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    रियासत-ए-इस्राईल की हक़ीक़त – 6

    रियासत-ए-इस्राईल की हक़ीक़त – 6
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    बीस मीटर या छियासठ फ़ीट ऊंची दीवार कैसे टूटी:

    मिस्री सेना के एक तबक़े पर 1967 ईसवी की पराजय ने गहरा असर छोड़ा था। अनवरुस्सादात के राष्ट्रपति बनते ही उन्होंने अपना सहरा-ए-सीनाई का इलाक़ा इस्राईल से वापस लेने की तजावीज़ देना शुरु कर दीं। उस समय तक इस्राईल ने बुलडोज़रों की मदद से स्वेज़ नहर के किनारे-किनारे बीस मीटर ऊंची रेत की दीवार बना दी थी। मिस्री सेना नील नदी के किनारे एक रेत की दीवार बना कर उसे पार करने के अभ्यास करने लगी। उनको बहुत मायूसी हुई क्योंकि हर प्रकार के बम और मिज़ाइल रेत की दीवार में शिगाफ़ डालने में असफल रहे। होता यों था कि मिज़ाइल रेत के अंदर फटता, मगर दीवार को ख़ास नुक़्सान न होता।

    आम मुशाहिदे की बात है कि रेत का ढेर लगाया जाए तो रेत सरक कर ज़मीन के साथ अधिक से अधिक 40 अंश का कोण बनाती है। इस तरह रेत की दो मीटर ऊंची दीवार के लिये बुनियादी बाक़ायदा साढ़े पांच मीटर चौड़ा बनता है जबकि ऊपर से चौड़ाई सिफ़र हो। अगर 20मीटर ऊंची रेत की दीवार बनाई जाए, जिसकी ऊपरी चौड़ाई सिर्फ़ पांच मीटर रखी जाए, तो ज़मीन पर उसकी चौड़ाई 60 मीटर या 197 फ़ीट होगी। इतनी चौड़ी दीवार को तोड़ना नामुमकिन समझ कर ही इस्राईल ने यह दीवार बनाई होगी। रेत को अगर किसी जगह से भी हटाएं तो उसके ऊपर और दाएं-बाएं वाली रेत उसकी जगह ले लेती है।

    मिस्री फ़ौज का एक मेजर था जो इन्जीनियर था और रेत की दीवार गिराने के नाकाम तजर्बे देखता रहा था। एक दिन डिवीज़न कमांडर ने इस मामले पर ग़ौर के लिये तमाम ऑफ़ीसर्स का इजलास तलब किया। उस मेजर ने तजवीज़ दी कि रेत की दीवार आतिशीं असलहे के स्थान पर पानी से गिराई जा सकती है। मगर कमांडर ने उस मेजर की हौसला-अफ़्ज़ाई न की। वह मेजर धुन का पक्का था। उसने कहीं से एक पानी फेंकने वाला पम्प लेकर एक कश्ती पर नस्ब किया और रेत की एक छोटी-सी दीवार बना कर नील नदी का पानी उस पम्प से नोज़ल की सहायता से रेत की दीवार पर एक ही स्थान पर फेंकता रहा। थोड़ी देर में रेत की दीवार में शिगाफ़ बन गया। उसने अपने कमांडर को बताया, मगर कमांडर ने फिर भी हौसला-अफ़्ज़ाई न की।

    कुछ अरसे बाद सद्र अनवरुस्सादात उस इलाक़े के दौरे पर आया तो उस मेजर ने उसके सामने तजर्बा करना चाहा। मगर कमांडर ने टाल दिया। बाद में किसी प्रकार उस मेजर की अनवरुस्सादात से मुलाक़ात हो गई और मेजर ने उससे अपने तजर्बे का ज़िक्र किया। अनवरुस्सादात ने मेजर से कहा कि गोपनीय रूप से तजर्बा करता रहे और फिर हिसाब लगाकर बताए कि 20 मीटर ऊंची दीवार में शिगाफ़ डालना मुमकिन है भी या नहीं। मेजर दिलैर हो गया और देश में सबसे बड़ा पम्प हासिल करके रेत की बड़ी दीवार बनाकर तजर्बा किया जो कामयाब रहा। अब समस्या यह थी कि उससे बड़े पम्प चाहिये थे जो केवल विशेष तौर पर ऑर्डर देकर यूरोप की किसी बड़ी कम्पनी से बनवाए जा सकते थे और राज़ फ़ाश होने का ख़तरा भी था। बहरकैफ़ किसी तरह बहुत बड़े पम्प बनवाकर दर-आमद कर लिये गए। फिर मज़बूत नावें बनाई गईं। छ: नावों पर छ:-छ: पम्प नस्ब किये गए।

    1973 ईसवी के माह-ए-रमज़ान में गोलों की बरमार के दौरान ये नावें स्वेज़ नहर में उतार दी गईं और 20 मीटर ऊंची दीवार के तीन मक़ामात का रुख़ करके तीन नावों के पम्प चला दिये गए। छ: नावों के पम्प बारी-बारी चलाए गए और चंद घंटों में 20 मीटर ऊंची दीवार में तीन जगहों पर काफ़ी चौड़े शिगाफ़ बन गए। पुल बनाकर मिस्री सेना टैंकों सहित सहरा-ए-सीनाई में दाख़िल हो गई और रेत की दीवार के दूसरी तरफ़ मौजूद सारी इस्राईली सेना का सफ़ाया कर दिया। तो जनाब, यह था पानी का कमाल और मैकेनिकल इन्जीनियरिंग के इल्म का कमाल।