनकी इस बात की पुष्टि की और उनके इस नारे को इस्लमी गणतंत्र ईरान का खुला हुआ संदेश बताया, कि हमारी राजनीति ही हमारा धर्म और हमारा धर्म ही हमारी राजनीति है। इस नारे का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि हमारी राजनीति, धार्मिक नियमों के अनुरूप और पवित्र होना चाहिए, राजनीति पूरी पवित्रता और धार्मिक नियमों के अनुरूप होना चाहिए। हर राजनैतिक काम अच्छा नहीं होता। कुछ लोग राजनैतिक मामलों, विषयों और गतिविधियों को एसी दृष्टि से देखते हैं मानो उनका धर्म और नैतिकता से दूर दूर का रिश्ता भी नहीं है। लक्ष्य यह होता है कि इस काम को पूर्ण रूप से राजनैतिक ढंग से अंजाम देना चाहिए, अर्थात इसमें धार्मिक और नैतिक मूल्यों व नियमों को दृष्टिगत रखने की आवश्यकता नहीं है, इस्लामी गणतंत्र ईरान के दृष्टिकोण से यह बात ग़लत है। इस्लामी गणतंत्र ईरान का कहना है कि राजनैतिक कार्य और गतिविधियां धार्मिक दायरे में और धार्मिक नियमों के अनुरूप होनी चाहिएं। धार्मिक नियमों का पालन और सम्मान किया जाना चाहिए।

    अलबत्ता, राजनीति के सामने दो ख़तरे हमेशा मौजूद रहे हैं। कोई भी दौर और युग है राजनीतिक गतिविधियां अंजाम देने वालों के सामने यह ख़तरे हमेशा मौजूद रहे हैं। एक ख़तरा है राजनीति का अध्यात्म, नैतिकता और शिष्टाचारिक गुणों से अलग और रिक्त हो जाना अर्थात राजनीति पर दुष्टता और शैतानी सोच का वर्चस्व हो जाए, राजनीति लोगों की अंतरिक इच्छाओं और सांसारिक व भौतिकवादी भूख को शांत करने का साधन बन जाए, राजनीति समाजों के शाक्तिशाली और दौलतमंद लोगों के हितों के जाल में फंसकर कभी इधर तो कभी उधार खींची जाए। अर्थात शाक्तिशाली और धनवान लोग राजनीति को अपने अपने हितों के अनुरूप कभी किसी दिशा में तो कभी किसी और दिशा में ले जाएं। यदि राजनीति इस मुसीबत का शिकार हुई तो मानवीय जीवन और मानव समाज के सभी क्षेत्र अनगिनत समस्याओं का शिकार हो जाएंगे। राजनीति के लिए दूसरा ख़तरा यह है कि संकीर्ण सोच और संकीर्ण बुद्धि के लोग, बचकाना सोच और अपरिपक्व लोग, अयोग्य तथा अक्षम लोग इस पर हावी हो जाएं। राजनीति सक्षम और सूझबूझ वाले लोगों के हाथों से निकलकर अक्षम व अयोग्य लोगों के हाथों में पहुंच जाए। यह दूसरा बहुत बड़ा ख़तरा है। यदि एसा हुआ तो राजनीतिक गतिविधियों के माध्यम से सामाजिक स्तर पर जो अच्छे परिणाम निकलते हैं वह विलुप्त हो जाएंगे तथा हर ओर तबाही व विध्वंस के लक्षण उभरने लगेंगे। राजनीति, समाज के मामलों के समाधान का मार्ग और कार्यशैली होने के बजाए सामाजिक टकराव और सामाजिक विध्वंस का माध्यम बन जाएगी।
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