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    रूई, ऊन और कतान के कपड़े पहनना

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    सब कपड़ो में अच्छा कपड़ा सूती है मगर ऊनी कपड़े को बारह महीने पहनना और अपनी आदत बना लेना मकरूह है। हाँ कभी कभी न होने के सबब से या सर्दी दूर करने की ग़रज़ से पहनना बुरा नही है चुनांचे बसनदे मोतबर हज़रत अमीरुल मोमिनीन (अ) से मंक़ूल है कि रूई का कपड़ा पहनो कि वह जनाबे रसूले ख़ुदा और हम अहले बैत की पोशिश हैं और हज़रत रसूले ख़ुदा (स) बग़ैर किसी ज़रुरत के ऊनी कपड़ा नही पहनते थे।

    दूसरी हदीस में हज़रते इमाम सादिक़ (अ) से मंक़ूल है कि ऊनी कपड़ा बे ज़रुरत नही पहनना चाहिये।

    दूसरी रिवायत में हुसैन बिन कसीर से मंक़ूल है वह कहता है कि मैंने हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) को देखा कि मोटा कपड़ा पहने हुए हैं और उस के ऊपर ऊनी कपड़ा, मैंने अर्ज़ की क़ुरबान हो जाऊँ क्या आप लोग पशमीने का कपड़ा पहनना मकरुह जानते थे? हज़रत ने इरशाद फ़रमाया कि मेरे वारिद और इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ) ऊनी कपड़ा पहना करते थे मगर जब नमाज़ के लिये खडे होते तो मोटा सूती कपड़ा पहने होते थे और हम भी ऐसा ही करते हैं।

    मंक़ूल है कि हज़रत रसूले ख़ुदा (स) ने फ़रमाया पाँच चीज़ें मरत वक़्त तक मैं तर्क नही करूंगा, अव्वल ज़मीन पर बैठ कर ग़ुलामों के साथ खाना खाना, दूसरा क़ातिर पर बेझूल के सवार होना, तीसरे बकरी को अपने हाथ से दुहना, चौछे बच्चों को सलाम करना, पांचवें ऊनी कपड़े पहनना।

    इन सब हदीसों का ख़ुलासा और जमा करने का तरीक़ा यह है कि अगर मोमिनीन शाल और पशमीने को अपना शिआर (आदत) क़रार दें और इस कपड़े के पहनने का सबब अगर यह हो कि वह औरों से मुमताज़ रहें तो यह क़ाबिले मज़म्मत है। हां, अगर क़नाअत या ग़रीबी की वजह से या सर्दी दूर करने के लिये ऊनी कपड़ा पहनें तो कोई हरज नही है, और मेरे इस क़ौल की ताईद उस हदीस से होती है जो हज़रते अबूज़रे ग़फ़्फ़ारी से मंक़ूल है कि हज़रते रसूले ख़ुदा (स) ने फ़रमाया कि आख़िरे ज़माना में एक गिरोह ऐसा पैदा होगा जो जाड़े और गर्मी में पशमीना ही पहन करेगें और यह गुमान करेगें कि इस कपड़ों की वजह से हमें औरों पर बरतरी और रूतबा हासिल हो मगर इस गिरोह पर आसमान और ज़मीन के फ़रिश्ते लानत करेगें।

    हज़रत अमीरुल मोमिनीन (अ) से मंक़ूल है कि जाम ए कतान पैग़म्बरों की पोशिश है।

    हज़रते इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ) स मंक़ूल है कि कतान पहनने से बदन फ़रबा होता है।

    दूसरी हदीस में आया है कि हज़रत अली बिन हुसैन (अ) जाम ए ख़ज़ हजार या पांच सौ दिरहम का ख़रीदते थे और जाड़े में उसे पहनते थे जब जाड़ा ख़त्म हो जाता था तो उसे बेच कर क़ीमत को सदक़े में निकाल देते थे।