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    रियासत-ए-इस्राईल की हक़ीक़त – 8

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    यहूदी रियासत का हक़:

    “ग़ैर तो ग़ैर हुए अपनों का भी याराना हुआ” के मुस्दाक़ कुछ मुसलमान भाइयों का भी यह ख़याल है कि इस्राईल यहूदियों का हक़ था। या यह कि चूंकि इस्राईल बन चुका है इसलिये इस हक़ीक़त को स्वीकार कर लेना चाहिये। जहां तक रियासत के हक़ का मामला है तो इसकी कुछ तो ज़मीनी बुनियाद होना चाहिये।

    ऊपर की तहरीर में जो ऐतिहासिक सच्चाइयां बयान की गई हैं, वो यहूदी रियासत की नफ़ी करते हैं। मज़ीद मैं दस्तावेज़ी हक़ीक़त बयान कर चुका हूं कि हज़रत इसहाक़ अलैहिस्सलाम मस्जिदुल-अक़्सा में इबादत करते रहे, मगर हज के लिये वह मक्का-ए-मुकर्रमा में ख़ाना-ए-काबा ही जाते थे। उनके पोते हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम जब मिस्र के बादशाह बने तो उन्होंने अपने ख़ानदान के इकत्तीस व्यक्तियों को, जिनमें उनके वालिद हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलाम और सारे भाई भी शामिल थे, मिस्र बुला लिया था। बनी इस्राईल के यहूदी पहले ही दौलत और सरवत की ख़ातिर फ़िलिस्तीन छोड़कर मिस्र में आबाद हो गए थे और मिस्रियों के ग़ुलाम होना स्वीकार कर चुके थे। हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलाम ने जाते हुए मस्जिदुल-अक़्सा फ़िलिस्तीनी बाशिन्दों के सुपुर्द कर दी थी जोकि नेक लोग थे मगर बनी इस्राईल में से नहीं थे।

    हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के 300 साल बाद हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम मिस्र में पैदा हुए। जिस सरज़मीन पर यहूदी अपनी मीरास होने का दावा करते हैं, उसे उन्होंने अपनी मर्ज़ी से हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम से 400 साल पेशतर ख़ैरबाद कह कर मिस्र में दौलत की ख़ातिर ग़ुलाम बनना स्वीकार किया था।

    हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के 40 साल पश्चात तक बनी-इस्राईल सहरा-ए-मीनाई में भटकते रहे। यहां तक कि उनकी अगली पीढ़ी आ गई जिसमें हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम पैदा हुए और उन्होंने भटकी हुई बनी-इस्राईल को फ़िलिस्तीन जाने को कहा। बयान किया जा चुका है किस तरह हज़रत दाऊद अलैहिस्सलम फ़िलिस्तीन के बादशाह बने। अव्वल तो हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम यहूदी न थे बल्कि क़ुरान-शरीफ़ के मुताबिक़ मुस्लिम थे। लेकिन अगर यहूदियों की बात मान भी ली जाए तो भी यह हुकूमत उस समय मुकम्मल तौर पर समाप्त हो गई थी जब आज से 2591 वर्ष पूर्व बाबुल वालों ने उस पर अधिकार करके इबादतगाह सहित सब कुछ ध्वस्त कर दिया था और बनी-इस्राईल को वहां से निकाल कर अपना ग़ुलाम बना लिया था (बाबुल इराक़ के उत्तरी इलाक़े में था और है)।

    अब पिछली शाताब्दी की सूरत-ए-हाल का जायज़ा लेते हैं। इस की मिसाल इस तरह है कि मेरे पास 100 एकड़ ज़मीन थी। एक जाबिर और ताक़तवर शख़्स ने उसमें से 60 एकड़ पर ज़बर्दस्ती क़ब्ज़ा कर लिया। अब सुलह कराने वाले यह मशवरा दें कि “मेरी 60 फ़ीसद ज़मीन पर ज़ालिम का क़ब्ज़ा एक ज़मीनी हक़ीक़त है। इसलिये मैं उसे स्वीकार कर लूं और शुक्र करूं कि 40 एकड़ मेरे पास बच गई है।” क्या ख़ूब इंसाफ़ होगा यह! और फिर इसकी क्या ज़मानत होगी कि वह ताक़तवर शख़्स मुझसे बाक़ी ज़मीन नहीं छीनेगा?

    इस्राईल के तमाम लीडरों का जायज़ा लें तो यह हक़ीक़त खुल कर सामने आ जाती है कि उनमें से कोई भी फ़िलिस्तीन तो क्या सरज़मीन-ए-अरब से भी ताअल्लुक़ नहीं रखता। थियोडोर हर्त्सल बुडापेस्ट (हंगरी) का था, बिल-गोरियां पोलांसिक (पोलैंड) का, गोल्डा मेयर कीव (युक्रेन) की,मनाख़म बेगन ब्रेस्ट लुटवास्क (रूस) का, यित्सहाक शिमीर रूज़ेनोफ़ (पोलैंड) का, चाइम वाइसमैन जो इस्राईल का पहला राष्ट्रपति बना, वह मोटोल (पोलैंड) का था।

    साबित यही होता है कि न तो इस्राईल के लीडरों का फ़िलिस्तीन से कोई ताअल्लुक़ था या है और न फ़िलिस्तीन या उसका कोई हिस्सा कभी भी यहूदियों की ममलिकत था। रियासत-ए-इस्राईल का वुजूद जोरो-जब्र का मरहून-ए-मिन्नत है। अगर यह उसूल मान लिया जाय कि चूंकि1005 क़ब्ल-मसीह में हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम की हुकूमत शुरु होने से वहां बाबुल वालों के क़ब्ज़े तक 400 साल यहूदी फ़िलिस्तीन के इलाक़े में रहे (यानी आज से 2610 से 3010 साल पहले तक) तो इसकी बुनियाद पर यहूदियों की रियासत वहां होना चाहिये, तो फिर हिस्पानिया,पूर्वी यूरोप, पश्चिमी चीन, पश्चिमी रूस और हिन्दुस्तान पर 800 साल या उससे ज़्यादा अरसा मुसलमानों की हुकूमत रही है, चुनांचे ये सारे देश मुसलमानों के हवाले कर दिये जाएं।

    इसी प्रकार और कई देशों का तनाज़ा खड़ा हो जाएगा, इसी प्रकार मुसलमानों का भी हक़ बनता है कि सारे मिलकर दक्षिणी और पूर्वी यूरोप पर आक्रमण कर दें कि किसी ज़माने में यहां मुसलमानों की हुकूमत थी। क़दीम अमरीकी मौजूदा सफ़ेद-फ़ाम अमरीकियों को, जोकि वास्तव में अंग्रेज़, जर्मन, हिस्पानवी इत्यादि हैं, को अमरीका से निकल जाने को कहें। ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासियों की ख़ातिर सफ़ेद-फ़ाम ऑस्ट्रेलियाइयों को निकल जाने का आदेश दिया जाए। अगर यह सब कुछ नहीं हो सकता तो फिर इस्राईल बनाना किस तरह जाइज़ है??

    अल्लामा इक़बाल का एक शेर है:

    है ख़ाक-ए-फ़िलिस्तीं पे यहूदी का अगर हक़,

    हिस्पानिया पे हक़ नहीं क्यूं अहल-ए-अरब का