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    राजा की असाध्य बीमारी-2

    राजा की असाध्य बीमारी-2
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    पिछले कड़ी में हमने यह बताया था कि प्राचीन काल में एक शासक असाध्य रोग में ग्रस्त हो गया था। कोई भी वैध उसकी बीमारी को पहचान कर उसका उपचार नहीं कर सका। इसी बीच यूनान के एक अनुभवी चिकित्सक को राजा के उपचार के लिए दरबार में लाया गया। तै यह पाया कि वह वहां के कुछ अनुभवी चिकित्सकों के साथ शासक के लिए दवा तैयार करे। कुछ समय तक शोध के पश्चात यूनानी वैध ने मंत्रियों की बैठक में अपने शोध कार्य का उल्लेख किया। यूनानी वैध ने कहा कि मैंने राजा के उपचार के लिए दवा ढूंढ ली है किंतु राजा के उपचार के लिए हम किसी अन्य व्यक्ति की जान लेने के लिए विवश हैं। उसने स्पष्ट किया कि शासक के उपचार के लिए एक व्यक्ति के पित्ते की आवश्यकता है जिसमें कुछ विशेषताएं पाई जाती हों। इसके बाद उसने कहा कि अब आप ऐसे व्यक्ति को ढूंढकर लाइए जिसमें वे विशेषताएं पाई जाती हों जो मेरे दृष्टिगत हैं। प्रधानमंत्री ने वैध से पूछा कि उस व्यक्ति में कौन सी विशेषताएं होनी चाहिए? यूनानी वैध ने कहा कि उसमें बहुत सी विशेषताएं पाई जाती हों जिन्हें मैं मौक़े पर कहूंगा किंतु सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि वह किशोर हो। ऐसा किशोर जो १२ साल पूरे कर चुका हो। प्रधानमंत्री ने पुनः पूछा कि क्या निश्चित रूप से वह किशोर ही हो? वैध ने कहा कि हां किशोर ही हो और वह भी युवक हो युवती न हो। वैध ने आगे कहा कि इसके अतिरिकत भी उसमें कुछ विशेषताएं होनी चाहिए जो मौक़ा आने पर बताऊंगा। प्रधानमंत्री ने मंत्रियों और चिकत्सकों को संबोधित करते हुए कहा कि इस संबन्ध में आपका क्या विचार है? क्या हमें इस बात की अनुमति है कि हम शासक के उपचार के लिए किसी निर्दोष बच्चे की हत्या करें? मंत्रियों में से एक ने कहा कि इस विषय पर हमें बैठकर विचार-विमर्श करना चाहिए। प्रधानमंत्री ने पहले तो शासक से इस संबन्ध में वार्ता की। शासक जो एक भला व्यक्ति था अपने प्रधानमंत्री की बात सुनकर बहुत दुखी हुआ। उसने कहा कि मैं इस बात के लिए तैयार नहीं हूं कि मेरे उपचार हेतु किसी एक निर्दोष किशोर की हत्या की जाए। शासक की बात सुनकर प्रधानमंत्री ने कहा कि आपको यह भी समझना चाहिए कि यदि ईश्वर न करे आपको कुछ हो जाए तो देश में अराजकता फैल जाएगी और ऐसी स्थिति में एक किशोर के स्थान पर हज़ारों लोगों का जीवन ख़तरे में पड़ जाएगा। यह सुनकर शासक ने कहा कि मुझको पता नहीं। अब तुम अधिकारियों की एक बैठक बुलाओ। इस बैठक में समस्त मंत्रियों, गणमान्य लोगों और वैधों को भाग लेना चाहिए। बैठक में जो भी निर्णय लिया जाएगा उसे मैं स्वीकार करूंगा। प्रधानमंत्री ने जल्दी में एक बैठक बुलाई और एक दिन के लंबे विचार-विमर्श के पश्चात उपस्थित सब लोग इस बात पर सहमत हुए कि शासक के मरने से यह बेहतर है कि कोई सामान्य व्यक्ति मरे ताकि देश अराजकता का शिकार न हो जिसके कारण हज़ारों लोगों का जीवन ख़तरे में पड़ जाए। जब बैठक में लिए गए निर्णय से शासक को अवगत करवाया गया तो यह तै पाया कि अब उस किशोर की तलाश की जाए जिसमें यूनानी वैध द्वारा बताई गई विशेषताएं मौजूद हों। ऐसे किशोर की तलाश के लिए राजा के आदमियों को भेज दिया गया। अंततः एक गांव में वैसा बच्चा मिल गया जिसमें वैध की बताई विशेषताएं मौजूद थीं। मां-बाप के साथ उस बच्चे को राजा की सेवा में लाया गया। किशोर के माता-पिता से राजा ने पूरी बात बता दी। वे लोग भी इस बात के लिए तैयार हो गए कि उनके बेटे को राजा के उपचार के लिए बलि चढ़ाया जाएगा। राजा ने अपने सेवकों को आदेश दिया कि बच्चे के मां-बाप को मूल्यवान उपहार दिये जाएं। जिस दिन राजा के उपचार के उद्देश्य से किशोर के शरीर से उसका पित्ता निकालना था उस दिन किशोर के माता-पिता, स्वयं राजा तथा दरबार के सारे ही लोग वहां पर उपस्थित थे। पहले न्यायाधीश ने बात आरंभ की। उसने कहा कि मैं देश के वरिष्ठ न्यायाधीश होने के नाते फ़तवा देता हूं कि राजा के स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए यदि किसी एक व्यक्ति की जान ली जाए तो कोई बात नहीं है। इसके पश्चात प्रधानमंत्री ने आदेश दिया कि जल्लाद आकर किशोर की बलि चढ़ाए। थोड़ी देर में जल्लाद आ गया और उसने तलवार अपने हाथ में लेकर ऊपर उठाई ताकि आदेश मिलते ही वह किशोर की गर्दन काट दे। इसी बीच किशोर ने एक बार अपना सिर ऊपर उठाया और आकाश की ओर देखते हुए मुस्कुराया। जितने लोग भी वहां पर उपस्थित थे वे बच्चे की इस हरकत से बहुत आश्चर्यचकित रह गए। वे लोग यह सोच रहे थे कि इस किशोर का अन्तिम समय है और कुछ ही क्षणों में इसका काम तमाम हो जाएगा। ऐसे में वह क्यों मुस्कुरा रहा है? किशोर की इस हरकत पर राजा ने उससे पूछा तुम जिस स्थिति में हो उस स्थिति में हंसने की क्या ज़रूरत है? इसके उत्तर में किशोर ने कहा कि जब किसी बच्चे पर अत्याचार होता है तो पहले वह इसकी शिकायत अपने माता-पिता से करता है किंतु मेरे माता-पिता ने हत्या के लिए मुझको बेच दिया और मेरे स्थान पर पैसे को वरीयता दी है। ऐसी स्थिति में मैं अपनी शिकायत उनसे नहीं कर सकता। यदि किसी के माता-पिता न हों तो वह अपनी शिकायत लेकर न्यायाधीश के पास जाता है किंतु न्यायाधीश ने देश की सुरक्षा के लिए मेरी हत्या का आदेश जारी किया है। ऐसी स्थिति में मैं अपनी शिकायत न्यायाधीश से भी नहीं कर सकता। अब ऐसे में कोई निर्दोश क्या करे? स्वाभाविक सी बात है कि ऐसे में वह राजा की शरण में जाएगा और अपनी समस्या को उसकी सेवा में प्रस्तुत करेगा किंतु राजा ने भी मेरी हत्या का आदेश जारी कर रखा है। ऐसे में में मैं अपनी शिकायत न तो माता-पिता से कर सकता हूं, न न्यायधीश से और न ही राजा से और न ही किसी अन्य से। अब अगर कोई बचता है जिसकी सेवा में अपनी समस्या को ले जाया जाए तो वह केवल ईश्वर है। यही कारण है कि मैं आकाश की ओर देखकर मुस्कुराया और जो कुछ मेरे मन में था उसे मैंने मुस्कुराते हुए ईश्वर की सेवा में रखा। किशोर की बात से राजा बहुत प्रभावित हुआ और वह रोने लगा। राजा ने कहा कि किसी भी निर्दोष की हत्या से यह उचित है कि मैं मर जाऊं। यह कहने के बाद राजा ने किशोर को अपने गले लगाया और उसे प्यार किया। फिर उसको बहुत से उपहार देकर विदा कर दिया। कहते हैं कि इसके बाद राजा की बीमारी भी समाप्त हो गई।