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    रियासत-ए-इस्राईल की हक़ीक़त – 7

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    दहशतगर्द हुक्मरां :

    चीफ़-ऑफ़-स्टाफ़ इस्राईल आर्म्ड फ़ोर्सेज़ तो 1953 ईसवी में ही एक बदनाम-ज़माना आतंकवादी मोशे दायान बन गया था मगर सैहूनी आतंकवादी संगठन (अरगोन, लेही, हेरोत, लेकोड इत्यादि) इस्राईल में 1977 ईसवी तक हुकूमत में न आ सकीं। इसके बावुजूद फ़िलिस्तीनी मुसलमानों पर ज़ुल्मो-तशद्दुद होता रहा। 1977 ईसवी में अरगोन के लीडर मनाख़म बेगन ने प्रधानमंत्री बनते ही ग़ज़ा और शेष इलाक़े में जिनपर 1967 ईसवी में क़ब्ज़ा किया गया था, ज़मीनी हक़ाइक़ को बदलने के लिये तेज़ी से यहूदी बस्तियां बसानी शुरू कर दीं ताकि कोई उनसे इलाक़ा ख़ाली न करा सके। इन सैहूनी तंज़ीमों का प्रोग्राम एक बहुत बड़ी सैहूनी रियासत बनाने का है। यह नक़्शा थियोडोर हर्त्सल जिसने सैहूनी रियासत की तजवीज़ 1896 ईसवी में पेश की थी, ने ही तजवीज़ किया था और यही नक़्शा 1947 ईसवी में दुबारा रब्बी फ़श्मन ने पेश किया था।

    इस्राईल ने 1982 ईसवी में लेबनान पर बहुत बड़ा आक्रमण करके उसके बहुत-से इलाक़े पर क़ब्ज़ा कर लिया। इस्राईली सेना ने फ़िलिस्तीनी शरणार्थियों के दो कैम्पों साबिरा और शतीला को घेरे में लेकर अपने हथियारबन्द हवारियों फ़्लेन्जस्टिस की सहायता से वहां रह रहे चार हज़ार निहत्थे फ़िलिस्तीनी शरणार्थियों को क़त्ल करा दिया जिनमें औरतें, बच्चे और बूढ़े सम्मिलित थे। यह कार्रवाई एरियल शेरॉन के आदेश पर की गई थी जो उन दिनों इस्राईल का वज़ीर-ए-दिफ़ा था। इन हक़ाइक़ से बख़ूबी अन्दाज़ा लगाया जा सकता है कि कौन आतंकवादी है, फ़िलिस्तीनी मुसलमान या इस्राईली सैहूनी?

    मुसलमान तो एक तरफ़ अरब ईसाइयों और अरब यहूदियों को, जो कि फ़िलिस्तीन के निवासी हैं, उनको फ़िलिस्तीन में वह मक़ाम हासिल नहीं है जो बाहर से आए हुए सैहूनी यहूदियों को हासिल है। इसका एक सुबूत यहूदी पत्रकार शमीर है जो इस्राईल ही में रहता है। दीगर जिस लड़की लैला ख़ालिद ने फ़िलिस्तीन की आज़ादी की तहरीक को उजागर करने के लिये दुनिया में सबसे पहला हवाई जहाज़ अपहरण किया था, वह ईसाई थी। फ़िलिस्तीन को यहूदियों से आज़ाद कराने के लिये लड़ने वाले गोरिल्लों के तीन लीडर जॉर्ज हब्श, वादी हदाद और जॉर्ज हवात्मे ईसाई थे। इत्तिफ़ाक़ देखिये कि हन्नान अश्रावी, हन्ना सीनी और अफ़ीफ़ सफ़ीहा जिन्होंने ओस्लो मुआहिदा कराने में महत्त्वपूर्ण किरदार अदा किया, वो भी ईसाई ही है।