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    रियासत-ए-इस्राईल की हक़ीक़त -2

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    यहूदियों की भारी तादाद में नक़्ल-मकानी:

    यूरोप से मज़ीद यहूदी आने के कारण 1918 ईसवी में फ़िलिस्तीन में उनकी संख्या 67000के निकट थी। बरतानवी मर्दुम-शुमारी के मुताबिक़ (जोकि अरबों के हक़ में नहीं हो सकती थी)1922 ईसवी में यहूदियों की संख्या 11 प्रतिशत तक पहुंच गई थी। यानी 667500 मुसलमान थे और 82500 यहूदी थे। 1930 ईसवी तक बरतानवी सरपरस्ती में मज़ीद 300000 से अधिक यहूदी यूरोप और रूस से फ़िलिस्तीन पहुंचाए गए जिससे अरबों में बेचैनी पैदा हुई। अगस्त1929 ईसवी में यहूदियों और फ़िलिस्तीनी मुसलमानों में झड़पें हुईं जिनमें सवा सौ के क़रीब फ़िलिस्तीनी और लगभग इतने ही यहूदी मारे गए। इन झड़पों की शुरुआत सैहूनियों ने की थी लेकिन बरतानवी पुलिस ने सैहूनियों के ख़िलाफ़ कोई क़दम नहीं उठाया। बरतानिया के रॉयल कमीशन, जिसका सरबराह लॉर्ड पील था, ने 1937 ईसवी में तजवीज़ दी कि फ़िलिस्तीन को विभाजित करके तीसरा हिस्सा यहूदियों को दे दिया जाए, जबकि उस वक़्त फ़िलिस्तीन में यहूदियों की इम्लाक न होने के बराबर थी। फ़िलिस्तीनी इस के विरुद्ध दो वर्ष तक अहतेजाज करते रहे। वो चाहते थे कि विभाजन न किया जाय और केवल अल्प-संख्यकों को तहफ़्फ़ुज़ फ़राहम किया जाय। इस पर बरतानिया से मज़ीद सेना मंगवाकर फ़िलिस्तीनियों के अहतेजाज को सख़्ती से कुचल दिया गया। 1939 ईसवी में दूसरा विश्व-युद्ध शुरु हो गया और फ़िलिस्तीन का मामला पस-ए-मंज़र में चला गया। मगर सैहूनियों ने अवसर से फ़ायदा उठाते हुए यूरोप से फ़िलिस्तीन की ओर नक़्ल-मकानी जारी रखी।

    फ़िलिस्तीन में यहूदी रियासत की स्थापना का उद्देश्य एक सैहूनी अड्डा बनाना था जो वहां से फ़िलिस्तीनियों के निष्कासन और उनकी जायदादों पर क़ब्ज़े के बग़ैर पूरा नहीं हो सकता था। चुनांचे, ज्यों-ज्यों यूरोप से यहूदी आते गए, त्यों-त्यों फ़िलिस्तीनियों को वहां से निकलने पर मजबूर किया जाता रहा। बरतानिया ने दूसरे विश्व-युद्ध से होश संभलने के पश्चात 1947 ईसवी में फ़िलिस्तीन का मामला अक़्वाम-ए-मुत्तहिदा के हवाले कर दिया। उस वक़्त तक फ़िलिस्तीन में यहूदियों की तादाद एक-तिहाई हो चुकी थी, लेकिन वो फ़िलिस्तीन की सिर्फ़ 6 फ़ीसद ज़मीन के मालिक थे। यू.ऐन.ओ. ने एक कमेटी बनाई जिसने साज़िश की कि फ़िलिस्तीन के साढ़े 56फ़ीसद इलाक़े पर केवल 6 फ़ीसद के मालिक यहूदियों की रियासत इस्राईल बना दी जाए और साढ़े 43 फ़ीसद इलाक़े में से बैतुल-मुक़द्दस को अन्तर्राष्ट्रीय बनाकर बाक़ी तक़रीबन 40 फ़ीसद फ़िलिस्तीन को 94 फ़ीसद फ़िलिस्तीन के मालिक मुसलमानों के पास रहने दिया जाय। 29नवंबर 1947 ईसवी को यू.ऐन. जनरल असेम्बली ने 13 के मुक़ाबले में 33 वोटों से इसकी मंज़ूरी दे दी। 10 सदस्य अनुपस्थित रहे। फ़िलिस्तीनियों ने इस तजवीज़ को मानने से इनकार कर दिया और सैहूनियों ने फ़िलिस्तीनी मुसलमानों पर ताबड़तोड़ आक्रमण शुरु कर दिये। अक़्वाम-ए-मुत्तहिदा की क़रारदाद के अनुसार इस्राईल तीन टुकड़ों में था।