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    रिश्तों की अहमियत

    रिश्तों की अहमियत
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    बचपन एक ऐसा दौर है जिसको हम बड़े प्यार से पीछे मुड़ कर देखा करते हैं। वो ऐसा वक्त होता है जब जिंदगी छोटी-छोटी खुशियों से भरी और जिम्मेदारियों से खाली होती है। मगर जरा गहराई से सोच कर देखिए कि क्या बच्चे सचमुच आजाद हैं? या वो अपने परिवार के बड़े-बूढ़ों की थोपी हुई आशाओं और उम्मीदों के बोझ से लदे हुए हैं?

    क्या हमारे पास बच्चों को सिखाने के लिए वाकई में कुछ है या हमें ही उनसे बहुत-कुछ सीखना है? आइए देखते हैं मां-बाप और बच्चों के रिश्तों पर सद्गुरु का क्या  कहना है।
    अगर मां-बाप को सचमुच अपने बच्चों की चिंता है तो उन्हें बच्चों को इस तरह पालना-पोसना चाहिए कि उनको कभी मां-बाप की जरूरत ना पड़े। प्रेम की प्रक्रिया हमेशा आजाद करने वाली होनी चाहिए, बंधनो मे उलझाने वाली नहीं। इसलिए जब आपको बच्चे हों तो उनको आसपास की चीजों पर गौर करने दीजिए, प्रकृति और अपने-आप के साथ वक्त बिताने दीजिए। प्यार और प्रोत्साहन का माहौल बनाइए। उनके शरीर और बुद्धि का विकास होने दीजिए। उनको एक मनुष्य के तौर पर जिंदगी को अपने ढंग से देखने दीजिए। परिवार, धन-दौलत या किसी और चीज के साथ अपनी  पहचान बनाए बिना वे सिर्फ एक इंसान के तौर पर चीजों को देखें। उनकी अपनी खुशहाली और दुनिया की भलाई के लिए जरूरी है कि जिंदगी को एक मनुष्य के रूप में देखने-समझने में आप उनकी मदद करें।
    सही परवरिश के लिए हालात के मुताबिक समझ-बूझ की ज़रूरत होती है। सब बच्चों पर एक ही नियम लागू नहीं हो सकता। चाहे बच्चों के ख्याल रखने की बात हो, प्यार जताने का हो या फिर सख्ती बरतने का, हर बच्चे के साथ अलग ढंग से पेश आने की जरूरत होती है। मान लीजिए मैं नारियल के बाग में खड़ा हूं और आप मुझसे पूछें, “एक पौधे को कितना पानी देना होगा?” तो मेरा जवाब होगा, “एक पौधे को कम-से-कम पचास लीटर।” घर जाने के बाद अगर आप अपने गुलाब के पौधे को पचास लीटर पानी देंगे तो वह मर जाएगा। आपको देखना होगा कि आपके घर में कौन-सा पौधा है और उसकी क्या ज़रूरतें है।
    आपका घर एक ऐसा स्थान नहीं होना चाहिए जहां आप अपनी संस्कृति, अपने विचार और अपने मूल्य अपने बच्चों पर थोपें। इसके बजाय माहौल को प्रोत्साहन-पूर्ण बनाइए। अगर बच्चों को किसी और स्थान की अपेक्षा अपने घर में ज्यादा चैन महसूस होगा तो जाहिर है वे यहां-वहां भटकने की बजाय घर में ज्यादा वक्त बिताने की कोशिश करेंगे। फिलहाल उनको घर की बजाय गली के नुक्कड़ पर वक्त बिताना ज्यादा अच्छा लगता है जिसकी वजह है घर में उन पर लादा जा रहा बोझ। इसलिए अगर घर में इस तरह का कष्ट न उठाना पड़े तो वे गली के नुक्कड़ की शरण नहीं लेंगे। इसका यह मतलब नहीं कि आगे चल कर दुनिया की कड़वी सच्चाइयों से उनका सामना नहीं होगा। जरूर होगा और ये सच्चाइयां किसी-न-किसी तरह से आपके बच्चों को अवश्य प्रभावित करेंगी। लेकिन हमेशा ऐसे मां-बाप ही बच्चों की बेहतर परवरिश सुनिश्चित कर सकते हैं जो बच्चों को अपने बारे में सोचने के लिए प्रोत्साहित करते हैं और उन्हे अपनी बुद्धि का उपयोग कर के यह देखने में मदद करते हैं कि उनके लिए क्या उत्तम है।
    ज्यादातर युवक मानते हैं कि बच्चे के पैदा होते ही उन्हें उसका शिक्षक बन जाना चाहिए। जब एक बच्चा आपके घर, आपके संसार में आता है तो आपके लिए यह वक्त उसका शिक्षक बनने का नहीं है; यह समय आपके सीखने का है। अगर आप अपने बच्चे को और फिर खुद को देखें तो पायेंगे कि आपका बच्चा आपसे ज्यादा खुश और आनंदमय है। है न? आपकी जिंदगी में खुशी के इस खजाने के आने से पहले आप एक मशीनी जिंदगी जी रहे थे। अब अनजाने ही आप हंसने-गाने लगे हैं, बच्चे के साथ सोफा के नीचे घुटनों के बल चलने लगे हैं। आपकी जिंदगी मे ये जो जान आ गई है उसका कारण है – वो बच्चा, आप नहीं। आपको अपने बच्चे को बस एक ही चीज सिखानी है, और वह भी सिर्फ एक हद तक, कि गुजर बसर कैसे करना है? लेकिन जिंदगी को बच्चा अपने अनुभव से खुद ही जान लेता है। एक वयस्क व्यक्ति हर प्रकार का कष्ट झेलता है, जो अकसर काल्पनिक ही होते हैं। जबकि बच्चा अभी कल्पना के उस मुकाम तक नही पहुंचा होता है। इसलिए यह अवसर बच्चों से सीखने का है उन्हें सिखाने का नहीं।
    रिश्ते की अपनी अहमियत होती है और जरूरी है कि हम उस रिश्ते की मर्यादा को समझें और अपने बच्चों को भी समझाएं। ईट-पत्थरों की दीवारों में जब रिश्तों का एहसास पनपता है तभी वह घर कहलाता है। कितने ही ऎसे रिश्ते हैं जो हमारे संबंधों का आधार होता है और हमें जीवनभर ये रिश्ते निभाने होते हैं। लेकिन आज की हाईप्रोफाइल और भागदौड भरी जिंदगी में हम रिश्तों की अहमियत को भूलते जा रहे हैं। हमारी बिजी लाइफ हमे रिश्तों से दूर कर रही है। इसका उसर हमारे बच्चों पर भी पडता है। तभी तो आज के बच्चे रिश्तों की अहमियत को नहीं समझते।
    रिश्तों से अनजान बच्चे:
    जब बच्चा पैदा होता है तो उसके जन्म से ही उसके साथ कई रिश्ते जुड जाते हैं। लेकिन इन रिश्तों में से कितने ऐसे होते हैं जिन्हें वे निभा पातें हैं। ऐसा इसलिए नहीं कि बच्चों को उन रिश्तों की अहमियत का नहीं पता बल्कि इसलिए कि क्योंकि हम खुद उन रिश्तों से दूर हैं। बच्चों में संस्कार की नींव माता-पिता द्वारा ही रखी जाती है। अगर माता-पिता ही रिश्तों पर ध्यान नहीं देते तो बच्चे तो इन से अनजान रहेंगे ही।
    हर इंसान को हर रिश्ते की अहमियत को समझना चाहिए
    रिश्ते हमारी ज़िन्दगी में बहुत अहमियत रखते हैं। ख़ासकर रिश्तों का सामना ज़्यादातर औरतों को करना पड़ता है। एक माँ, सास, बहु, भाबी, बेटी, बीवी, बनना बहुत आसान है पर इन्हें निभाना बहुत मुश्किल है। एक अच्छा रिश्ता बनाने के लिए हमें कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है पर यह इतना मुश्किल भी नहीं। हमें सब से पहले रिश्तों की अहमियत समझनी चाहिए। कई जगहों पर रिश्ते बराबर के होते हैं जैसे हज़बैंड और वाइफ़ का रिश्ता, दोनों ही हमेशा अपनी बात को सही जताना चाहते हैं। जिससे उनके बीच केवल दूरियां आती हैं। इन दोनों को एक दूसरे की बात सुनना चाहिए और आपस में बात कर के कोई भी फैसला करना चाहिए क्यों कि यह दोनों गाड़ी के दो पहियों की तरह होते हैं और अगर एक भी पहिया ख़राब हो जाए तो गाड़ी नहीं चलती इसी तरह इन दोनों के बिना घर भी नहीं चलता।
    एक-दूसरे के साथ जीवन का सफ़र तय करने की शुरुआत करने के कुछ ही समय बाद आपको अचानक महसूस होता है कि आपके संबंधों में अब वो मिठास नहीं रही, जो शुरुआत में थी। एक-दूसरे का साथ अब आपको बोझ की तरह लगने लगा है। एक-दूसरे से बातें करने के लिए अब आपको विशेष प्रयत्न करने की जरूरत होती है…ऐसा लगने लगता है जैसे वो प्यार जिसके लिए आप ने साथ जीने-मरने की कसमें खाई थीं… अब आपके बीच से गायब होता चला जा रहा है।
    आप कोशिश करते हैं कि किसी तरह रिश्ते को और लंबा खींचा जा सके, लेकिन आखिरकार एक दिन आपको लगता है कि अब अलग होना ही बेहतर है। प्रेम भरे किसी भी रिश्ते में अलगाव का कोई एक कारण नहीं होता। छोटी-छोटी बहस या तकरार का रोज़ का किस्सा बन जाना, एक-दूसरे की पसंद-नापसंद का एकदम भिन्न होना, धैर्य खो देना, शक करना तथा प्रेम की कमी महसूस करना…ऐसे कई कारण हैं, जिनके चलते आपसी संबंधों में कड़वाहट तथा दरारें पनपने लगती हैं।
    मेरी नज़र में सब से नाज़ुक रिश्ता सास, बहु का होता है क्यों कि हज़बैंड वाइफ़ तो एडजस्ट कर लेते हैं पर सास-बहु में हमेशा किसी न किसी बात पर अनबन देखी जाती है। क्या आप ने कभी सोचा है कि ऐसा क्यों होता है? क्यों कि इन दोनों में सिर्फ़ सास-बहु का रिश्ता होता है। इन दोनों में यह ज़रूरी है कि यह दोनों माँ-बेटी की तरह रहें। बहु को अपनी सास को माँ मानना चाहिए पर इसके लिये ज़रूरी है कि सास भी बहु को अपनी बेटी समझे। तभी यह दोनों एक अच्छी सास-बहु साबित होंगी। एक और रिश्ता बहुत अहम होता है और वह है माँ-बेटी का। माँ-बेटी हमेशा एक दूसरे से बहुत ज़्यादा प्यार करते हैं इस में कोई शक नहीं है पर कई बार ऐसे हालात पैदा हो जाते हैं कि दोनों एक दूसरे को समझ नहीं पाते। माँ तभी एक अच्छी माँ कहलाएगी जब उसने अपनी बेटी की अच्छी परवरिश की हो और दुनियावी तालीम के साथ दीनी तालीम भी दी हो। क्यों कि दुनियावी तालीम जितनी ज़रूरी है उससे भी ज़्यादा दीनी तालीम ज़रूरी है। माँ को ख़ुद के पर्दे के साथ बेटी के पर्दे का भी ख़्याल रखना चाहिए कि अगर माँ पर्दा करती है और बेटी नहीं तो इसका जवाब माँ को अल्लाह के यहाँ देना होगा। इसी तरह बेटी को भी अपनी माँ की छोटी से छोटी ख़ुशी का ख़्याल रखना चाहिए क्यों कि बेटी की छोटी-छोटी बातें माँ को बड़ी-बड़ी ख़ुशियां दे सकती हैं जैसे माँ की बर्थ डे या एनिवर्सरी को याद रखना और उन के मरने के बाद उनकी बर्सी वग़ैरा का ख़ास ध्यान रखना।
    इस तरह आप एक अच्छी बेटी साबित हो पाएंगी। हमें सब से पहले रिश्तों की गहराई को समझना चाहिए और यह सोचना चाहिए कि क्या हम एक अच्छी माँ, बेटी, सास, बहु या बीवी बन पाए हैं या नहीं।